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नर-नारी की अवस्थिति और आदि दर्शन

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डॉ. विकास मानव

कभी त्रिवेणी संगम में स्नान करते हुए स्त्रीपुरूषों को देखता हूँ। स्त्रियाँ अपने सम्पूर्ण वस्त्र के साथ गंगा में निमज्जन करती हैं, जबकि पुरुष अपने सब वस्त्र निकाल कर केवल एक अधोवस्त्र से युक्त हो में डुबकी लगाता है।
वस्त्र वासना है। इस दृश्य से निष्कर्ष निकलता है- स्त्रियाँ वासना का त्याग तीर्थ में भी नहीं करतीं। पुरुष त्रिपाद वासना छोड़ देता है, एक चौथाई वासना रखता है।
स्त्री के लिये वासना का त्याग कठिन है, पुरुष के लिये अपेक्षाकृत सरल। जिसके ऊपर वसन है, उसके अन्तः करण में भी वसन (वासना) है। भीतर की वासना का त्याग वासुदेव को नमस्कार करने से होता है।
नमो भगवते वासुदेवाय, कहता हुआ मैं श्री महाराज जी को प्रणाम कर रहा हूँ। वसन, वासना, वास्तु, वासुदेव, वस् धातु से निष्पन्न शब्द हैं। इन चार की सबको आवश्यकता है। जिसमें शरीर रहता है वा जिससे शरीर ढका रहता है, वसन वा वस्त्र है।
सभी लोग वसन धारण करते हैं, शीत से निवारण हेतु वस्त्र ओढ़ते हैं, पहनते हैं। जिसमें सवस्व स्त्री-पुरुष रहते हैं, वह वास वा वास्तु है। जीवन में घर / निवास / वास/ वास्तु की आवश्यकता है। जिसमें मन बसता है, वह वासना है।
मन इस देह में रहता है। यह देह वासना है। मन अमूर्त सूक्ष्म एवं गतिशील है। संसार को सब वस्तुओं में इसका प्रवेश है। अतएव हर वस्तु मन के लिये वासना है। जिसमें मन वसे वह वस्तु है।
वस्तु और वासना एक ही है। जिसमें आत्मा वसे वह वासुदेव है। वासुदेव एक है। आत्मा को इसकी आवश्यकता है। बिना इसके शान्ति नहीं। यह चतुर्भुज है। तन ढकने के लिये वसन चाहिये।रहने के लिये वास्तु चाहिये। मन की तुष्टि के लिये वासना चाहिये।
आत्मा के लिये वासुदेव चाहिये। संसार में इन चारों की बाहुल्यता व्यापकता है। इसलिये यह चतुर्भुज विष्णु है। चतुर्भुजाय नमः।

वस्त्र के रंग से और आकार प्रकार से वास्तु के रंग से एवं उसके शिल्प से, व्यक्ति जिस वस्ती में रहता है, उसकी सघनता विरलता एवं भूमि से, वासना के स्वरूप का ज्ञान होता है।
शारीरिक वासना की तृप्ति शरीर से, मानसिक वासना की दृष्टि मन से तथा आत्मिक वासना को शान्ति आत्मा से होती है। गुणों के भेद से सात्विक राजसिक तामसिक ये तीन वासनाएं हैं। इनसे परे कोई नहीं है। वासना सबके भीतर है। वासुदेव सबका नियामक है।

