(महाशिवरात्रि पर विशेष)
~ डॉ. विकास मानव
मानव सभ्यता और मानव संस्कृति के गठन में शिव की जो विराट भूमिका है, उसमें यही कहना संगत है कि शिव को हटा देने पर मानव सभ्यता और मानव संस्कृति के लिए कोई भूमि ही नहीं मिल पाएगी। किंतु मानव सभ्यता और संस्कृति को निकाल देने पर भी शिव की महिमा रहेगी। वर्तमान मानव समाज और सुदूर भविष्य में भी मानव समाज के प्रति सुविचार करते समय, उसका यथार्थ इतिहास लिखते समय शिव को छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। कई भाषा और कई धर्म के साथ भी शिव का सम्यक परिचय था।
शिव को हम तंत्र और वेद, दोनों में ही पाते हैं, लेकिन अत्यंत प्राचीन काल में हम उन्हें नहीं पाते हैं, क्योंकि अत्यंत प्राचीन काल में ग्रंथ रचना संभव नहीं थी।
मानव सभ्यता में आध्यात्मिक जिज्ञासा और प्रेरणा का कारण और परिणाम ही शिव हैं।
शिव अनंत हैं, शिव सार्वभौमिक और सार्वकालिक हैं। वे किसी एक सभ्यता के द्योतक नहीं हैं, वे तो सभ्यताओं के नियामक हैं। शिव स्वयं में एक संस्कृति हैं। एक ऐसी अनवरत धारा हैं, जो अध्यात्म और दैविक शक्तियों के प्रति मानवीय जिज्ञासाओं का प्रतिनिधित्व करती है। शिव की सार्वभौमिकता को जानना हो तो विश्व की अनेक सभ्यताओं के प्राचीन अध्यायों का अवलोकन करना होगा। मिस्र , हड़प्पा , बेबीलोन और मेसोपोटामिया की सभ्यता में पितृ शक्ति की उपासना के प्रतीक मिले हैं।
ये प्रतीक ही शिव आस्था की वैश्विकता को सिद्घ करते हैं। जहां आगमो शिव है वेदों में शिव रुद्र हैं, वहीं पुराणों में अद्र्घनारीश्वर हो जाते हैं। यह एक गंभीर आध्यात्मिक चिंतन है। नारी को शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया। माना गया कि शिव अर्थात कल्याण, शक्ति के बिना संभव नहीं है। शक्ति के अनेक रूप हैं।
प्रतीकात्मक दृष्टि से सब ज्ञान, धैर्य, वीरत्व, जिज्ञासा, क्षमा, सत्य तथा अन्य सात्विक आचरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
*मिस्र में शिव :*
प्राचीन मिस्र, नील नदी के निचले हिस्से के किनारे केन्द्रित पूर्व उत्तरी अफ्रीका की एक प्राचीन सभ्यता थी, जो अब आधुनिक देश मिस्र है।
नील नदी के उपजाऊ बाढ़ मैदान ने लोगों को एक बसी हुई कृषि अर्थव्यवस्था और अधिक परिष्कृत, केन्द्रीकृत समाज के विकास का मौका दिया, जो मानव सभ्यता के इतिहास में एक आधार बना।
5500 ई.पू. तक, नील नदी घाटी में रहने वाली छोटी जनजातियाँ संस्कृतियों की एक श्रृंखला में विकसित हुईं, जो उनके कृषि और पशुपालन पर नियंत्रण से पता चलता है और उनके मिट्टी के मूर्ति , पात्र और व्यक्तिगत वस्तुएं जैसे कंघी, कंगन और मोतियों से य स्पष्ट दिखता है की पशुाप्ति ( शिव ) ही है उन्हें पहचाना जा सकता है। ऊपरी मिस्र की इन आरंभिक संस्कृतियों में सबसे विशाल, बदारी को इसकी उच्च गुणवत्ता वाले चीनी मिट्टी की , पत्थर के उपकरण और तांबे के मार्तिओं में पशुपति शिव जोड़ी बैल ( नंदी ) उनके देवता के रूप जाना जाता है।
