मध्यप्रदेश की खनन नीति में दिखा फर्क साफ, कमलनाथ की पारदर्शिता के आगे मोहन यादव का राजस्व मॉडल हुआ फैल
ज़ीरो टॉलरेंस से डीम्ड मंज़ूरी तक कमलनाथ और मोहन यादव की सोच में दिखा समझदारी का अंतर
विजया पाठक,
मध्यप्रदेश में खनन नीति एक बार फिर राजनीतिक और नीतिगत बहस के केंद्र में है। एक ओर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा 237 विवादित पर्यावरणीय मंजूरियों में से 09 रेत खदानों की मंजूरी को अवैध करार देकर शून्य घोषित किया गया है, तो दूसरी ओर राज्य सरकार खनिज क्षेत्र में रिकॉर्ड निवेश और राजस्व वृद्धि के दावे कर रही है। इन दोनों के बीच तुलना स्वाभाविक रूप से पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ द्वारा तैयार की गई खनन नीति और वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की खनन नीति के बीच होने लगी है। यह तुलना केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नीति की आत्मा, कार्यशैली और ज़मीनी प्रभाव को लेकर भी है।
एनजीटी का फैसला और मौजूदा व्यवस्था पर सवाल
एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच का हालिया फैसला केवल 9 रेत खदानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कहा कि बिना स्टेट एनवायरमेंट इंपैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (सिया) की विधिसम्मत स्वीकृति के जारी की गई पर्यावरणीय मंजूरियां प्रारंभ से ही शून्य हैं। पन्ना जिले की जिन रेत खदानों को अवैध ठहराया गया, वहां न तो जनसुनवाई हुई और न ही पर्यावरणीय नियमों का पालन किया गया। जलमग्न क्षेत्रों में खनन, जहां स्पष्ट प्रतिबंध है, वहां भी डीम्ड क्लॉज का दुरुपयोग कर मंजूरी दे दी गई। यह पूरा घटनाक्रम इस बात को रेखांकित करता है कि वर्तमान खनन व्यवस्था में नियमों के पालन से अधिक “प्रक्रियात्मक शॉर्टकट” को प्राथमिकता दी जा रही है।
कमलनाथ की खनन नीति दूरदृष्टि और संतुलन की मिसाल
यदि हम पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के 18 माह के कार्यकाल पर नज़र डालें, तो खनन नीति को लेकर एक स्पष्ट दृष्टिकोण दिखाई देता है। कमलनाथ ने सत्ता संभालते ही यह समझ लिया था कि खनिज क्षेत्र केवल राजस्व का स्रोत नहीं, बल्कि पर्यावरण, स्थानीय समाज और कानून-व्यवस्था से सीधे जुड़ा विषय है। उनकी सरकार ने खनन नीति को निवेशक-उन्मुख बनाने के साथ-साथ पारदर्शिता और पर्यावरणीय संतुलन को भी केंद्रीय तत्व बनाया। कमलनाथ की सोच थी कि खनिज केवल आर्थिक संपदा नहीं, बल्कि स्थानीय विकास का माध्यम है। इसी के तहत खदानों के लीज़ नवीनीकरण की प्रक्रिया को सरल किया गया, लेकिन नियमों से समझौता नहीं किया गया।
पर्यावरण और आदिवासी हितों की रक्षा
कमलनाथ सरकार की खनन नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों की रक्षा था। जंगल, नदी और वन्यजीव क्षेत्रों में खनन पर सख्त नियंत्रण, पर्यावरणीय स्वीकृति (ईसी) का कड़ाई से पालन और आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति को अनिवार्य करना, इस नीति को संवेदनशील बनाता है। अवैज्ञानिक खनन से हुए नुकसान की भरपाई का प्रावधान भी नीति की गंभीरता को दर्शाता है। यही कारण था कि कमलनाथ के कार्यकाल में खनन से जुड़ी बड़ी आपराधिक घटनाएं या माफिया हिंसा की खबरें लगभग न के बराबर रहीं। कठोर निगरानी, जवाबदेही और राजनीतिक इच्छाशक्ति ने अवैध खनन पर लगाम कसने का काम किया।