   *वासना के १२ स्थान :*

१. वपुस्थान।
२. वित्तस्थान।
३. बलस्थान।
४. वास्तुस्थान।
५. वंशस्थान।
६. वैरस्थान।
७. वधूस्थान.
८. विघ्नस्थान।
९. वेदस्थान।
१०. विभूतिस्थान।
११. बुद्धिस्थान.
१२. व्ययस्थान.
ये सब स्थान वासुदेवमय हैं। सुन्दर वपु प्रचुरवित्त, महाबल, शुभवास्तु, श्रेष्ठ वत्स, असुर बैर, रम्य वामा / वल्लभ, अशुभ विसर्जन, वेद विद्या, विपुल विभूति वा वृद्धि एवं धन व्यय, वासुदेव विष्णु के लिये होना चाहिये।
यदि ऐसा नहीं है तो सब व्यर्थ। सुन्दर शरीर पा कर उसे भगवत्कार्य में न लगाया, धन इकट्ठा कर उससे परमार्थ न किया, बलशाली हो कर धर्म की रक्षा न किया, घर प्राप्त कर उसमें यज्ञानुष्ठान ब्राहाण भोजन न कराया, विवेकशील सन्तति न पैदा किया, आसुरी शक्तियों का विरोध न किया, पत्नी (वा पति) प्राप्त कर धर्मानुकूल काम का सेवन न किया, अविद्या का विसर्जन न किया, वेद विद्या में पारंगत न हुआ, विभूति वृत्ति को विभु के चरणों समर्पित न किया, धर्म को वृद्धि न किया तथा आत्मा का परमात्मा में विलय न किया तो मनुष्य जन्म का लाभ नहीं मिला ऐसा समझना चाहिये।

द्वादश अक्षरों वाला यह मन्त्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ द्वादश भावों को शुद्ध करता है। इन सभी वासनाओं में सप्तम भाव जन्य वासना की प्रबलता सर्वोपरि है। सारा संसार इस में बह रहा है। अन्य सभी वासनाएं सप्तम भाव के चारों ओर चक्कर लगाती हैं।
विवाह मिथुनीकरण दाम्पत्ययन के लिये पुष्ट देह, धन, बल, अच्छा घर, बुद्धि, आरोग्य, आयु. विद्या, पदप्रतिष्ठा, लाभ एवं भोग शक्ति चाहिये। ये ग्यारह करण विवाह की धुरी को धारण करते हैं। विवाह में इन ११ बातों पर ध्यान देना चाहिये।
इनमें से यदि ६ बातें पक्ष में है शुभ हैं तो विवाह करना चाहिये, ५ पर नहीं। यदि ग्यारहों बातें शुभ हैं तो कहना ही क्या ? किन्तु ऐसा होना सामान्यतया शक्य नहीं है।
१. जातक डेढ़ामेढ़ा/ विकलांग न हो,
२. जातक दरिद्र न हो,
३. जातक अकेला/ भ्रातृहीन न हो,
४. जातक भूमिभवन विहीन न हो,
५. जातक दूषित बुद्धिवाला न हो,
६. जातक शत्रु/रोग युक्त न हो,
७. जातक अल्पायु न हो,
८. जातक आचार होन/ अपण्डित न हो, ९. जातक पद प्रतिष्ठा हीन/ अकर्मण्य न हो.
१०. जातक इच्छाहीन वैरागी न हो,
११. जातक व्ययशील/ अपरिग्रही न हो। गृहस्थ के लिये ये योग्यताएं अनिवार्य हैं। इनका भली भाँति विचार करना ही चाहिये।

हमारा समाज दूषित हो चुका है। दहेज के दानव ने इसे मस लिया है। दहेज के लिये बधुएँ जलायी जा रही हैं। प्रताड़ित की जा रही हैं। सास के रूप में बहू को जलाने वाली स्त्री ही है। ननद के रूप में भाभी को प्रताड़ित करने वाली भी स्त्री ही है।
सौत रूप में स्त्री से द्वेष करने वाली भी स्त्री ही है। ऐसी स्त्रियों के सन्दर्भ में राक्षसराज रावण का यह कथन अधिक उपयुक्त है।