उत्तरी अफ्रीका के इजिप्ट (मिस्र) में तथा अन्य कई प्रांतों में नंदी पर विराजमान शिव की अनेक मूर्तियां पाई गई हैं। वहां के लोग बेलपत्र और दूध से इनकी पूजा करते थे।
माउंट ऑफ ओलिव्स पर टैम्पल माउंट या हरम अल शरीफ यरुशलम में धार्मिक रूप से बहुत पवित्र स्थान है। इसकी पश्चिमी दीवार को यहूदियों का सबसे पवित्र स्थल कहा जाता है। यहूदियों की आस्था है कि इसी स्थान पर पहला यहूदी मंदिर बनाया गया था। इसी परिसर में डॉम ऑफ द रॉक और अल अक्सा मस्जिद भी है। इस मस्जिद को इस्लाम में मक्का और मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।
यह स्थान तीन धर्मों के लिए पवित्र है- यहूदी, ईसाई और मुसलमान। यह स्थान ईसा मसीह की कर्मभूमि है और यहीं से ह. मुहम्मद स्वर्ग गए थे।
यहूदियों के गॉड : यहूदी धर्म के ईश्वर नीलवर्ण के हैं, जो शिव के रूप से मिलते-जुलते हैं। कृष्ण का रंग भी नीला बताया जाता है।
यहूदी धर्म में शिवा, शिवाह होकर याहवा और फिर यहोवा हो गया। शोधकर्ताओं के अनुसार यहां यदुओं का राज था, यही यहूदी कहलाए।
*दर्शनशास्त्र में शैव दर्शन :*
दर्शनशास्त्र में शैव दर्शन का विशेष महत्व है। इसीलिए भारतीय या आगमिक अथवा आस्तिक या नास्तिक समस्त दार्शनिक संप्रदाय किसी न किसी रूप में शिव साधना करते हैं। इसका कारण है कि शिव साधना समस्त दर्शनों और विशेषकर आगमिक शैव दर्शन का व्यवहारिक पक्ष है। शैव दर्शन और साधना उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी मानव सृष्टि। भारतीय कालगणना के अनुसार वर्तमान मानव सृष्टि का आरंभ एक अरब, सतानवे करोड़, उन्तीस लाख, सैतालीस हजार एक सौ एक ईसा पूर्व हुआ।
आधुनिक भौतिकी, खगोल, भूगोल, नृवैज्ञानिक भी मानते हैं कि पृथ्वी पर जीव की उत्पत्ति दो से तीन अरब वर्ष पूर्व हुई। भारतीय वांङमय के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सर्वप्रथम शिवसिद्ध शैवाचार्यों को गहन ध्यानावस्था में आगम के दर्शन हुए। अतः आगम का इतिहास सृष्टि के आरंभकाल से आगमिक मुनियों से प्रारंभ होता है। भारतीय दर्शन और साहित्य में शैवागम के अनेकों संदर्भ मिलते हैं। अगम , उपनिषद, पुराण , सूत्र , सिद्धांत भाष्य तो शैव साधना को लक्ष्य क रके ही लिखे गए ग्रंथ हैं।
भारतीय दर्शन परंपरा में एक धारा शैव संप्रदायों की प्रवाहित होती रही है। कुछ रहस्यमय साधना के रूप में होने के कारण यह वैदिक और अवैदिक धाराओं के संगम में कुछ सरस्वती के समान गुप्त रही है। किंतु प्रत्यक्ष उपासना के रूप में भी शिव की मान्यता बहुत है। प्राचीन ऐतिहासिक खोजों से शिव की प्राचीनता प्रमाणित होती है। गाँव गाँव में शिव के मंदिर हैं। प्रति सप्ताह और प्रति पक्ष में शिव का व्रत होता है।
महादेव पार्वती का दिव्य दांपत्य भारतीय परिवारों में आदर्श के रूप से पूजित होता है। ऋग्वेद और यजुर्वेद के रुद्र के रूप में शिव का वर्णन है।
