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क्रांति का सशक्त शस्त्र है साहित्य

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

साहित्य महत्व को समझने के लिए है,साहित्य के युग पुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र जी को पढ़ना,समझना हमारे लिए अनिवार्य है।
भारतेन्दु युग का साहित्य जनवादी इस अर्थ में हैं कि वह भारतीय समाज के पुराने ढांचे से संतुष्ट न रहकर उसमें सुधार भी चाहता है। वह केवल राजनीतिक स्वाधीनता का साहित्य न होकर मनुष्य की एकता, समानता और भाईचारे का भी साहित्य हैं। जीवन को समझने-बूझने और देखने की भारतेन्दु की निश्चित दृष्टि है, साहित्य को वे वृहत्तर जीवन की संगती में देखते हैं, उसमें अलग या बाहर नहीं। १८७४ ई. में उन्होंने विलायती कपड़े का बहिष्कार करने का व्रत लिया था और देशवासियों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दी थी। भारतेन्दु स्वदेशी आंदोलन के ही अग्रदूत न थे। वे समाज-सुधारकों में स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, विदेश यात्रा आदि के समर्थक थे
इसी तरह मूर्धन्य साहित्यकार स्व.महावीर प्रदेश द्विवेदी जी ने साहित्य की महत्ता को परिभाषित करते हुए लिखा है,
ज्ञान-राशि के संचित कोष ही का नाम साहित्य है। यदि कोई भाषा अपना निज का साहित्य नहीं रखती तो वह, रूपवती भिखारिन की तरह, कदापि आदरणीय नहीं हो सकती।
साहित्य महत्व को समझने के लिए साहित्यकारों की बहुत लंबी फेहरिस्त है।
हमारे पास साहित्यकारों का महत्वपूर्ण इतिहास है,दुर्भाग्य से हमने साहित्य के इतिहास को दुर्लभ,वांछनीय,अनूठी वस्तु के
(Antique) रूप में संग्रहालय में दर्शनार्थ रख दिया है।
आज,सांस्कृतिक मोर्चे पर हो रही साहित्य की दुर्दशा पर व्यापक बहस की आवश्यकता है।
साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है,लेकिन साहित्य रूपी दर्पण पर विभिन्न विकृतियों की धूल जम रही है।
सबसे बड़ी विकृति सांस्कृतिक क्षेत्र में हो रही है,आधुनिकता के नाम पर अपने देश की मूल संस्कृति का उपहास किया जा रहा है।
विशेष कर फिल्मों में,स्त्री शोषण,सामंती मानसिकता को प्रश्रय देना,हिंसा को बढ़ावा देना,विलासिता पूर्ण जीवन शैली को प्रचारित किया जाता है।
धारावाहिक का फिल्मांकन तो विवाह पश्चात,या विवाह पूर्व के अनैतिक संबंधों को दर्शाने के बगैर दिखाया ही नहीं जाता है।
आश्चर्य होता है,ऐसे धारावाहिक, के लेखक,निर्माता,दिग्दर्शक, अभिनेता,अभिनेत्री,और अन्य सभी सहयोगी भारतीय ही होते हैं।
साहित्य में हास्य-व्यंग्य की विधा को भी सिर्फ मनोरंजन तक सीमित कर रखा है। व्यंग्य के साथ सिर्फ और सिर्फ हास्य को प्रधानता देने से व्यंग्य की मार कमजोर हो जाती है। जब की व्यंग्य समाज के परिवर्तन की सशक्त विद्या है।
साहित्य के माध्यम से वैचारिक क्रांति संभव है।
महान क्रांतिकारी शहीदेआजम भगतसिंह ने
विचार की शक्ति को शस्त्र से महत्वपूर्ण माना है,उन्होंने कहा है
“पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है
आध्यात्मिक क्षेत्र के सच्चे संतों ने भी साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से जनजागृति के संदेश दिए हैं।
आज साहित्य के महत्व को ना सिर्फ समझना महत्वपूर्ण है बल्कि साहित्यकारों का दायित्व भी है कि साहित्य को विभिन्न तरह की विकृतियों से बचाए।

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