तुलसीदास कहते हैं :
“नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं।
अवगुन आठ सदा उर रहही ॥
साहस अनृत चपलता माया।
भय अबिबेक असौचं अदाय ॥”
~लंकाकाण्ड, रा.च.मा.
【सब लोग स्त्री के स्वभाव को सत्य कहते हैं कि उसके हृदय में ये आठ अवगुण सदैव रहते हैं- साहस, झूठ बोलना, चञ्चलता, माया (छल), भय, अविवेक, अपवित्रता और निर्दयता।】
जिस नारी को पुरुष नरक का द्वार कहता है, उसी नारी के लिये यह पुरुष पाप का पिटारा है। कोई किसी से श्रेष्ठ नहीं है। कोई किसी की अपेक्षा हेय नहीं है। दोनों समान हैं। वेद सम्मत सत्य है, यह । दोनों में स्वर्ग और नरक निहित है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य है, अपने भीतर स्थित स्वर्ग को जानना, पहिचानना और उसे आचरित करना। स्त्री हो वा पुरुष, दोनों को स्वर्ग का सामाज्य प्राप्त करने के लिये इस शरीर का प्रयोग करना चाहिये।
दुर्लभ एवं मूल्यवान् मनुष्य तन का व्यर्थ के भोगों में दुरुपयोग करने वाला क्या बुद्धिमान कहा जा सकता है ?

भतृहरि उवाच :
‘स्थाल्यां वैदूर्यमय्यां पचति तिलकणांश्चन्दनैरिन्धनौधेः
सौवर्णैर्लाङ्गलायैर्निखनति वसुधामर्कमूलस्य हेतोः।
छित्वा कर्पूरखण्डान्वृत्तिमिह कुरुते कोद्रवाणां समन्तात्।
प्राप्येमां कर्मभूमि न चरति मनुजो यस्तपो मन्दभाग्यः॥
~नीतिशतकम्.

यहाँ कर्मभूमि= मनुष्यदेह जो कि कर्म करने हेतु सक्षम है।
[ इस मनुष्य शरीर को प्राप्त कर जो मन्दभागी पुरुष तप नहीं करता, वह वैदूर्यमणि की थाली में चन्दन की लकड़ी से तिल पकाता है, अर्क (मन्दार) की जड़ को प्राप्त करने के लिये सोने के हल की नोक से पृथ्वी खोदता है, अथवा सामान्य कोद्रव (कोदों) के धान्य की रक्षा के लिये कर्पूर की बाड़ लगाता है ।】
इस मनुष्य देह जैसी मूल्यवान् वस्तु का उपयोग तुच्छ विषयों के निमित्त करना मूर्खता है।

सप्तम भव से एकादश पड़ता है, पञ्चम भाव। इसलिये काम का लाभ स्थान पाँचवाँ है। विवेक बुद्धि वा ज्ञान है, पश्चम काम (सप्तम) का वास्तविक लाभ वही लेता है, जिसका पंचम भाव (ज्ञान) प्रबल है जो ज्ञानी नहीं उसे काम की आग जला देती है जो ज्ञानी है, उसे कामाग्नि पुष्ट करती है।
अज्ञानी के लिये विवाह दुर्दशा का सेतु है। ज्ञानी के लिये विवाह मोक्ष का सेतु है। सप्तम भाव के सन्दर्भ में पञ्चम भाव को देखना अति आवश्यक है।

लाभपक्ष निर्बल है तो सप्तम का लाभ नहीं मिल सकता। पंचम भाव शुभ वा बली है तो जातक को पुत्र प्राप्ति होगी तथा विवेक बुद्धि ज्ञान की प्रबलता से वह स्त्री में आसक्ति नहीं रखेगा। अनासक्ति के कारण वह अनेक दुःखों से बच जायेगा।
मनुष्य का हाथ शंकर है। शं करोति इति शंकरः यह हाथ हो साक्षात् शिव है, भगवान् है। यह वेदमत है।
१. “अयं मे हस्तो भगवान् अयं में भगवत्तरः।
अयं में विश्वभेषजः अयं शिवाभिमर्शनः।”
~अथर्ववेद {४। १३ । ६}
यह मेरा हाथ भगवान् है। यह मेरा (हाथ) भगवान् से भी बढ़कर है। यह मेरा (हाथ) हरप्रकार के शोक को हरने वाली औषधि है। इस मेरे हाथ का संस्पर्श रोगघ्न है, इसलिये यह (हाथ) शिव है। [हस्तः = दाहिना हाथ]।