शैव संप्रदाय प्राय: गुप्त तंत्रों के रूप में रहे हैं। उनका बहुत कम साहित्य प्रकाशित है। प्रकाशित साहित्य भी प्रतीकात्मक होने के कारण दुरूह है। शैव परंपरा के अनेक संप्रदाय हैं। इनमें शैव, पाशुपत, वीरशैव, कालामुख, कापालिक, काश्मीर शैव मत तथा दक्षिणी मत अधिक प्रसिद्ध हैं। इन्हें शैव परंपरा के षड्दर्शन कह सकते हैं। शैव सिद्धात का प्रचार दक्षिण में तमिल देश में है। इसका आधार आगम ग्रंथों में है। 14वीं शताब्दी में श्रीपति पण्डितारध्या ने “ब्रह्मसूत्रों” पर शैवभाष्य (श्रीकर भाष्य ) की रचना कर वेदांत परंपरा के साथ शैवमत का समन्वय किया।
पाशुपत मत, ‘नकुलीश पाशुपत’ के नाम से प्रसिद्ध है। पाशुपत सूत्र इस संप्रदाय का मूल ग्रंथ है। कालामुख और कापालिक संप्रदाय कुछ भयंकर और रहस्यमय रहे हैं। काश्मीर शैव मत अद्वैत वेदांत के समान है। तांत्रिक होते हुए भी इनका दार्शनिक साहित्य विपुल है। इसकी स्पंद और प्रत्यभिज्ञा दो शाखाएँ हैं। एक का आधार वसुगुप्त की स्पंदकारिका और दूसरी का आधार उनके शिष्य सोमानंद (9वीं शती) का “प्रत्यभिज्ञाशास्त्र” है। जीव और परमेश्वर का अद्वैत दोनों शाखाओं में मान्य है। परमेश्वर “शिव” वेदांत के ब्रह्म के ही समान हैं।
वीरशैव मत दक्षिण देशों से प्रचलित है। इनके अनुयायी शिवलिंग धारण करते हैं। अत: इन्हें “लिंगायत” भी कहते हैं। मूला में पांच शिवाचार्यों ने इस मत की स्थापना किये है 12वीं शताब्दी में वसव ने इस मत का प्रचार किया। वीरशैव मत एक प्रकार का विशिष्टाद्वैत है। शक्ति विशिष्ट विश्व को परम तत्व मानने के कारण इसे शक्ति विशिष्टाद्वैत कह सकते हैं। उत्तर और दक्षिण में प्रचलित शैव संप्रदाय भी उत्तर वेदांत संप्रदायों की भाँति भारत की धार्मिक एकता के सूत्र हैं।
शिवसूत्र’ में कहा है कि भगवान् श्रीकंठ ने वसुगुप्त को स्वप्न में आदेश दिया महादेवगिरि के एक शिलाखंड पर शिवसूत्र उतंकित हैं, प्रचार करो। जिस शिला पर ये शिवसूत्र उद्दंकित मिले थे कश्मीर में लोग शिवपल (शिवशिला) कहते हैं। इस की संख्या 77 है। ये ही इस दर्शन के मूल आधार हैं। “शैवदर्शन ” में शिवसूत्रों को सिद्धांतों का प्रतिपादन का प्रमाण माना गया है।
शिव सृष्टि के स्रोत हैं| सभी प्राणीयों के अराध्य हैं| मानवों और देवों के अलावा दानवों एवं पशुओं के भी द्वारा पूज्य हैं, अतः पशुपतिनाथ हैं| प्राचीनतम हरप्पा एवं मोहनजोदारो संकृति के अवशेषों में शिव के पशुपति रूप की कई मुर्तियाँ एवं चिन्ह उपलब्ध हैं| कोई यह न समजे की भगवान शिव केवल भारत में पूजित है । विदेशो में भी कई स्थानों पर शिव मुर्तिया अथवा शिवलिंग प्राप्त हुए है कल्याण के शिवांक के अनुसार उत्तरी अफ्रीका के इजिप्त में तथा अन्य कई प्रान्तों में नंदी पर विराजमान शिव की अनेक मुर्तिया है वहा के लोग बेल पत्र और दूध से इनकी पूजा करते है।
*तुर्किंस्तान, मक्का से लेकर अमेरिका तक में शिवलिंग :*
तुर्किस्थान के बबिलन नगर में १२०० फिट का महा शिवलिंग है । पहले ही कहा गया की शिव सम्प्रदायों से ऊपर है। मुसलमान भाइयो के तीर्थ मक्का में भी मक्केश्वर नमक शिवलिंग होना शिव का लीला ही है वहा के जमजम नमक कुएं में भी एक शिव लिंग है जिसकी पूजा खजूर की पतियों से होती है इस कारण यह है की इस्लाम में खजूर का बहूत महत्व है । अमेरिका के ब्रेजील में न जाने कितने प्राचीन शिवलिंग है।
