डॉ. विकास मानव
*सुहृदं सर्वभुतानां ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति।*
मुझे प्राणीमात्र का अ-हेतुक, नि स्वार्थ प्रेमी जानने वाले को शांति मिल जाती है। ‘-गीता।
अगर कोई कहे इसका अनुभव नही होता तो इसका अनुभव उसके जन कराते हैं। गुजराती में भगवान नो माणस उसीको कहा है। जितने भी महापुरुष हैं वे सब सुहृदं सर्वभूतानां को ही चरितार्थ करने में लगे रहते हैं। भले ही ज्ञानमार्ग के हों, भक्तिमार्ग या कर्म मार्ग के। वे अपने ईश्वरीय संदेशों से आपको, आपसे स्वयं से जोड़ देते हैं।अभी टूटे हुए हैं।
हम मूलतः हृदय स्वरुप हैं। वही हमारा आपा है पर मन में जो मै का विचार है, मैं की मान्यता है, अहम्मन्यता है हम उससे भी जुड़ जाते हैं जिससे हम दो भाग में विभाजित हो जाते हैं-मन तथा हृदय, आत्मा तथा अनात्मा, जड तथा चेतन, मै तथा स्वयं(सेल्फ) के रुप में।
मन अर्थात मै के रुप में मैं बहिर्मुखी होकर स्वयं से टूट जाता हूँ। मेरा ध्यान बाहर की ओर रहता है। अब मैं स्वयं से जुडूं, स्वयं के साथ रहूँ, स्वयं के रुप में रहूँ तो मेरा मौलिक परिवर्तन हो और स्थायी सुखशांति का अनुभव हो। मुझे कई तरह की साधनाएं बतायी जाती हैं जो मै कर नहीं पाता फलतः हताशा हाथ लगती है।
ऐसे में कोई सच्चा प्रेम करने वाला मिल जाता है तो वह मुझे आश्वासन देता है, धीरज बंधाता है,दोष नहीं देखता।अपना प्रेम महसूस कराता है।
कोई भी वास्तविक गुरु कभी दोष नहीं देखते। वे प्रकृति के गुण देखते हैं जिनसे हम बंधे हुए हैं या बंधे प्रतीत होते हैं।
वे उनसे हमें सजग करते हैं। उनका हमें दोष दृष्टि से न देखना ही उनका प्रेम होता है। फिर वे स्वयं जिस मार्ग पर चलकर सिद्धि पाये होते हैं वही मार्ग वे हमें भी बताते हैं। उनका प्रेम, उनका अनुग्रह पूर्ण व्यवहार हमारे उत्साह में वृद्धि करता है।
ये उस कुशल अध्यापक की तरह होते हैं जो सप्रेम विद्यार्थियों को अपने आपको समझने में मदद करते हैं। वे विद्यार्थियों को भयभीत नहीं करते अपितु उन्हें समझाते हैं कि भय क्या होता है, कैसे होता है?
वे क्रोध नहीं करते अपितु क्रोध को समझने में उनकी सहायता करते हैं।उन्हें स्पष्ट बोध नहीं है तो वे क्या करें, उन्हें सहायता चाहिए। वह मिल जाये तो बहुत अच्छा हो जाता है।
इसी तरह जीव, गुणों के पाशों से बंधा हुआ है। गुण अपना कार्य करते रहते हैं।उनसे बंधा मूर्छित जीव उनके कार्य को अपना कार्य मान लेता है। इससे बंधन और अधिक बढ जाता है।
जो इसे जानते हैं वे इस बंधन से छूटने में मदद करते हैं।
वे रास्ता बताते हैं। और उससे भी बडी चीज होती है उनका प्रेम। क्योंकि जो प्रेम कर सकता है वह कोई नहीं कर सकता। अहंकार सबमें होता है और उसे सबसे ज्यादा भय होता है दोष दृष्टि से।
प्रेम कभी दोष नहीं देखता। प्रेम गुण भी नहीं देखता। गुण दृष्टि होगी तो दोष दृष्टि भी होगी ही। पूरा समाज इसी सांचे में ढला है। इस सांचे में मौलिक परिवर्तन की कोई संभावना नही है।
प्रेम इस सांचे के बाहर है। वह किसीकी अच्छाई बुराई को लेकर किसी से बंधता नहीं।
वह स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता ही उसकी ताकत है।वह किसी को तोडता नहीं। वैसे ही सब टूटे हुए हैं। जो भी उसके पास आता है वह उसे जोड देता है अपने आपसे। तभी तो वह प्रेम है, तभी तो उसे परमात्मा का स्वरूप कहा है।
सुहृदं सर्वभूतानां– उसी की घोषणा है।
आजके समय में खुद को खुद से जुडने में मदद करने वाले कितने हैं यह विचारणीय है. फिर भी उनका सर्वथा अभाव नहीं है, न कभी होगा।वे महान आत्मा देह से नहीं तो उनकी वाणी से, ऊर्जा से आज भी विद्यमान हैं।
उनकी वाणी का पठन पाठन, स्वाध्याय, सत्संग आज भी मदद कर सकता है। ये बात जरुर है कि उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति का महत्व विशेष है, उससे होने वाला लाभ भी विशेष है। नहीं तो उनकी वाणी तो है ही। और आज भी अनेक जगह अनेक आध्यात्मिक सत्पुरुष मिल जायेंगे।
यह धरती उनसे कभी खाली होने वाली नहीं है। यदा यदा हि धर्मस्य…….!
उनका सच्चा प्रेम हमें, हमसे स्वयं से जोड़ देता है।अहंकार को आत्मा से जोड़ देता है। आत्मा (सेल्फ) से जुडने पर ही दिमागी हालत ठीक होती है अन्यथा आत्मा (सेल्फ) से टूटा अहंकार बहिर्मुखी होकर आपे से बाहर ही रहता है।सुखदुख के द्वंद्व बने रहते हैं।
निर्द्वन्द्व हो तो आपे में रहने की संभावना बने या आपे में रहे तो निर्द्वन्द्व हो। और आपे में रहना संभव है जब सच्चा प्रेम हमें, हमसे स्वयं से जुडने में मदद करे। जाहिर है यह अहंकार का काम नहीं है। अहंकार तो वैसे भी टूटा रहता है ऐसे में किसीका अहंकार और ज्यादा तोडता है।
सभी के अहंकार एक दूसरे को तोडने में ही लगे रहते हैं। यह संभव नहीं कि अहंकार हो फिर भी सहजता बनी रहे।
यह तो किसी अहंकार शून्य सरल हृदय सत्पुरुष का ही काम है जो हमें, हमसे जोडे।हमें सुखपूर्वक अपने आपमें रहने दे।हर आदमी यही तो चाहता है।
अपने प्रयास से अपने आपसे जुडना बेहद मुश्किल होता है।यह कुछ लोगों के लिए ही संभव है जो पूर्व जन्मों से साधना करते आये हैं बाकी रागद्वेष करने वाले जगत के मध्य रहकर जहाँ हम भी अपने रागद्वेष के वश में हैं वहां हमारा अपने सच्चे स्वरूप से जुड़ना किसी चुनौती से कम नहीं।
यह चुनौती बाहर नहीं हमारे भीतर है। यदि हम अपने हर अनुभव के साथ रह सकें बिना उसे रोके, बिना भागे, बिना शब्दीकृत किये तो हम अपने आप में रह सकते हैं।
अपने विरुद्ध कोई भी प्रतिक्रिया किये बिना अपने आपके साथ रहने के लिए महान प्रज्ञा चाहिए : प्रज्ञानं ब्रह्म।
(लेखक मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक एवं चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)

