अफ़लातून
हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भांति डॉ आंबेडकर,राजाजी,डॉ राधाकृष्णन,भाकपा भी ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के पक्ष में नहीं थे।9 अगस्त की सुबह ही कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व गिरफ्तार कर लिया गया था।बचे जेपी,लोहिया,अच्युत पटवर्धन,अरुणा आसफ अली,उषा मेहता जैसे सोशलिस्ट।
आम जनता से भी 8 तारीख के आवाहन में गांधीजी कह चुके थे कि ऊपर से आने वाले निर्देश का इंतजार नहीं करना है,स्वयं फैसला लेना है।चौरी चौरा के जमाने से गांधीजी का कौशल का तजुर्बा बढ़ चुका था इसलिए,’चारों ओर हिंसा की आंधी चल रही हो तब भी अहिंसा का दीपक जलाएं रखूँगा’ पर आ गए थे।तत्कालीन वाइसरॉय की कार्यकारिणी (कैबिनेट से तुलना की जा सकती है) में डॉ अम्बेडकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी थे।काशी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति राधाकृष्णन ने जेल में बंद गांधीजी को पत्र लिख कर आंदोलन वापस लेने की अपील की थी।नेताजी देश के बाहर जा चुके थे किंतु 8 अगस्त के आवाहन से संतुष्ट थे।इसी दौर में उन्होंने रंगून से रेडियो संदेश में उन्होंने गांधीजी के लिए राष्ट्रपिता और जेल में हुई कस्तूरबा की मृत्यु के बाद उन्हें ‘देश की मां’ कहा था।आजाद हिंद फौज के साथियों से भी कहा था कि यदि भारत भूमि पर पहुंचने में सफल हो जाते हो तब तुम्हारे कमांडर गांधीजी होंगे।इसी वजह से नेताजी की वरिष्ठ सहयोगी नोआखाली में गांधी के साथ शांति बहाली में लग गए।