स्क्यात्लैंड में एक स्वर्णमंडित शिवलिंग है जिसकी पूजा वहा के निवासी बहूत श्रदा से करते है । indochaina में भी शिवालय और शिलालेख उपलब्ध है।शिव निश्चय ही विश्वदेव है।
शिव शून्य हैं सृष्टी विस्तृत है| हमारी विशाल धरती सौर्यमंडल का एक छोटा सा कण मात्र है| सूर्य में सैकडों पृथ्वी समाहित हो सकती हैं| पर सूर्य अपने नवग्रहों तथा उपग्रहों के साथ आकाश गंगा (Milky way galaxy) का एक छोटा तथा गैर महत्वपूर्ण सदस्य मात्र है| आकाश गंगा में एसे सहस्रों तारामंडल विद्यमान हैं| वे सारे विराट ग्रह, नक्षत्र जिनका समस्त ज्ञान तक उपलब्द्ध नहीं हो पाया है शिव की सृष्टी है|
पर प्रश्न यह है कि यह विशाल सामराज्य स्थित कहाँ है? वह विशाल शून्य क्या है जिसने इस समूचे सृष्टी को धारण कर रखा है? वह विशाल शून्य वह अंधकार पिण्ड शिव है| शिव ने ही सृष्टी धारण कर रखी है| वे ही सर्वसमुद्ध कारण हैं| वे ही संपूर्ण सृष्टी के मूल हैं, कारण हैं|
शिव अनादि, अनंत, देवाधिदेव, महादेव शिव परंब्रह्म हैं| सहस्र नामों से जाने जाने वाले त्र्यम्बकम् शिव साकार, निराकार, ॐकार और लिंगाकार रूप में देवताओं, दानवों तथा मानवों द्वारा पुजित हैं| महादेव रहस्यों के भंडार हैं| बड़े-बड़े ॠषि-महर्षि, ज्ञानी, साधक, भक्त और यहाँ तक कि भगवान भी उनके संम्पूर्ण रहस्य नहीं जान पाए|
आशुतोष भगवान अपने व्यक्त रूप में त्रिलोकी के तीन देवताओं में ब्रह्मा एवं विष्णु के साथ रुद्र रूप में विराजमान हैं| ये त्रिदेव, सनातन धर्म के आधार और सर्वोच्च शिखर हैं| पर वास्तव में शिव त्रिदेवों के भी रचयिता हैं| महादेव का चरित्र इतना व्यापक है कि कइ बार उनके व्याख्यान में विरोधाभाष तक हो जाता है यानि वश्व के कई प्राचीन सभ्यता मे शिव उपासक है |
जो पाश्चात्य देशो प्राचीन नागरिकता में विश्व के अनेक देशों में शिव की पूजा की जाती है अफ्रीका के “मैफिस” और “असीरिस” क्षेत्रों में नन्दी पर विराजमान त्रिशूलहस्त और व्याघ्र चर्माम्बरधारी शिव की अनेक मूर्तियां हैं, जिनका वहां के लोग बेल-पत्र से पूजन और दूध से अभिषेक करते है
तुर्किस्थान के “बाबीलोन” नगर में एक हजार दो सौ फुट का एक बड़ा शिवलिंग है, जो पृथ्वी पर सबसे बड़ा शिवलिंग माना जाता है। उसी प्रकार “हे ड्रो पोलिन” में एक बड़ा शिवालय है, जिसमें सौ फुट का शिवलिंग स्थापित है।
इसी प्रकार हिन्द चीन में अनेक शिव मन्दिर पाए गए हैं। कम्बोडिया के इतिहास से यह पता चलता है कि पहले इस देश के राजा राजेन्द्र वर्मा ने शक संवत 866 में अंगकोर में यशोधरपुरी तालाब के बीच शिवलिंग को स्थापित किया था।
इसके संदर्भ में प्रामाणिक उल्लेख यहीं के “सियाराम” जिले के “बातचीम” स्थान के खम्भों के ऊपर खुदे हुए लेख में हैं। इतिहास प्रसिद्ध “जावा” और “सुमात्रा” द्वीपों में शिव-पूजन का साक्ष्य मिलता है। इतिहासकारों का कथन है कि सुप्रसिद्ध अगस्त्य महर्षि ने इस यव (जावा) और सुवर्ण (सुमात्रा) द्वीपों में शिवभक्ति का प्रचार और प्रसार किया था। वहां अगस्त्य की कई मूर्तियां मिली हैं जो रुद्राक्ष आदि चिह्नों से विभूषित हैं।
