अग्नि आलोक

*संघ परिवार के फासिस्ट चेहरे को बेनकाब करने में मधु लिमये ने  एतिहासिक भूमिका निभाई*

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मधु लिमये की जन्म-जयंती पर स्मरण  ! 

आज बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे या कार्यक्रम की शुरुआत, इतिहास के क्रम में डाॅ राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसी बहस सत्तर के दशक की शुरुआत में डाॅ राम मनोहर लोहिया के कारण और बाद में 1974 के जेपी आंदोलन की ही देन है कि 1950 को पैदा हुई जनसंघ 1980 मे नया नाम भारतीय जनता पार्टी इकतालीस साल पहले स्थापित दलने भारत की संसदीय राजनीति का धर्मनिरपेक्ष चरित्र को तार तार करने के कारण आज भारत अघोषित हिंदू राष्ट्र के तौर पर बेखटके चला जा रहा है ! और आज शताब्दी के शुरू के दिन मधु लिमये जी  की बरबस याद आ रही है ! क्योंकि वह भी जनता पार्टी मे जनसंघ को शामिल करने के विरुद्ध थे ? और उन्होंने यह शर्त रखी थी कि जनता पार्टी बनने के बाद पुराने जनसंघ के लोग आर एस एस के सदस्यता त्याग देंगे ! लेकिन उनकी बात की अनदेखी कर के कारण अंतिम परिणाम जनता पार्टी नाम की कई-कई परस्पर विरोधी विचारधारा के (मुख्यतः)संघ परिवार की राजनीतिक इकाई जनसंघ के दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता पार्टी की टूटन के असली नायक मधु लिमये ने  एतिहासिक भूमिका निभाई है ! इसलिए आनेवाले पुरे साल भर में उनके तारीफों के कशिदे पढने की जगह संघ परिवार के फासिस्ट चेहरे को बेनकाब करना सही श्रद्धांजलि होगी  !

    डॉ सुरेश खैरनार

            अपनी शिक्षा और उम्र के पंद्रह साल में काॅलेज मे दाखिला ! क्योंकि उनकी बौद्घिक क्षमता को देखते हुए एक साल मे तीन कक्षाओं को पास करके ! वह पंद्रह साल की उम्र में काॅलेज मे दाखिल हुए थे ! और उन्होंने इतनी कम उम्र में ग्रीक संस्कृति का यूरोप पर क्या परिणाम हुआ ! इस विषयपर और 1935 के फेडरेशन अॅक्ट के यशस्वी प्रयोगों जैसे ! देश और आंतरराष्ट्रीय विषयों पर निबंध लिखकर ,अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है ! और इसी कारण वह पुणे में एस एम जोशी जी के संपर्क में आने के कारण उनके जीवन के परिवर्तन की शुरुआत हो जाती है  ! और धुलिया जेल,साने गुरूजी के साथमे( 1940-41) रहने के कारण एस एम जोशी और साने गुरूजीने जो प्रेम और बौद्धिक मार्गदर्शन किया, वह मधुजी को संपूर्ण जीवन के लिए काम आया !

           मध्य-वित्त परिवार का सुरक्षित जीवन शैली छोड़कर पुणे से पाचसौ किलोमीटर की दूरी पर  खानदेश मे 1938 के आखिर में एस एम जोशी जी के साथ पहली बार खान्देश की यात्रा में साथ में गये थे और उनकी उम्र थी सोलह साल ! उस के पहले अपने पुणे के शिक्षा के साथ – साथ पढाई के अलावा जो अध्ययन किया उसमें साहित्य, कला समाज और राजनीति के अन्य हमउम्र बच्चों की तुलना में बहुत ही अधिक अध्ययन के कारण उम्र के तुलना में उनके सभी क्षेत्रों के बारे में वैचारिकता की बुनियाद बनने के कारण एक लव्य के जैसे स्वाभाविक रूप से प्रगतिशील विचारों के बनने मे मदद मिली !

           और इस तरह राष्ट्र सेवा दल के कामके लिए, पहले से ही बौद्धिक तैयार साथी ! आजसे अस्सी साल पहले मधु लिमये नाम का एक सोलह साल का ! किशोर जाकर, राष्ट्र सेवा दल के दैनिक शाखा से लेकर अभ्यास मंडल जैसी गतिविधियों को चलाता है  ! और आज से अस्सी  साल पहले खानदेश जैसे पारंपरिक जीवन शैली मे एक सोलह साल का युवक मुख्यतः महिला और युवतियों के बिचमे राष्ट्र सेवा दल की पंचसुत्री  को कायम करने की कोशिश करता है !(जो कि आज नब्बे साल उम्र के लोगों को भी ढंग से प्रस्तुत करना आता नहीं है !)

