सुसंस्कृति परिहार
गुजरात में नवागत मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल ने तमाम दिक्कतों के बावजूद आखिरकार अपने मन की पूरी कर ही ली हालांकि इसकी आयोजना पहले ही लिखी जा चुकी थी । पुराने गुजरे वक्त के सभी मंत्रियों को दर किनार कर एक नया फार्मूला ‘नो रिपीट’ बनाया गया है। इसमें किसी तरह के असंतोष और नाराज़गी का सवाल ही नहीं उठता।इस फार्मूले को अपनाने की ज़रूरत क्यों पड़ी ये सब समझ रहे हैं क्योंकि यहां केंद्र की शह पर खुलेआम जो कुछ हुआ है उससे गुजरात सरकार की छवि इतनी खराब हुई कि यह कठोर निर्णय लेना पड़ा। बुंदेलखंड में एक कहावत है कौन कौन कौन धरिए नांव ,कंबल ओढ़े सबरो गांव। यकीनन जब सारे तालाब का पानी गंदा हो चुका हो तो उसे बदला ही जाना चाहिए।
एक बार फिर मोदी -शाह के गुजरात ने अलग-थलग इतिहास लिखा है। इससे पूर्व केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने राज्य चुनाव में भारी बहुमत आने के बाद नये विधायकों को जिम्मेदारी सौंपकर उन्हें प्रशिक्षु बतौर जो मंत्रीमंडल बनाया उसमें पुराना कोई मंत्री शामिल नहीं किया। सिर्फ मुख्यमंत्री पुराने रहे। लेकिन गुजरात ने तमाम पुराने मंत्रियों को तो बाहर का रास्ता दिखाया ही साथ ही मुख्यमंत्री भी ऐसा लेकर आए जो पहली बार विधायक बना था।यह सब कम आश्चर्य जनक नहीं है, कि जो विधायकी सीख रहा हो वह यकायक विधायक और मंत्रियों का कमांडर बन जाए।अजी , हमारे लोकतंत्र को सब कुछ गवारा है तो यह सब कुछ होगा ही।लगता है , संविधान निर्माताओं ने कभी इस तरह के प्रयोग की कल्पना भी नहीं की होगी।
बहरहाल,काफी हो हल्ला के बाद जब नया मंत्रीमंडल बन गया उनकी शपथ भी हो गई तो वहां के अंदरूनी हालात जैसे भी हों लेकिन मध्यप्रदेश में जो अभी तक शिवराज सिंह के बदलाव में जुटे मंत्री अपनी पौ बारह देख रहे थे । उन सभी के अरमान देखते ही देखते धराशाई हो गए हैं जबकि भाजपा विधायकों में हर्ष की लहर है। विदित हो गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के शपथग्रहण समारोह में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विशेष आमंत्रित के रूप में वहां गए थे। गृहमंत्री अमित शाह की भी वहां मौज़ूदगी थी। उन्हें आमंत्रित कर क्या कोई अप्रत्यक्ष संदेश दिया गया या आने वाले कल की कोई तस्वीर दिखाई गई। मध्यप्रदेश में अभी कुछ सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं। फिर पंचायत और नगरपालिका नगरनिगमों के चुनाव फरवरी में होने हैं।तब तक शायद यह प्रयोग स्थगित रहे। जबकि उनकी जीत या हार का कोई असर नहीं पड़ने वाला। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने तो इन चुनावों में अच्छी खासी बढ़त ली थी वे बच नहीं पाए । इसलिए मध्यप्रदेश में जो खौफ़ है वह जायज़ है।कब करता हो जाए कहां नहीं जा सकता। शिवराज 2005से एक वर्ष के लगभग कमलनाथ का कार्यकाल छोड़ दें मुख्यमंत्री हैं। पुराने हो चुके हैं ।वे प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल हो सकते हैं इसलिए उनका जाना तय तो है लेकिन नो रिपीट में सब साथियों सहित ही डूबेंगे। गणपति बप्पा मोरया ।
हालांकि कुछ लोगों का ख़्याल है कि अब मोदी -शाह जोड़ी की बाईंडिंग भी बिगड़ी है।अब शाह को भी पी एम का नशा तारी हो गया है इसलिए ये सब खेल चल रहा है नो रिपीट का फार्मूला सिर्फ प्रदेशों के लिए बल्कि देश के नेतृत्व पर भी लागू होगा। इस फार्मूले के निर्माता और कोई नहीं शाह जी हैं। उन्होंने ही संघ के संग बैठ यह सब पहले से ही तय कर रखा था।इस दौरान दो दफ़े उनका गुजरात आगमन यूं ही नहीं हुआ।अब यह सवाल उठता है कि यह तकरार भाजपा को कहां ले जाती है माहौल तो एकदम दोनों के ख़िलाफ़ नज़र आ रहा है। गुजरात में आगे कैसे हालात बनते हैं इस पर भी बहुत कुछ निर्भर होगा। कुछ भी हो पर यह सत्य है कि मध्यप्रदेश में इस फार्मूले ने शिवराज सहित सभी मंत्रियों की सेहत ख़राब कर रखी है।
गुजरात के “नो रिपीट “फार्मूले से मध्यप्रदेश थर्राया