अगस्त्य की मूर्ति को वहां लोग आज भी “शिव गुरु” के नाम से पुकारते हैं। सुमात्रा तथा जावा की भांति बालिद्वीप (बाली), श्याम और वर्मा में भी अनेक शिव मन्दिर हैं जहां आज भी लोग बड़ी संख्या में एकत्र होकर शिव-पूजा का पवित्र कार्य सम्पादित करते हैं।
जिस आगमों ने पूर्ण तत्व को शिव कहा वाही तत्व को वेदों में रूद्र कहा गया है पुराणों अर्धनारीश्वर कहागया श्रुति , स्मृति , सहिंता , शास्त्र दर्शन , सिद्धांत , योग , संगीत , नृत्य , शिल्प , आयुर्वेद , ज्योतिष्य , रशायनशास्त्र , खगोल शास्त्र , शिव जी को ही अंतिम सत्य , सर्वज्ञता , सर्व करता , सर्व शक्तिमान , सर्वत्र , सहज और संपूर्ण माना है।
स्वाभिक सहज शिव विश्व के हर प्रदेश में सभी सभ्यताओं में हर समय पूजित एवं वर्णित है। भारतीय हर दर्शन शिव से जुड़े है चाहे वह आगमिक , वैदिक , चार्वाक , बौद्ध , जैन , सिख , संख्या , न्याय , योग , वेदांत , वैशेषिक , भक्ति , ज्ञान , उपासन के कई पंथ , यहाँ तक की श्रमिक , कृषिक , राजाओं , साहित्यकारों के इष्ट देवता शिव ही है।
विश्व के कई धर्मों का मूल आधार शिव ही है यहूदी ,पारषी , ईसाई और इस्लाम में भी शिव आराधना है। ग्रीक , बेबलोनिया , हरप्पा और मिस्र के मानव संस्कृति के गठन में शिव जी का ही विराट भूमिका है, उसमें यही कहना संगत है कि शिव महिमा को हटा देने पर मानव सभ्यता और मानव संस्कृति के लिए कोई भूमि ही नहीं मिल पाएगी। किंतु मानव सभ्यता और संस्कृति को निकाल देने पर भी शिव की महिमा रहेगी। इसी लिए शिव रात्रि के दिन लिंग की पूजा की जाती है।
*शिवलिंग : लिंग शब्द की अर्थवत्ता*
भगवान शिव पूर्ण ब्रह्म होने के कारण निष्कल अर्थात निराकार हैं। उनका न कोई रूप है और न ही आकार वे निराकार हैं। आदि और अंत न होने से लिंग को शिव जी का निराकार रूप माना जाता है। जबकि शिव मूर्ति को उनका साकार रूप। केवल शिव ही निराकार लिंग के रूप में पूजे जाते हैं। इस रूप में समस्त ब्रह्मांड का पूजन हो जाता है क्योंकि वे ही समस्त जगत के मूल कारण माने गए हैं।
शिव लिंग है लिंग शब्द का अर्थ होता है “ली ” “अनुस्वार ” और “ग ” इस प्रकार तिन अक्षर का य लिंग प्रति अक्षर का एक एक अर्थ है . “ली” का अर्थ लीयते लय जगत जिस में लय होता है “अनुस्वार ” का अर्थ है जगत का स्थित और “ग ” अर्थ गम्यते यानि जगत का उत्पति.
चन्द्रज्ञान अगम में इस लिंग का वर्णन यह है :
*जठरे लीयते सर्वं जगत स्थावरजंगमम | पुन्रुत्पद्यते यस्माद तद्ब्रह्म लिंगसंज्ञकम ||*
जिस के जठर में सर्व चराचरात्मक जगत (स्रष्टि के पूर्व ) लीन रहता है और जिसे जगत उत्पति होता है उसीको लिंग कहा जाता है। भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरुप।
शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्द पुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है | वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्ष/धुरी (axis) ही लिंग है.