        वैसे भी खानदेश की भूमि पर साने गुरूजी के कारण अंमलनेर और धुलिया, जलगांव और चालिसगांव की प्रताप कपडा मिल के मजदूरों का संगठन ,और खानदेश के किसानों को संगठित करने की कोशिश की है  ! वह जमीन पहले से ही तैयार थी ! 

         11 जून 1950 के दिन साने गुरूजी के अंतिम पत्र जिसमें किसने क्या काम करने चाहिये ! इस बात की सूचना मे गुरूजी ने मधु लिमये ने खानदेश मे ही, अपने कामको करने के लिए स्पष्ट रूप से लिखा है  ! क्योंकी साने गुरूजी ने मधु लिमये की प्रतिभा और काम के प्रति समर्पणकी भावना को भांप लिया था !

                   जब सितंबर 1940 में मधू लिमये साक्री तालुका मे युद्ध विरोधी भाषण देते हुए घुम रहे थे ! तो उस समय के धुलिया के कलक्टर के अॉर्डर से उन्हें शायद जिंदगी में पहली बार गिरफ्तार किया गया ! तब उनकी उम्र अठारह साल से भी कम थी ! लेकिन साक्री के कोर्ट में सुनवाई के दौरान उन्होंने अपने बचाव में वकिल नही लीया ! जब कोर्ट में सुनवाई जारी रहते हुए वे एकदम निस्चिंत रूप से खडे रहे ! जजने उन्हे छोटे उम्र के देखकर मन-ही-मन में छोड देने का फैसला किया हुआ था ! लेकिन उन्होंने फैसला सुनाने के पहले मघू लिमये ने, अपनी जेब से अपना लिखित बयान पढ़ने की इजाजत मांगी ! तो जजने वह दी ! तो उस निवेदन में तो अंग्रेजी में अपने हाथों से लिखित बयान में कहा था कि “वर्तमान दुनिया में चल रहा द्वितीय विश्व युद्ध, जनतंत्र में राष्ट्र की स्वतंत्रता का युद्ध नहीं है ! इस युद्ध में भारत की जनता को उसकी इच्छा के विरूध्द जबरदस्ती से शामिल किया गया है ! और ऐसे युद्ध को सहकार्य नही करने से भारतीय जनता को बताना ! यह मै अपना कर्तव्य निभाने का काम कर रहा हूँ ! और मेरे इस अपराध के लिए आपको मुझे जितनी भी सजा देनी हो , तो मुझे कोई पर्वा नही है !”

              और जजने उन्हें सजा देने के वक्त कहा कि “आरोपी की कम उम्र और उसके पहले ही अपराध के कारण मै उसे नौ महीने की जेल और सौ रुपए का जुर्माना लगाने की सजा सुना रहा हूँ ! और जुर्माना नहीं देने से और अधिक तीन महीने की जेल की अवधि बढ़ाने के लिए आदेश दे रहा हूँ ! इस तरह मधू लिमये को अठारह साल से कम उम्र के होने के कारण धुलिया के बाल सुधार गृह में साक्री से स्थानांतरित किया गया ! उसी जेल में कुछ दिनों बाद साने गुरुजी भी आये ! और इस तरह जेल के सहवास में साने गुरुजी तथा मधू लिमये की और नजदीकी बढी ! तब  मधू लिमये की प्रतिभा को देखते हुए उन्होंने कहा कि तुम जेल में बंदीयो के सामने भाषण दो ! और इस तरह मधू लिमयेजकी समाजवादी विचारधारा के उपर 19 दिन धुलिया जेल में समाजवाद के उपर बगैर किसी नोट्स, और संदर्भ सामग्री के अलावा भाषण हुऐ ! और आचार्य विनोबा भावे की मशहूर कीताब, गीता प्रवचने के जैसे सानेगुरुजी ने खुद नोट्स ली थी ! और उन्होंने जेल से बाहर आने के बाद वह नोट्स मधू लिमये को लाकर दी भी थी ! लेकिन बाद में पुलिस के रेड में अन्य कागदपत्र के साथ वह नोट्स भी गुम हो गई ! यह समाजवादी आंदोलन के लिये बहुत बड़ा नुकसान वाली बात है ! ( भले मधुजी और गुरुजी के बीच पिता-पुत्र के बीच जीतना फासला होता है 21 साल से भी अधिक ! लेकिन गुरूजी का बडप्पन ही कहना चाहिए कि अपनी उम्र से कम उम्र के पंद्रह साल के लडके को अपना साथी मानने की बात सिर्फ साने गुरूजी ही कर सकते हैं  !) 

