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मधु लिमये- जिनसे घबराती थी सत्ता

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संजय कनौजिया की कलम”  

       (दिनांक-28/4/22)  एक ऐसा नाम जिनसे घबराती थी सत्ता, ऐसे सांसद थे मधु लिमये जी..1, मई को उनकी जयंती है और उनकी जन्मशताब्दी जयंती  की पूर्व संध्या 30, मई 2022, को दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में समाजवादी समागम की ओर से समारोह करेंगें हम लोग ! 
मधु जी चार बार बिहार से सांसद रहे, जबकि उनका बिहार में जन्म नहीं हुआ था..एक ऐसा समाजवादी कद्दाबर नेता जिसकी जरुरत मौजूदा दौर की सियासत में लगातार महसूस हो रही है..ऐसे दौर में जब सरकार की तरफ से विरोधी दलों को हमेशा संख्या बल के तराजू में तौला जाए, तब सहज रूप से जो पहला नाम जहन में आता है वो नाम है मधु लिमये जी का..उस वक्त का विरोध वैचारिक और नीतिगत मसला हुआ करता था, ना कि संख्या बल का मसला हुआ करता था..तब लोकसभा में जितने भी सांसद विपक्ष के होते थे या इसे आसान भाषा में कहा जाए कि वो सत्ता पक्ष के दांत खट्टे किये रखते थे ! 
मधु जी पर अध्ययन करते हुए एक बेहद रौचक लेकिन अति गंभीर मामला सामने आया तो मैंने सोचा इस रोचक किस्से को सार्वजनिक करते हुए, आप सब के मध्य साझा कर सकूँ..यह वाक्या उस समय का है जब इंद्रा गांधी प्रधानमंत्री के साथ-साथ वित्त मंत्रालय भी संभाल रहीं थीं..इसी वजह से 1970 का बजट खुद इंद्रा गांधी ने पेश किया..उसी दौरान संसदीय प्रबंधन से एक बड़ी चूक हो गई..जिसपर किसी नेता, संसदीय कार्य मंत्री, संसदीय प्रधानमहासचिव, आदि को किसी तरह की सुध नहीं रही और विचित्र स्थिति उत्पन होने को आ गई..दरअसल बजट का वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होता है, जबकि बजट पास होते होते पहले मई का महीना आ जाता है, इसीलिए इन दो महीनो के लिए वोट एन अकाउंट, हिंदी में कहा जाए तो जन लेखा या लेखानुदान को 31 मार्च से पहले संसद में पास किया जाता है ताकि अगले दो महीने अप्रैल और मई तक देश का खर्च चलाने के लिए सरकार को प्रयाप्त रकम मिल सके..लेकिन 1970 में ऐसा नहीं हुआ, किसी का ध्यान भी इस गंभीर मसले पर नहीं था..31 मार्च की तारीख आ गई और उसी दिन शाम को संसद की कार्येवाही समाप्त हो गई और सभी सांसद अपने-अपने आवास में चले गए तभी मधु जी को याद आया कि आज तो 31 मार्च है और लेखानुदान तो पास ही नहीं हुआ..आखिर कल से देश का खर्चा कैसे चलेगा, सरकारी कर्मचारियों को वेतन कैसे मिलेगा, बांकी के काम कैसे होंगें..यह सोचकर मधु जी तत्काल लोकसभा के स्पीकर गुरदयाल सिंह ढिल्लो के संसदीय कक्ष में पहुंचे और कहा जल्दी ही संसद की बैठक बुलाइये, रात 12 बजे से पहले संसद की बैठक बुलवाओ नहीं तो कल से देश ठप हो जाएगा..स्पीकर ने भी उनकी बात पर गौर किया, तत्काल इंद्रा गांधी से बात की गई..उसके बाद आल इंडिया रेडिओ पर पौने 9 बजे के न्यूज़ बूलेटिन पर खबर प्रसारित की गई कि फौरन सभी सांसद संसद पहुंचें क्योकिं लेखानुदान पर तत्काल वोटिंग जरुरी है..इसके आलावा लुटियंस दिल्ली जोन में, माइक लगी हुई गाड़ियों से अनाउंसमेंट करवाया गया..तब जाकर रात 12 बजे से पहले संसद बैठी, कोरम पूरा हुआ और लेखानुदान को संसद में मंजूरी दिलाई गई..इस तरह से मधु लिमये जी ने एक गंभीर वित्तीय और संवैधानिक संकट से देश को बचा लिया !  
मधु जी का संसदीय जीवन संघर्ष, साहस, और सक्रियता की मिसाल रहा है, कहा जाता है कि उनका नाम उन गिने-चुने सांसदों में शुमार रहा है जिनका खौफ़ सत्ताधारी दलों के सदस्यों के चेहरे पर साफ़-साफ़ नज़र आता था..”ऐसे ही नेताओं की आज हमे जरुरत है”..मधु लिमये जी ने ईमानदारी की, सुचिता की, कर्तव्यपरायणता की इतनी बड़ी मिसाल पेश की है कि गर्व करते हैं हम लोग ! *मधु लिमये जी अमर रहें*,*कोटि-कोटि नमन*लेखक-राजनैतिक, सामाजिक चिंतक है

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