कांग्रेस के वचनपत्र में थी ज़ीरो टॉलरेंस की स्पष्ट घोषणा
कांग्रेस के वचनपत्र में खनन नीति को लेकर जो बिंदु रखे गए थे, वे केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि एक सुस्पष्ट रोडमैप थे। अवैध खनन पर ज़ीरो टॉलरेंस, खनन माफिया और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर सीधी आपराधिक कार्रवाई, जब्त मशीनों और वाहनों को राज्य के अधीन करने जैसे प्रावधान, नीति की कठोरता को दर्शाते हैं। अवैध खनन पर ज़ीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने, रेत, गिट्टी, मुर्रम सहित सभी खनिजों में माफिया राज समाप्त करने और दोषी अधिकारियों व ठेकेदारों पर सीधी आपराधिक कार्रवाई का वादा किया गया है। अवैध खनन में प्रयुक्त मशीनें और वाहन जब्त कर राज्य के अधीन करने का प्रावधान भी शामिल है। रेत खनन के लिए नई नीति में नदी संरक्षण को प्राथमिकता, वैज्ञानिक सर्वे के बाद ही अनुमति और ग्राम पंचायतों व स्थानीय निकायों की भागीदारी सुनिश्चित करने की बात कही गई है। आम जनता को सस्ती और नियंत्रित दरों पर रेत उपलब्ध कराना भी प्रमुख लक्ष्य है। रेत खनन के संदर्भ में कांग्रेस ने नदी संरक्षण को प्राथमिकता देने, वैज्ञानिक सर्वे के बाद ही अनुमति देने और ग्राम पंचायतों की भागीदारी सुनिश्चित करने की बात कही थी। साथ ही आम जनता को सस्ती और नियंत्रित दरों पर रेत उपलब्ध कराने का वादा किया गया था, ताकि अवैध बाजार पनप न सके।
मोहन यादव की खनन नीति राजस्व केंद्रित और असंतुलित
वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की खनन नीति को यदि देखें, तो यह आर्थिक दृष्टि से राजस्व बढ़ाने पर केंद्रित दिखाई देती है। सरकार का दावा है कि खनिज ब्लॉकों की पारदर्शी नीलामी और निवेश-अनुकूल माहौल के कारण राज्य को 10 हजार करोड़ से अधिक का राजस्व मिला है और हालिया खनिज कॉन्क्लेव में 56 हजार करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव आए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नीति सतत खनन, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय हितों को समान महत्व देती है? ज़मीनी हकीकत बताती है कि नर्मदा, चंबल, बेतवा और सोन जैसी नदियों के तटीय इलाकों में आज भी अवैध रेत खनन जारी है।
प्रदेश के दोनों नेताओं की कार्यशैली में भी अंतर
असल अंतर नीति से अधिक कार्यशैली का है। कमलनाथ की खनन नीति में स्थायित्व, पारदर्शिता और जवाबदेही का संतुलन था। वहीं मौजूदा सरकार की नीति में त्वरित निर्णय, डीम्ड मंजूरियां और नियमों को दरकिनार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जिस पर एनजीटी की टिप्पणी एक गंभीर चेतावनी है। मध्यप्रदेश की खनन नीति पर जारी यह बहस केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं है, बल्कि यह तय करेगी कि राज्य का खनिज क्षेत्र विकास का माध्यम बनेगा या विवादों का। कमलनाथ द्वारा तैयार की गई खनन नीति और कांग्रेस के वचनपत्र में प्रस्तुत दृष्टिकोण यह साबित करता है कि यदि नीति दूरदर्शिता, पारदर्शिता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ बनाई जाए, तो उसका लाभ वर्षों बाद भी मिलता है।