         अन्यथा सदियोसे हमारे समाज की सामंती कुंठाओं के कारण हमारे देश के लोकतंत्रीकरण होने की गति बहुत ही धीमी चल रही है  ! फिर वह लोकतंत्र देश के पैमाने पर हो या भारत के समाज में व्यक्तिगत तौर पर ! सामंती मानसिकता से समस्त दक्षिण आशिया का जनतंत्र बहुत ही बाल्यावस्था में चल रहा है !

              साने गुरूजी,एस एम जोशी जैसे महाराष्ट्र के लिए बहुत ही सुलझे हुए नेतृत्त्व मिलने के कारण ! आज राष्ट्र सेवा दल के इक्यासि साल पूरे हो रहे हैं ! और उसके बावजूद राष्ट्र सेवा दल का अस्तित्व है  ! इसका काफी बड़ा श्रेय मधुजी,साने गुरूजी,नाना साहब गोरे,यदुनाथ थत्ते एसएम इत्यादि नेताओ को जाता है  !

          एक तरह से साने गुरूजी के भी पहले खानदेश की भूमि पर राष्ट्र सेवा दल के समाजवाद लोकशाही धर्मनिरपेक्ष और विज्ञानाभिमुख राष्ट्र की संकल्पना को  अपने प्रखर बुद्धिजीवी स्वभाव के कारण मधु लिमये ने उम्र के बीस साल पूर्ण करने के पहले ही राष्ट्र सेवा दल के पंचसुत्री खानदेश मे फैलाने का इतिहास दत्त कार्य कर दिखाया था  !

             मुझे फक्र है कि मेरी जन्मभूमि के तालुका साक्री के मामलेदार के सामने 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध के खिलाफ भाषण देने के अपराध में मधू लिमये को उम्र के अठारह साल के पहले और उनके जीवन का पहला गिरफ्तार करने का मामला ! हमारे तालुका साक्री का है ! जजने देखा कि एक अठारह ! साल का युवक अपने उम्र के जोशमे खडा है ! तो उन्होंने मनहिमनमें उस युवक को समझा बुझा कर छोडने का मन बनाया हुआ था ! लेकिन उस युवक ने कहा कि मुझे कोर्ट को कुछ बताना है  ! तो कौतूहल वश मामलेदार ने कहा कि बोलो तो ! उस युवक ने अपनी जेब में पहले से ही एक कागज पर कुछ लिखकर लाया हुआ था ! वह कागज जेबसे निकला और पढने की शुरुआत की वह उस युवक ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ अपने हाथ से अंग्रेजी में  खुद लिखकर लाया हुआ बयान था ! और उसमें साफ-साफ शब्दों में “हमें दुसरे महायुद्ध में अंग्रेजी सरकार ने हमारे देश के लोगों की इजाजत लिए बगैर हमें युद्ध में जोर – जबरदस्ती से घसीटा है ! और मैं इसके खिलाफ लोगों को सहयोग नहीं करने के लिए बताने के लिए ! इस तरह के भाषण दिए हैं ! और इस अपराध के लिए आपको मुझे जीतनी भी कड़ी सजा देनी है आप दिजीए ! लेकिन मैं अपनी तरफ से और कोई अधिक रियायत नहीं मांगूंगा  !” बहुत ही अच्छी अंग्रेजी में लिखकर लाया हुआ बयान सुनकर जज भी हक्का-बक्का रह गये ! और छोटे लडके को देखकर मजबूर होकर जजमेंट दिया कि” इस युवक की उम्र का ख्याल रखते हुए मै इसे नौ महीने की सश्रम कारावास की सजा देने का आदेश दे रहा हूँ ! और सौ रुपये जुर्माना भी भरने का आदेश दे रहा हूँ ! और जुर्माना नहीं भरने से और तीन महीने जेल में रहने की सजा सुनाने के बाद साक्री के पुलिस हवालात से धुलिया की जेल में भेजने के लिए मजबूर कर दिया  !