२. “हस्ताभ्यां दशशाखाम्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी ।
अनामयिनुम्यां हस्ताभ्यां ताभ्यां त्वाभि मृशामसि ॥
-अथर्ववेद (४। १३।७ ).

उन दोनों पुरोगवी अग्रणी जिह्नावाच = वाच्यमान रसना, स्पष्ट उच्चारण पूर्वक दशशाखम्यां हस्ताम्यां = दश अंगुलियों से युक्त दोनों हाथों से अनामयित्नुभ्यां रोगनिवारक ताम्यां हस्ताम्यां हाथों से त्वा अभिमृशामसि तुझे (हम) साक्षात् स्पर्श करते हैं जिस हाथ के द्वारा अभिमर्शन करने से अभिमृश्य को सुख पहुंचता है, शोक दूर होता है, आनन्द छा जाता है, उसे शंकर कहना नितान्त युक्ति संगत है। इस साक्षात् शंकर का दर्शन प्रातः उठने के बाद तुरन्त करना चाहिये।
मनुष्य का यह हाथ रुद्र है। रोदयतीति रुद्रः जो रुलाता है, वह रुद्र है। मनुष्य दाहिने हाथ से मुक्का मारता है, थप्पड़ लगाता है। मनुष्य दोनों हाथों से शस्त्र चलाता है, अस्त्र संचालन करता है। इस प्रकार मनुष्य का हाथ भयावना, सुभयंकर, भीषण है। इस लिये रुद्र (रुद् + रक्) है।
यह हाथ रुद्र रुप में पूज्य है। क्यों कि इससे दुष्टों का संहार किया जाता है। राक्षस प्रवृत्ति के लोगों का ताडन किया जाता है। राम का हाथ, कृष्ण का हाथ रुद्र है। तस्मै रुद्राय नमः।

लोक में शिवार्चन किया जाता है। यह रुद्राभिषेक के नाम से भी प्रसिद्ध है। पति जन बायें हाथ के अंगूठे को शिव लिग मानते हैं। ये इस अंगूठे को खड़ा कर दायें हाथ से इस पर जल की धारा समय गिराते है। इसमें रहस्य है। अंगूठे के नीचे शुक्र स्थान है।
अंगूठा हाथ को सभी अंगुलियों से बलशाली है। कारण कि यह शुक्र वीर्य शक्ति के ऊपर है। शुक्र है। शुक्र आनन्द है। शुक्र आनन्ददाता है। यह अपने स्थान पर रहता है तो आनन्द देता है, निकलता है तो आनन्द देता है। इसे जो प्राप्त करता है, उसे भी आनन्द होता है।

निष्कर्षतः वीर्य आनन्दमय है ‘आनन्दमयं अस्य’ वीर्य पुरुष में होता है, स्त्री में नहीं। स्त्री इसे पुरुष से प्राप्त करती है। पुरुष द्वारा इसे वो पाती है तो उसे आनन्द होता है। पुरुष इसे जब देता है, बाहर निकालता है तो उसे आनन्द होता है। यदि इसे सदैव अपने भीतर रखा जाय तो आनन्द क्यों नहीं होगा ?
जो इसे सतत अपने भीतर रखता है, गिराता नहीं, व्यय नहीं करता, दान नहीं करता, वह आनन्दमय है, ब्रह्म है। तस्मै नमः।
इस वीर्य के लेन-देन हेतु विवाह किया जाता है। विवाह क्या है ? विवहन विवह युट् वीर्य को बहाना बहने देना, वीर्य को वहन करना किन्तु विधिपूर्वक ऐसे तैसे नहीं विधि सम्मत एक पक्ष वीर्य दे, दूसरा पक्ष उसे ले। इस लेन देन में दोनों को आनन्द मिले तथा इन दोनों पक्षों से संबंधित लोगों को प्रसन्नता हो। यही विवाह का अर्थ है, भाव है, मूल्य है, महल है।

