देवताओं को माला मत पहनाओ
देवताओं के हाथों माला मत पहनो
गंधर्व विवाह की यह प्रथा
भीम के बल को शोभा देता है बुधनी
और हिडिंबा पंच नारी में अपना नाम
दर्ज़ कराने के लिए
आज भी दफ़्तरों की ख़ाक छान रही है
जैसे कि मनरेगा के मज़दूर में
शामिल होने को बेरोज़गार
पत्थर बन कर जीयो
लेकिन किसी राम की प्रतीक्षा मत करो अहिल्या
याद रखो कि राम भी उसी ईश्वर का अंश हैं
जिसके अभिशाप ने तुम्हें बनाया था पत्थर
शबरी
मत रहो भूखी
मत चखो बेर
अपने हिस्से में मत रखो खट्टे बेर
बुधनी
मत पहनाओ देवताओं को माला
परित्यक्ता कहलाने के अभिशाप को
मत डालो अपने गले में माला की तरह
तुम्हारा जीवन भी
गले में नीलकंठ की लाश लटकाए
उस विक्षिप्त नाविक सा हो जाएगा
जो सदियों से भटकता रहा है
इस महामानव के समुद्र के किनारे
सुनते हुए अंधी आंधियों का शोर !
- सुब्रतो चटर्जी