          धुलिया जेल में बादमे साने गुरूजी भी बाद में आएं ! और इस तरह कुमार उम्र के मधु लिमये लगभग पिता की उम्र के साने गुरूजी के सानिध्य में आने की वजह से से साने गुरुजी ने मधू की प्रतिभा को देखते हुए कहा कि तुम हम सब लोगों को किसी महत्वपूर्ण विषय पर रोज जेल में भाषण दो ! तो बगैर किसी नोट्स और संदर्भ सामग्री के अभाव में मधू लिमये ने धुलिया जेल में उन्नीस दिन समाजवाद के उपर भाषण दिए ! और सबसे महत्वपूर्ण बात आचार्य विनोबा भावे के उसी धुलिया जेल के गिता के उपर दिए भाषणों को साने गुरुजी ने नोट्स लेने के कारण विनोबाजी की गिता प्रवचने नाम की किताब आज उपलब्ध हैं ! साने गुरूजी ने मधू लिमये के उन उन्नीस भाषणों की भी नोट्स ली थी ! और जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने मधू लिमये को सौंपा था ! लेकिन 1942 के भारत छोडो आंदोलन के दौरान पुलिस रेड में उनके काफी कागजपत्र गायब हो गए ! अन्यथा भारत में समाजवाद के उपर और एक महत्वपूर्ण कीताब उपलब्ध हुई होती ! 

               एक किंवदंती है ! कि मधु लिमये ने साने गुरूजी को समाजवाद का पाठ पढ़ाने काम किया ! और उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों से अलग करने का काम किया था  ! हालांकि धुलिया जेल के अपने अनुभव मधू लिमये ने आत्मकथा में यह लिखा है कि साने गुरुजिके तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों के साथ भी बहुत अच्छे संबंध थे ! और मधूजी की भाषा में वह वैचारिक कम भावनिक ज्यादा थे ! तो मैंने कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व संपूर्ण रूप से सोवियत रूस के इशारे पर काम करते हैं और इस कारण भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी उनकी भूमिका फिर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दो बार बदलने की एकमात्र वजह जब जर्मनी ने सोवियत रूस पर हमला किया तो वह जर्मनी के विरोध में खड़े हो गए ! अन्यथा स्टालिन और हिटलर की युति होकर दोनों दोस्त राष्ट्रों के खिलाफ युद्ध करने लगे थे ! लेकिन हिटलर ने अपनी निती में परिवर्तन किया तो फिर सोवियत रूस भी जर्मनी के खिलाफ युद्ध में शामिल हुआ ! और इसी कारण भारत के कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व ने भारत छोडो आंदोलन के खिलाफ काम करने का फैसला लिया ! यह सब घटनाक्रम मधू लिमये ने गुरूजी को बहुत ही सरल और सहज तरीके से उदाहरण के साथ बताने के कारण साने गुरुजिके और कम्युनिस्ट पार्टी के साथ संबंधों में बदलाव हुआ है ! 

                मधु लिमये ने विधिवत शिक्षा कालेज के बीच में ही ! अधुरी छोड़कर  पहले राष्ट्र सेवा दल के और बाद में समाजवादी पार्टी के कामके लिए अपने आप को झोंक दिया  !

               1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर गोवा मुक्त करने के लिए उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर भाग लिया था  !

और चार बार संसद सदस्य के 

भारत की संसदीय राजनीति मे हर चुनाव में साडेपाचसौ के आसपास सदस्य चुनकर जाते है ! और उसके आधी संख्या में राज्यसभा के सदस्यों की संख्या होती है ! लेकिन कितने सदस्य होंगे जो संसद भवन के अंदर जाने के पहले अपना होम वर्क करते हैं  ? मधु लिमये ने मैट्रिक की परीक्षा के बाद आगे की पढ़ाई कालेज की दो एक साल की ! और नहीं उन्होंने अपनी कोई फर्जी डिग्री  होने का ढोंग किया है  !

                       लेकिन उनके संसदीय राजनीति के समय ! वह अकेले संसदीय राजनीति के नियमों और प्रावधानों का आधार लेकर, आजसे भी कम विरोधी दलों के सदस्य होने के बावजूद ! अकेले दो-दो दिन संसदीय काम को नियमों का आधार लेकर रोक देते थे  ! 

         सत्तर के दशक में श्रीमती इंदिरा गाँधी जी ने वसंत साठे और आरा के सांसद राय को मधु लिमये से श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के तत्कालीन रोल को लेकर मधु लिमये की राय जानने के लिए मधु लिमये के घर भेजने का किस्सा मुझे खुद वसंत साठे जीने बताया है  !