ऐसा विवाह लोकमान्य, सामाजिक एवं प्रशंसनीय है। विवाह के लिये स्त्री-पुरुषों को कुण्डलियों का मिलान किया जाता है। ऐसी स्त्री जो पुरुष के चित्त को क्षुब्ध करे मन को उद्वेलित करे, जीवन में अशान्ति पैदा करे, वह उसके लिये नरक तुल्प है।
इस लिये उसे त्यागना ही उचित है। वह स्त्री जो पुरुष के चित्त को शुधन करे, मन को आन्दोलित न कर, हृदय को ठेस न पहुंचाये, आत्मोन्मुख होने में सहायता करे, वरेण्य है। ऐसी का सत्कार करना सब प्रकार से श्रेष्ठ है। ये बातें स्त्री के सन्दर्भ में पुरुष के लिये भी हैं। स्त्री-पुरुष में भेद नहीं है। केवल शरीराय लिंग का भेद है।
यहाँ में एक महान स्त्री ब्रह्मवादिनी महिला की चर्चा कर रहा हूँ। शकुन्तला नाम की एक कश्मीरी देती ने मुझे अपनी ब्रह्मज्ञा दादी को कथा सुनाई थी। भारत के स्वतन्त्र होने से पहले की यह घटना है।
कश्मीरराज्य के श्रीनगर स्थान में एक धनाढ्य संस्कारवान् परिवार में अमरावती नाम की यह महिला सबके लिये प्रातः स्मरणीय है। ४० वर्ष की अवस्था प्राप्त होने पर इसने पढ़ना लिखना प्रारंभ किया। गृहस्थी का सम्पूर्ण कार्य करते हुए अनासक्त भाव से उपनिषदों का अध्ययन किया और तन्निहित वाक्यों को जीवन में उतारा। वह त्रिकालज्ञ हुई।
साधु सन्यासी उनके सामने शीष झुकाते थे। उठते-बैठते, सोते जागते, खाते-पीते स्नानादि करते तथा गृहस्थों के अन्य कार्यों को करते हुए वे सतत हा निष्ठ रहती थीं। उपनिषद के वाक्य उनके मुख से स्वभावतः निकलते थे। देवता प्रकट होकर उनके हाथ से भोजन करते थे, उनसे वार्ता करते थे। उनको वाणों अमोध घो।
अन्त समय दिव्य विमान आया। उस पर आरूढ़ हो कर सब के सामने वे परलोक चली गई। तस्मा देव्यै नमः ।

राम और सीता में वियोग हुआ। राम दण्डकारण्य में सीता को खोजते हुए रो रहे हैं। राम को सीता के वियोग ने विक्षिप्त कर दिया है। सीता भी अशोक वन में लंकावास करती हुई राम के लिये आसू बहा रही हैं। इन दोनों को मिलाने वाला कौन है ? जिसने सीता की खोज कर दोनों को एक दूसरे से मिला कर उनकी वियोग निशा का अन्त कर दिया उसे मैं प्रणाम करता हूँ।
वह पुरुष अरिन का मूर्तरूप है, साक्षात् अग्नि देवता है, जिसको साक्ष्य रखकर वैवाहिक कृत्य सम्पन्न होता है। इस पुरुष का नाम है-हनुमत् / हनुमान्। यह कैसे अग्नि हुए ?