*शिवलिंग और ध्यान :*
शिव की जगह-जगह पूजा हो रही है, लेकिन पूजा की बात नहीं है। शिवत्व उपलब्धि की बात है। वह जो शिवलिंग तुमने देखा है बाहर मंदिरों में, वृक्षों के नीचे, तुमने कभी ख्याल नहीं किया, उसका आकार ज्योति का आकार है। जैसे दीये की ज्योति का आकार होता है। शिवलिंग अंतर्ज्योति का प्रतीक है। जब तुम्हारे भीतर का दीया जलेगा तो ऐसी ही ज्योति प्रगट होती है, ऐसी ही शुभ्र! यही रूप होता है उसका। और ज्योति बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है।
धीरे धीरे ज्योतिर्मय व्यक्ति के चारों तरफ एक आभामंडल होता है; उस आभामंडल की आकृति भी अंडाकार होती है।
रहस्यवादियों ने तो इस सत्य को सदियों पहले जान लिया था। लेकिन इसके लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं थे। लेकिन अभी रूस में एक बड़ा वैज्ञानिक प्रयाग ची नहा है-किरलियान फोटोग्राफी। मनुष्य के आसपास जो ऊर्जा का मंडल होता है, अब उसके चित्र लिये जा सकते हैं। इतनी सूक्ष्म फिल्में बनाई जा चुकी हैं, जिनसे न केवल तुम्हारी देह का चित्र बन जाता है, बल्कि देह के आसपास जो विद्युत प्रगट होती है, उसका भी चित्र बन जाता है।
किरलियान चकित हुआ है, क्योंकि जैसे -जैसे व्यक्ति शांत होकर बैठता है, वैसे – वैसे उसके आसपास का जो विद्युत मंडल है, उसकी आकृति अंडाकार हो जाती है। उसको तो शिवलिंग का कोई पता नहीं है, लेकिन उसकी आकृति अंडाकार हो जाती है। शांत व्यक्ति जब बैठता है ध्यान तो उसके आसपास की ऊर्जा अंडाकार हो जाता है।
अशांत व्यक्ति के आसपास की ऊर्जा अंडाकार नहीं होती, खंडित होती है, टुकड़े -टुकड़े होती है। उसमें कोई संतुलन नहीं होता। एक हिस्सा छोटा- कुरूप होती है।
शिवलिंग ध्यान का प्रतीक है। वह ध्यान की आखिरी गहरी अवस्था का प्रतीक है। जिसने ध्यान जाना हो, उसके ही भीतर गोरख जैसा ज्ञान पैदा होता है। संतों की परंपरा में गोरख का बड़ा मूल्य है। क्योंकि गोरख ने जितनी ध्यान को पाने की विधिया हद हैं, उतनी किसी ने नहीं दी हैं। गोरख ने जितने द्वार ध्यान के खोले, किसी ने नहीं खोले।
गोरख ने इतने द्वार खोले ध्यान के कि गोरख के नाम से एक शब्द भीतर चल पड़ा है-गोरखधंधा! गोरख ने इतने द्वार खोले कि लोगों को लगा कि यह तो उलझन की बात हो गयी। गोरख ने एक- आध द्वार नहीं खोला, अनंत द्वार खोल दिये! गोरख ने इतनी बातें कह दीं, जितनी किसी ने कभी नहीं कही थीं।
बुद्ध ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, विपस्सना; बस पर्याप्त। महावीर ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, शुक्ल ध्यान; बस पर्याप्त। पतंजलि ने ध्यान की एक प्रक्रिया दी है, निर्विकल्प समाधि। बस पर्याप्त। गोरख ने परमात्मा के मंदिर के जितने संभव द्वार हो सकते हैं, सब द्वारों की चाबिया दी हैं।
लोग तो उलझन में पड़ गये, बिगूचन में पड़ गये, इसलिए गोरखधंधा शब्द बना लिया। जब भी कोई बिगूचन में पड़ जाता है तो वह कहता है बड़े गोरखधंधे में पड़ा हूं। तुम्हें भूल ही गया है कि गोरख शब्द कहां से आता है; गोरखनाथ से आता है। गोरखनाथ अद्भुत व्यक्ति हैं। उनकी गणना उन थोड़े -से लप्तेगे में होनी चाहिए-कृष्ण, बुद्ध, महावीर, पतंजलि, गोरख… बस।
इन थोड़े – से लोगों में ही उनकी गिनती हो सकती है। वे उन परम शिखरों में से एक हैं।