मधु लिमये कुल मिला कर पचहत्तर साल कि जिंदगी जियें शुरू के पंद्रह साल के समय को छोड़ लगभग साठ साल के सक्रिय राजनीति में कभी भी कोई समझौता नहीं किया !

               समाजवादी पार्टी के कलकत्ता  कान्फ्रेस में डाॅ राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के  मसौदे के  खिलाफ मधु लिमये ने बहुत शिद्दत से लोहा लिया ! तो उसके बाद डॉ राम मनोहर लोहियाजी  मुंबई के मधु लिमये के घर पर पांच-छ दिन डेरा डाल कर समझाने की कोशिश की है ! यह सं- स्मरण अभी हाल ही में मधुजी के बेटे अनिरुद्ध लिमये ने लिखा है !” कि मैं आठ-दस साल की उम्र का रहा होगा ! लेकिन मुझे मेरे पिताजी और डॉ राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवादकी बहस बहुत अच्छी तरह से याद है ! और अंतमे डॉ लोहिया मेरे पिताजी को कहते हैं” कि क्या तुम मुझे अपना नेता मानते हो तो ! मेरी बात रखने के लिए कुछ समय गैर कांग्रेसी मुद्दे को मानने की मेरी विनती नहीं  मान सकते?  यही मधू लिमये ने आपातकाल में जेल में रहते हुए जनता पार्टी की कल्पना का विरोध किया था ! उनका कहना था कि जनसंघ एक हिंदुसांप्रदायिक पार्टी के साथ समाजवादी पार्टी का वैचारिकता में कोई भी मेल नहीं और सिर्फ कांग्रेस के खिलाफ चुनाव के लिए एक दल बनाने की जगह एक चुनावी तालमेल कर के चुनाव लढा जा सकता है ! लेकिन एक दल करने की गलती मत किजीये ! क्योंकि जनसंघ आर एस एस की राजनीतिक इकाई है और उसकी वफादारी हमेशा आर एस एस के प्रति रहेगी ! इसलिये बाद में दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर उन्नीस महिनों के भीतर ही जनता पार्टी की टूट हुई है ! और उसका दोषी ठहराया गया सिर्फ मधू लिमये को ! आज के भारतीय जनता पार्टी के बिभत्स हिंदुत्ववादी चेहरा किस बात का प्रमाण है ? आज मधू लिमये की जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में हमारे काफी मित्र उन्हें लेकर जगह – जगह कार्यक्रम करने जा रहे हैं ! मेरी तरफ से उन्हें सिर्फ एक ही प्रार्थना है कि “अगर आप सभी को मधू लिमये के प्रति सचमुच की आदर – सम्मान है तो सिर्फ एक ही घोषणा किजिये संघमुक्त भारत ! उसी में बीजेपी से भी मुक्ति शामिल है ! 

             आज बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे या कार्यक्रम की शुरुआत, इतिहास के क्रम में डाॅ राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसी बहस सत्तर के दशक की शुरुआत में डाॅ राम मनोहर लोहिया के कारण और बाद में 1974 के जेपी आंदोलन की ही देन है कि 1950 को पैदा हुई जनसंघ 1980 मे नया नाम भारतीय जनता पार्टी इकतालीस साल पहले स्थापित दलने भारत की संसदीय राजनीति का धर्मनिरपेक्ष चरित्र को तार तार करने के कारण आज भारत अघोषित हिंदू राष्ट्र के तौर पर बेखटके चला जा रहा है ! और आज शताब्दी के शुरू के दिन मधु लिमये जी  की बरबस याद आ रही है ! क्योंकि वह भी जनता पार्टी मे जनसंघ को शामिल करने के विरुद्ध थे ? और उन्होंने यह शर्त रखी थी कि जनता पार्टी बनने के बाद पुराने जनसंघ के लोग आर एस एस के सदस्यता त्याग देंगे ! लेकिन उनकी बात की अनदेखी कर के कारण अंतिम परिणाम जनता पार्टी नाम की कई-कई परस्पर विरोधी विचारधारा के (मुख्यतः)संघ परिवार की राजनीतिक इकाई जनसंघ के दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता पार्टी की टूटन के असली नायक मधु लिमये ने  एतिहासिक भूमिका निभाई है ! इसलिए आनेवाले पुरे साल भर में उनके तारीफों के कशिदे पढने की जगह संघ परिवार के फासिस्ट चेहरे को बेनकाब करना सही श्रद्धांजलि होगी  !

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