अग्नि मन्त्र :
“अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्।
अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्॥”
~ऋग्वेद (१ । ४ । १२ । १),
अथर्ववेद (२० । १०१ । १ ।).
इस मंत्र में अग्नि को दूत कहा गया है। दूत वही होता है जो सब कुछ जाने अर्थात् ज्ञानी दूत का काम है, समाचार ले जाना और समाचार ले आना। राम ने अग्नि को अपना दूत बनाया और सीता का पता पाया तथा अग्नि की सहायता से सीता को प्राप्त भी किया।

अग्नि की उत्पत्ति होती है, वायु से शब्द स्पर्श रूप रस गंध तन्मात्रों से क्रमशः आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी की उत्पत्ति कही गई है। जैसे शब्द से स्पर्श, स्पर्श से रूप रूप से रस, रस से गन्ध की उत्पत्ति होती है, वैसे ही आकाश से वायु, वायु से अग्नि अग्नि से जल, जल से पृथ्वी का जन्म होता है।
जब अग्नि का पिता वायु है तो अग्नि में वायु के समान गति/ व्यापकता तथा शक्ति निश्चित रूप से है हनुमान जी वायु के पुत्र हैं। कहा गया है- पवन तनय, मारुतिनन्दन, पवनसुत।
हन् (अदादि परस्मै हन्ति) + छन् = हनु 【 मृत्यु】
हनु+मतुप्= हनुमत् । 【मृत्युरुप मारक नाशक काल अग्नि】
हनुमत् → हनुमान् का अर्थ है, अग्नि रामायण में वर्णन है कि हनुमान की पूँछ में आग लगाई गई जिससे लंका जली किन्तु हनुमान् न जले। क्या अग्नि अग्नि को जला सकती है ? जो अग्नि स्वरूप है, वही हनुमान है, वही परात्पर ब्रह्म राम का दूत है, वही महाप्रकृति सीता को ब्रह्म राम से संयुक्त करने वाला कालाग्नि है।
ऐसे हनुमान की शरण में जाने से स्त्री पुरुष का योग होता है वैर दूर होता है, मृत्युभय चला जाता है, शुभ होता है। तस्मै श्री हनुमते नमः।
वन् (ध्वादि परस्मै वनति पूजा करना सम्मान करना)+ रन् =वनर> वानर, स्वार्थे अणु। जो पूज्य है, सम्मान्य है, वह वानर है। हनुमान् वानर थे हैं। अग्नि पूज्य होने से वानर है। गोस्वामी तुलसी दास जी हनुमान की स्तुति अग्नि रूप में करते हैं। अग्नि अमित शक्ति शाली होने से अतुलित बलधाम है, स्वर्णिम वर्ण का होने से हेमशैलाभदेहं है, सब को जला कर नाश / क्षीण/कृश करने वाला होने से दनुजवनकृशानुं है, सर्वज्ञ होने से ज्ञानिनामयगण्य है, सर्वगुण सम्पन्न होने से सकल गुणनिधान है, पूज्यों (वानरों) का पूज्य होने से वानराणामधीशं है.
वायु से उत्पन्न होने से वातजातं है, ब्रह्म राम का अतिप्रिय होने से रघुपतिप्रियभक्तं हैं। ये आठ विशेषताएँ हैं कालरूप अग्नि हनुमान की, जो कि मृत्यु के मृत्यु हैं।
‘अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञाननामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥’
~सुन्दरकाण्ड (रा.च.मा.).
अग्नि ग्रह मंगल का रंग लाल है। अग्नि को मूर्तरूप देने के लिये लोक में सामान्यजन पत्थर की मूर्ति पर लाल रंग / सिंदूर पोत कर उसकी पूजा करते हैं। इस अग्नि मूर्ति को हनुमान् कहते है। यह मंगल भी लालरंग का उम्र ग्रह है। इस लिये मंगलवार को इस हनुमान की विशेषपूजा होती है।
लोग मंगल का दिन हनुमान से जोड़ लिये हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जाने अनजाने अग्नि की ही पूजा हो रही है।

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