–विनोद कोचर
लोहिया जब दुनिया से रुख़्सत हुए तब उनकी उम्र मात्र57-58बरस की ही थी।
इस उम्र में गांधीजी ने अफ्रीका में किये गए सत्याग्रह के प्रयोगों के साथ भारत में, अहिंसक राजनीति की शुरुआत की थी।
लोहिया अगर और भी 15-20 सालों तक जीवित रहते तो अपनी पूरी सक्रियता के साथ, अपनी बेजोड़ ऊर्जा व चिंतनधारा के साथ मुल्क की तकदीर बदलने की दिशा में, पता नहीं कितने अद्भुत आंदोलनों को जन्म दे चुके होते।
मधुलिमये की उम्र, जब वे मरण को प्राप्त हुए, तब71साल की हो गई थी और मरने के करीब13-14 साल पहले ही वे सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर लेखन, चिंतन मनन की दुनिया में जीने लगे थे ।इसलिए वे शायद आमरण भी वही कुछ कर रहे होते।
जब वे सक्रिय राजनीति से सन्यास ले रहे थे तब मुझे लिखे गए एक पत्र में अपने अंतर्जगत की पीड़ा को ,ये कहकर उन्होंने अभिव्यक्त किया था कि,’बिखराव की बाढ़ से मैं कब तक लड़ता?
मुझे उनके इस निर्णय से जो पीड़ा पहुंची थी उसे मैंने, उन्हें लिखे पत्र में अदम गोंडवी की इन काव्य पंक्तियों के जरिये जाहिर किया था कि:
वो तो बता रहा था बड़े दूर का सफर!
जंजीर खींचकर जो मुसाफिर उतर गया!
रहा सवाल किशनजी का!तो वे74साल के हो चुके थे लेकिन अपनी लेखनी की प्रासंगिकता और तेजस्विता से वे कम से कम5-10साल और, युवा पीढ़ी के दिलोदिमाग को डांवाडोल करते रहते।
किशन जी, लोहिया के संगठन संबंधी विचार के सौम्य आलोचक थे।एक जगह उन्होंने लिखा भी है कि,
” लोहिया का यह मानना था कि संगठन गौड़ है, असल चीज है–आंदोलन और विचार।लेकिन राजनीतिक परिवर्तन के लिए संगठन भी आंदोलन और विचार जितना ही महत्वपूर्ण होता है।संगठन संबंधी अपनी मान्यता के कारण लोहिया को काफी असफलताओं का भी सामना करना पड़ा!”
किशनजी अगर जीवित रहते तो कम से कम10-15वर्षों तक वे समता संगठन के माध्यम से समाजवादियों को संगठित अवश्य करते रहते और यही उनकी अभिलाषा भी थी।
डॉ लोहिया, मधु लिमये और किशन पटनायक के लिए संयुक्त रूप से, दिनकर के शब्दों में ये कहा जा सकता है कि:
दुनिया कहकर चली गई,
क्यों ध्वजा गिरी तेरे कर से?
पूछा नहीं, अनल यह कैसा,
फूट रहा तेरे स्वर से?
गिरि श्रृंगों पर अभय आज भी,
शंख फूंकता चलता हूँ!
बुझा कहाँ मैं?
मध्यसूर्य के आलिंगन में जलता हूँ!

