शैलेन्द्र चौहान
बेंगलुरु में इसरो से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक 65 वर्षीय वी नागेश्वर राव ने 18 फरवरी को अपनी पत्नी की हत्या कर दी—सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है; यह आधुनिक पारिवारिक संरचना और वृद्धावस्था के अकेलेपन की एक गहरी सामाजिक त्रासदी को उजागर करती है। राव कभी देश की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से जुड़े रहे थे। जीवन भर विज्ञान, तकनीक और राष्ट्रनिर्माण में योगदान देने वाला व्यक्ति अंततः एक ऐसे भय से पराजित हो गया, जिसका संबंध विज्ञान से नहीं बल्कि मनुष्य के सबसे मूल भाव—अकेलेपन—से था।
इस घटना का सबसे मार्मिक पक्ष यह बताया जा रहा है कि उनकी एकमात्र बेटी अमेरिका में रहती है और राव को यह गहरी चिंता थी कि उनके बाद उनकी पत्नी की देखभाल कौन करेगा। यही चिंता धीरे-धीरे एक भय में बदल गई—और वही भय अंततः एक विकृत और दुखद निर्णय में परिणत हुआ।
आधुनिक परिवार का विघटन –
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारतीय समाज में संयुक्त परिवार एक ऐसी संरचना था जिसमें वृद्धावस्था का अकेलापन अपेक्षाकृत कम था। माता-पिता, बेटे-बेटियाँ, बहुएँ, पोते—सब मिलकर एक सामाजिक सुरक्षा जाल बनाते थे।
लेकिन वैश्वीकरण, शिक्षा और रोजगार के नए अवसरों ने इस संरचना को तेजी से बदल दिया। आज बच्चों का विदेश या महानगरों में बस जाना सामान्य बात है। यह परिवर्तन अपने आप में नकारात्मक नहीं है; यह आधुनिकता और अवसरों का संकेत भी है। किंतु इसके साथ एक नई विडंबना पैदा हुई है—वृद्ध माता-पिता का भावनात्मक और सामाजिक अकेलापन।
प्रवासन और भावनात्मक दूरी –
प्रवासी संतानों की स्थिति भी कम जटिल नहीं होती। वे अपने माता-पिता से प्रेम करते हैं, उनकी चिंता भी करते हैं, पर भौगोलिक दूरी जीवन की व्यावहारिक सीमाएँ बना देती है। फोन, वीडियो कॉल और आर्थिक सहयोग भावनात्मक उपस्थिति का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाते।
ऐसी स्थिति में वृद्ध दंपत्ति का जीवन अक्सर दो लोगों के छोटे से संसार में सिमट जाता है। यदि उनमें से कोई एक बीमार हो जाए या मानसिक रूप से अस्थिर हो जाए तो पूरा संतुलन टूट सकता है।
देखभाल का भय –
वृद्धावस्था का सबसे बड़ा भय मृत्यु नहीं, बल्कि निर्भरता है। व्यक्ति को डर होता है कि यदि वह स्वयं असहाय हो गया तो उसकी देखभाल कौन करेगा। परंतु उससे भी अधिक पीड़ादायक प्रश्न तब उठता है जब व्यक्ति अपने जीवनसाथी की असुरक्षा के बारे में सोचने लगता है—“मेरे बाद उसका क्या होगा?”
यह प्रश्न केवल व्यक्तिगत चिंता नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रश्न है। क्योंकि आधुनिक समाज ने वृद्धावस्था की सामुदायिक संरचनाओं को कमजोर किया है, जबकि उनके स्थान पर पर्याप्त वैकल्पिक संरचनाएँ अभी विकसित नहीं हुई हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी –
वृद्धावस्था में अवसाद और चिंता अत्यंत सामान्य मानसिक अवस्थाएँ हैं, पर भारतीय समाज अभी भी इन्हें गंभीरता से नहीं लेता। डॉक्टर, दवाएँ और अस्पताल शरीर की बीमारी का इलाज तो करते हैं, पर मन के अकेलेपन और भय का उपचार केवल सामाजिक सहारा ही कर सकता है।
यदि परिवार, पड़ोस, समुदाय और सामाजिक संस्थाएँ सक्रिय हों तो ऐसे भय को कम किया जा सकता है। किंतु जब व्यक्ति स्वयं को धीरे-धीरे दुनिया से कटता हुआ महसूस करता है, तब उसके भीतर का भय कभी-कभी असामान्य और त्रासद रूप ले सकता है।
एक व्यापक सामाजिक प्रश्न –
नागेश्वर राव की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि तकनीकी प्रगति और आर्थिक सफलता के बावजूद हम सामाजिक रूप से कितने तैयार हैं। हमारे शहरों में गगनचुंबी इमारतें और डिजिटल नेटवर्क तो बन गए हैं, पर क्या हमने वृद्ध मनुष्यों के लिए भावनात्मक सहारे की संरचना भी बनाई है?
समाज को अब इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना होगा—
वृद्ध लोगों के लिए सामुदायिक सहयोग की व्यवस्था
मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत
परिवारों में नियमित संवाद
और प्रवासी संतानों के साथ नए प्रकार के सामाजिक संबंध
यह घटना केवल एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं है; यह हमारे समय की सामाजिक विडंबना का दर्पण है। विज्ञान, तकनीक और वैश्विक अवसरों के इस युग में भी मनुष्य का सबसे बड़ा संकट वही पुराना है—साथ का अभाव और भविष्य का भय।
तकनीकी सभ्यता ने मनुष्य को आकाश तक पहुँचने की क्षमता दे दी है, परन्तु मनुष्य के हृदय के भीतर जो शून्य बनता जा रहा है, उसका कोई वैज्ञानिक समाधान अभी नहीं है।
वृद्धावस्था का सबसे बड़ा संकट शरीर की दुर्बलता नहीं, बल्कि साथ के लुप्त होते आश्वासन का संकट है। जब समाज की संरचनाएँ कमजोर पड़ जाती हैं, तब व्यक्ति अपने भय के साथ अकेला रह जाता है—और कभी-कभी वही भय त्रासदी का रूप ले लेता है।
इसलिए यह घटना केवल एक अपराध की कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के सामने खड़े उस प्रश्न का संकेत है—
क्या हम प्रगति के साथ-साथ मनुष्य के लिए सहारा देने वाली सामाजिक संरचनाएँ भी बना पा रहे हैं?
मो. 7838897877

