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मदारी (एक लघुकथा)

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एक फ़क़ीर गाँव में आया । बच्चों ने उसे घेर लिया । फ़क़ीर ने अपने झोले में से पकवान निकाले, फूल निकाले, खिलौने निकाले और फिर तृप्त बच्चों को सुन्दर-सुन्दर, क़ीमती रेशमी कपड़ों से सजा दिया । बच्चे अब राजकुमारों जैसे लग रहे थे । वे ख़ुश थे, बार-बार फ़क़ीर को चूमते और तालियाँ बजाते । गाँव के लोग इस दृश्य को देखकर विह्वल हो गये और फ़क़ीर की जय-जयकार करने लगे । फ़क़ीर ने झोला उठाया, सबको प्रणाम किया और अगले गाँव की तरफ़ चल दिया । उसके जादू में बँधी भीड़ भी जय-जयकार करती उसके पीछे-पीछे चल दी ।           फ़क़ीर ने उधर गाँव की सीमा लाँघी कि इधर बच्चे भूख-भूख चिल्लाते हुए रोने लगे । उन्हें इतनी भूख महसूस हो रही थी कि जैसे जन्म के बाद से उन्होंने कुछ भी न खाया हो । सारे फूल, खिलौने और रेशमी वस्त्र भी ग़ायब हो गये थे । आश्चर्य तो यह कि उनके तन के वे पुराने वस्त्र भी अब उनके तन पर न थे । गाँव भर ने इसे क़िस्मत का खेल माना तथा यह तय पाया कि उनकी क़िस्मत के बंद हो गये तालों को वह फ़क़ीर ही खोल सकता है । गाँव उस फ़क़ीर का भक्त हो गया । कोई नहीं समझ पाया कि दरअसल वह फ़क़ीर एक मदारी था और कुछ पलों का करतब दिखा बच्चों के पेट का खाना तथा तन के वस्त्र लूट ले गया था । 

– हरभगवान चावला,सिरसा,हरियाणा 

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