मीना राजपूत
दुनिया में हर किसी को एक साथी की जरूरत है
चाहे वह एक पुरुष हो या वह एक स्त्री सबको।
आज की इस दौड़ में सब की एक ही चाहत रहती है
एक ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो समझे उसे।
फर्क इतना है कि सभी का व्यक्तित्व एक सा नहीं
क्योंकि यहां हर कोई मुखौटे में लिपटा मिलता है।
दुनिया जितनी दूर से खूबसूरत दिखती है
काश !उतना ही खूबसूरत होती तो क्या बात है?
एक पुरुष को ऐसी साथी की तलाश होती है
जो उसे समझे और स्नेह से सराबोर कर दे।
उसे जीवन में एक मित्र चाहिए फिर मित्र से ज्यादा
फिर यह चाहत उसे आकर्षण की ओर ले जाता है।
चाह कर भी एक पुरुष निरंतर अपने जीवन में
अपने आप को नियंत्रित नहीं रख पाता है ।
उसे एक मित्र और प्रेम से ज्यादा चाहिए होता है
जो हमारे जीवन में हमेशा संभव नहीं हो पाता है।
वहीं दूसरी ओर स्त्री को भी एक साथी चाहिए
एक ऐसा मित्र जो उसे पूर्ण रूप से समझ सके।
एक स्त्री के नजरिए से वह हमेशा चाहती है
उसे समझौते के रिश्तो से ऊपर एक रिश्ता चाहिए।
जो हर सुख दुख में साथ दें, जो पूर्ण रूप से समझे
जिसकी चाहत रूप और आकर्षण तक ना हो।
उसे अपनी तकलीफ साझा करने के लिए
एक ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो उसके जैसा हो।
दोनों एक दूसरे के समकक्ष होकर भी विपरीत है
चाह कर भी दोनों की समरूपता नहीं बन पाती है।
पुरुष समर्पित होने के बाद भी समर्पित भी हो पता
और स्त्री सिर्फ सुख-दुख के साथी को तलाशती है।
कुछ स्त्रियां अपनी गरिमा से ऊपर उठ जाती है
वह हर बंधन को तोड़ उन्मुक्त हो जाती है।
परंतु अक्सर ही स्त्रियां मर्यादाओं में बंधी होती हैं
जिसके बेड़ियों से वह मुक्त होना ही नहीं चाहती हैं।
एक पुरुष हमेशा एक ऐसी स्त्री की तलाश करता है
जो पूर्ण रूप से सिर्फ उसकी होकर रह जाए।
दूसरी तरफ वहीं पुरुष स्त्रियों के लिए नही समझ पता
जबकि कुछ स्त्रियां पूर्ण रूप से समर्पित होती है।
तलाश दोनों की खत्म होती है कभी ना कभी
परंतु इच्छाएं असीमित है जो समाप्त ही नहीं होती।
तलाश खत्म होने के बाद भी ठोकरें ही मिलती है
कुछ इच्छा हमारे पवित्र रिश्ते को धूमिल कर देती है।
शायद! कभी आकर्षण से दूर होकर भी कभी
जीवन में ऐसा कोई साथी बन पाए जो निश्छल हो।
मुझे नहीं लगता बिना स्वार्थ के कोई रिश्ता मिले
क्योंकि अंततः व्यक्ति को आकर्षण तक जाना होता है।
मित्रता, साथी, संगिनी, प्रेम सबसे पार करने के बाद
पुरुष अक्सर ही स्त्री के अंकोर में समाना चाहता है।
परंतु कुछ स्त्री समर्पित होकर भी मर्यादित होती है
वह अपने रिश्ते को निहित स्वार्थ में नहीं जीना चाहती

