शैलेन्द्र चौहान
एक समय में साहित्यिक सम्मानों का उद्देश्य साहित्य की गुणवत्ता और मौलिकता को रेखांकित करना था। इन सम्मानों के पीछे एक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा जुड़ी होती थी और उन्हें प्राप्त करना किसी लेखक की दीर्घ साधना का परिणाम माना जाता था।
लेकिन समय के साथ यह परंपरा कई स्तरों पर कमजोर हुई। छोटे-छोटे संस्थानों, मंचों और समूहों ने सम्मान देने को एक प्रकार की गतिविधि बना लिया। अनेक बार इनका उद्देश्य साहित्यिक मूल्यांकन से अधिक आपसी संबंधों, समूहबद्धता, स्वस्थापना और निज प्रचार से जुड़ जाता है।
सम्मान की बढ़ती संख्या और घटती गरिमा :
आज स्थिति यह है कि हिंदी में सम्मान देने वाली छोटी-मोटी संस्थाओं की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि लगभग हर महीने कहीं न कहीं कोई “राष्ट्रीय”, “अंतरराष्ट्रीय” या “विशिष्ट” सम्मान घोषित होता रहता है। यह हास्यास्पद है। कई बार यह सम्मान ऐसे लेखकों को मिलते हैं जिनकी रचनात्मक उपस्थिति अभी स्पष्ट भी नहीं हुई होती। कुछ संस्थाएं तो थोक के भाव सम्मान बांटती हैं। तुम भी ले लो, तुम भी ले लो।
कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि लेखक स्वयं अपने परिचितों या संगठनों के माध्यम से सम्मान प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। आर्थिक भार स्वयं वहन करते हैं, खानपान की व्यवस्था करते हैं। विशिष्ट अतिथियों के ठहरने और मार्ग व्यय का इंतजाम भी स्वयं सम्मानित लेखक ही करता है।समारोह आयोजित होते हैं, मालाएँ पहनाई जाती हैं, प्रमाणपत्र दिए जाते हैं, और अगले दिन सोशल मीडिया पर, एक-दो स्थानीय अखबारों में उसकी तस्वीरें प्रसारित हो जाती हैं। सम्मानकर्ता का मुख गर्व से दिपदिपाता दिखता है। इस प्रक्रिया में सम्मान एक सांस्कृतिक उपलब्धि से अधिक एक सामाजिक प्रदर्शन बन जाता है।
समूहवाद और पारस्परिकता की संस्कृति :
इस तरह के छुटभैये सम्मानों के इस सतही व्यापार का एक बड़ा कारण साहित्यिक समूहवाद भी है। कई बार साहित्यिक मंडलियाँ इस तरह काम करती हैं कि आज मैं आपको सम्मान दूँगा, कल आप मुझे सम्मान देंगे। यहाँ दयनीयता स्पष्ट झलकती है।
इस प्रकार सम्मान एक पारस्परिक विनिमय (exchange) का रूप ले लेता है। इससे साहित्यिक मूल्यांकन की निष्पक्षता प्रभावित होती है और युवा रचनाकारों के सामने गलत उदाहरण प्रस्तुत होते हैं।
बाज़ार, सोशल मीडिया और त्वरित प्रतिष्ठा :
समकालीन समय में सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ाया है। अब सम्मान केवल समारोह तक सीमित नहीं रहता; वह तुरंत डिजिटल प्रचार का माध्यम बन जाता है।
कई लेखकों के लिए सम्मान रचना से अधिक ‘प्रोफाइल निर्माण’ का साधन बन गया है। परिणाम यह होता है कि साहित्य की वास्तविक कसौटी—भाषा, अनुभव और विचार की गहराई—पीछे छूट जाती है, और उसकी जगह दृश्यता (visibility) प्रमुख हो जाती है।
साहित्य पर प्रभाव :
सम्मानों के इस सतही व्यापार का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि
वास्तविक प्रतिभा की पहचान धुंधली हो जाती है,
आलोचना की गंभीरता कम हो जाती है,
और साहित्यिक संस्कृति में विश्वसनीयता का संकट पैदा होता है।
जब पाठकों को यह महसूस होने लगता है कि सम्मान का संबंध साहित्यिक गुणवत्ता से अधिक नेटवर्क और अवसर से है, तब साहित्यिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा भी कमजोर पड़ने लगती है।
समाधान की दिशा :
इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए कुछ मूलभूत कदम आवश्यक हैं—
सम्मान देने वाली संस्थाओं की चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो।
निर्णायक मंडल स्वतंत्र और प्रतिष्ठित हो।
सम्मान की संख्या कम लेकिन सार्थक हो।
आलोचना और मूल्यांकन की परंपरा मजबूत की जाए।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि लेखक स्वयं सम्मान के प्रति अतिरिक्त लालसा से मुक्त हों और अपनी ऊर्जा रचना की गहराई पर केंद्रित करें।
साहित्य में सम्मान का स्थान तभी सार्थक है जब वह रचनात्मकता का स्वाभाविक परिणाम हो, न कि उसका विकल्प। यदि सम्मान साधना के बाद आए तो वह साहित्य की प्रतिष्ठा बढ़ाता है; लेकिन यदि वह साधना का स्थान लेने लगे तो वह केवल एक सांस्कृतिक औपचारिकता बनकर रह जाता है।
हिंदी साहित्य की वास्तविक गरिमा पुरस्कारों की संख्या से नहीं, बल्कि उन रचनाओं से तय होगी जो समय की कसौटी पर टिक सकें। सम्मान तभी सार्थक हैं जब वे उस सृजनात्मक सत्य को पहचानें—न कि केवल उसके चारों ओर बने समारोह के दिखावे को।
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