लार्ड माउंटबेटन गांधी से बचने के लिए उनसे उनके मौन दिवस ( सोमवार) पर मिलते थे। गांधी पुराने लिफाफों पर लिखकर अपना जवाब देते। वाइसराय माउंटबेटन ने ये लिफाफे उम्र भर संभाल कर रखे। गांधी के ये लिफाफे अब ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित रखे हुए हैं।
सितंबर 1941 में जब दूसरा विश्वयुद्ध जारी था। ब्रिटिश कप्तान लुइस माउंटबेटन अमेरिका में सैनिकों को संबोधित कर रहे थे। जब भाषण के बाद एक फौजी ने उनसे पूछा कि अमेरिका कब और किस जगह से इस जंग में कूदेगा? माउंटबेटन ने नक़्शे पर पॉइंटर को पर्ल हार्बर पर रख दिया। हुआ भी यही तीन महीने बाद जापान ने पर्ल हावर पर हमला कर दिया। इसी प्रकार माउंटबेटन ने वर्मा में जीत दर्ज की।
बर्मा और जापान को नतमस्तक कराने वाले अंग्रेज योद्धा माउंटबेटन को ब्रिटिश प्रधानमंत्री इटली ने भारत का आख़िरी वाइयराय बनाकर भारत भेजा।
‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखा है कि माउंटबेटन वायसराय बनकर हिंदुस्तान नहीं आना चाहते थे।
माउंटबेटन ने आने से पहले और बाद में समझ लिया था कि अगर उन्हें सफलता प्राप्त करनी है तो महात्मा गांधी को अपने साथ लेकर चलना होगा।
माउंटबेटन ने गांधी से मिलने के लिए हर हफ़्ते के सोमवार का दिन निश्चित किया था. ऐसा इसलिए कि उस दिन गांधी का मौन दिवस होता था. दरअसल माउंटबेटन को लगता था कि गांधी से बात-बहस कर उन्हें बंटवारे के लिए मनाना बहुत मुश्किल होगा. उधर, गांधी भी कम होशियार नहीं थे. वे अपने साथ पुराने लिफ़ाफ़े रखते और माउंटबेटन के हर प्रश्न का उत्तर लिख कर देते। माउंटबेटन इस बात से इतने अभिभूत हुए कि ये लिफ़ाफे उन्होंने ताज़िंदगी संभाल कर रखे।
आज़ादी से दो हफ्ते पहले उन्होंने ‘चैंबर ऑफ़ प्रिंसेज’ के राजाओं और नवाबों को संबोधित किया. रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि वायसराय का यह हिंदुस्तान के लिए सबसे बड़ा योगदान था. माउंटबेटन ने वहां मौजूद राजाओं को चेतावनी दी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद रियासतदारों की हालत अब ‘बिना पतवार की नाव’ जैसी है और अगर उन्होंने भारत में विलय न किया तो इससे उपजी अराजकता के लिए वे ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे. माउंटबेटन के शब्द थे, ‘आप अपने सबसे नज़दीक पड़ोसी यानी आज़ाद भारत से भाग नहीं सकेंगे और न ही लंदन की महारानी आपकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेंगी. बेहतर होगा कि आप आज़ाद होने का ख्व़ाब न देखें और हिंदुस्तान में विलय को स्वीकार करें.’ इस संबोधन का असर यह हुआ कि 15 अगस्त, 1947 आते-आते लगभग सारे राजाओं और नवाबों ने विलय की संधि पर दस्तख़त कर दिए।
इंग्लैंड लौटने से पहले माउंटबेटन गांधीजी से आखिरी बार मिलने 1 दरियागंज आये और उन्होंने गांधीजी से कहा ” महात्मा जी अंग्रेज हुकूमत ने आप को जाने अनजाने बहुत कष्ट दिए और आपको जेल में डाला। अगर मेरे कार्यकाल में कभी भूल से भी कोई कटुवचन निकल गया हो तो मैं आपसे माफी मांगता हूं।”
गांधीजी ने मुस्कराते हुए कहा कि वाइसराय साहब मैँ चाहता हूं कि आप कुछ दिन और यहां रहें और मेरे पास ही रहें। शर्त यह होगी कि आपको वाइसराय भवन छोड़ना होगा और जैसे मैं सारा काम अपने हाथ से करता हूँ आपको भी करना होगा। गांधीजी की इच्छा को देख माउंटबेटन जरूर हैरान हुए होंगे खैर जब अंतिम गवर्नर जनरल की नियुक्ति हो गयी तो 21 जून, 1948 को माउंटबेटन और एडविना इंग्लैंड चले गए। जैसा तय हुआ था, उन्हें ब्रिटिश नेवी का अफसर बनाया गया और 1956 वे इसके सबसे बड़े अफ़सर, एडमिरल ऑफ़ फ्लीट बनाये गए. इस तरह से इंग्लैंड के इतिहास में वे अकेले शख्स हैं जो वायसराय और एडमिरल ऑफ़ फ्लीट रहे।
27 अगस्त 1979 को आयरलैंड की पार्टी आईआरए ने लुइस माउंटबेटन की नाव को बम से उड़ाकर उन्हें मार दिया था. एलेक्स वॉन तुन्जलेमन ‘इंडियन समर’ में लिखती हैं, ‘उनकी लाश पानी में उल्टी तैरती हुई मिली. कभी उन्होंने अपने दोस्तों से कहा था कि उनकी इच्छा है कि वे समुद्र में आख़िरी सांस लें।’
मूल लेखन अनुराग भारद्वाज
Gandhi Darshan – गांधी दर्शन
25 June 2025

