अग्नि आलोक

बंदे भारत : मी लार्ड! अमीरों को सबकुछ दो, बस गरीबों की जान मत लो

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मोती यादव

     _पूंज़ी-परस्त फांसीवादी सत्ता को आम-अवाम से कोई सरोकार नहीं होता, उनके वोट से सत्तासीन होने के आलावा. समूचे विश्व का इतिहास इस सच का साक्षी है. आज का भारत यानी यहाँ की आम जनता तो प्रत्यक्षदर्शी और भुक्तभोगी भी है. बंदे भारत ट्रेन चलाने के विकास के अलोक में भी इसे समझा जा सकता है. यहाँ एक उदाहरण से हम आपको सच दिखा रहे हैं :_

दिल्ली – सहारनपुर रूट : ट्रेन के इस रूट पर पर मेरठ के बाद दौराला, खतौली, सामली, टपरी पड़ता है.  दिल्ली-सहारनपुर के मध्य एक अलग तरह की कौम बहुतायत में प्रतिदिन सफ़र (सच में suffer) करती थी/है.

      इस विशिष्ठ कौम को “डेली पैसेन्जेर” कहा जाता था/है। इनमें आधी आबादी तो ऐसी होती थी/है जो अपने बच्चों को सोता हुआ छोड़ कर घर से निकल जाती थी/है और रात को उनके सोने के बाद ही घर पहुंचती थी/है.

     अपनी स्वयं की नींद वह ट्रेन की अपर बर्थ अथवा सामान रखने वाली फट्टी पर सो कर पूरी करती है। वो जिन ट्रेनों से अपने गंतव्यों तक आवागमन करते थे/हैं उनमें AC तो छोड़िये पंखे भी अपनी मर्ज़ी से चलते थे और ट्यूब लाइट भी। परंतु वो ट्रेन वास्तव में अनगिनत परिवारों और उनके पालनहारों की जेब पर कभी भारी नहीं हुई।.

    हाँ, वो बात अलग है कि वो अनंत का ज्ञान कराने वाली चाल से चला करती थी/हैं, उन्हें जब, जहाँ चाहो घंटों रोक लो, लेट चला लो परंतु नाम मात्र के खर्चे पर वो एक मध्यम वर्गीय व गरीब आदमी के बालक पलवा दिया करती थी।

     बाप सारा जीवन इन मंद किंतु मंदी ट्रेनों में डेली पैसेन्जेरी करके अपनी नौकरी पूरी कर लिया करता था/है।

    आज इस रूट को एक आलीशान नई ट्रेन मिलने का जश्न प्रत्येक बड़े स्टेशन पर देखने को मिला! अच्छा भी लगा कि देश के साथ-साथ अपना ये छोटा सा रूट भी तरक्की कर रहा है। परंतु किस कीमत पर?

     क्या कोई बता सकता है कि इस रूट पर कितनी डेली पैसेन्जेरी वाली ट्रेनों को बंद करके ये उपलब्धि हासिल हुई है? सच बताना कि कितने प्रतिशत लोगों को इस नई ट्रेन के चलने से लाभ होगा और कितने प्रतिशत लोगों को उन पुरानी ट्रेनों के बंद करने से हानि?

      यदि हम इसे 80-20 के हानि-लाभ से देखें तो क्या हमारा आंकड़ा गलत है? हम किसी भी नई उपलब्धि के विरोधी नहीं है, परंतु वो किस कीमत पर मिल रही है ये भी तो देखा जाना चाहिए, या नहीं?

   कम प्रतिशत वाले अमीर लोगों की नहीं बल्कि अत्यधिक प्रतिशत वाले गरीब व निम्न मध्यम वर्ग की बात करें तो दो-एक बार शौक में या केवल मज़ा लेने के लिए या इसके अंदर का जायज़ा लेने के लिए तो मैं भी या कोई भी इस नई ट्रेन का टिकट ले सकता है परंतु हमेशा शायद इस में सफ़र ना कर सके! क्योंकि 50-60 और 600-700 में बहुत अधिक अंतर होता है।

         हम ये नहीं कह रहे कि आधुनिक व तीव्र गति वाली ट्रेन मत चलाइये. हम तो ये कह रहे हैं कि जो चल रही थी उनको तो बंद मत कीजिये। अमीरों को सबकुछ दे दीजिये, लेकिन गरीबों को कम से कम जीने तो दीजिये.(चेतना विकास मिशन).

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