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शहरी नक्सलवाद का दमन करने के नाम पर महाराष्ट्र सरकार का काला कानून

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सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था-“किसी भी व्यक्ति को किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य होने पर तब तक सज़ा नहीं दी जा सकती,जब‌ तक कि वह सीधे-सीधे किसी हिंसक गतिविधियों में शामिल न हो।” वास्तव में यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के इसी निर्णय को निष्क्रिय करने के लिए लाया गया है।

स्वदेश कुमार सिन्हा

भाजपा सरकार के आने के बाद केन्द्र सरकार तथा भाजपा शासित राज्य सरकारें जनआंदोलनों का दमन करने के लिए अनेक काले कानूनों को लागू कर रही हैं, इसी‌ कड़ी में महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के घड़े द्वारा शासित राज्य सरकार ने एक काले कानून को लागू करने का विधेयक विधानसभा में पेश किया। महाराष्ट्र सरकार ने गुरुवार को महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक पेश किया, जिसमें कहा गया कि “नक्सलवाद का खतरा” नक्सली संगठनों के माध्यम से शहरी क्षेत्रों में बढ़ रहा है। विधेयक 2024; जो जेल की सजा का प्रस्ताव करता है, भले ही कोई व्यक्ति किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य न हो, लेकिन कोई योगदान या सहायता देता है, प्राप्त करता है, मांगता है या उसके सदस्य को पनाह देता है, साथ ही उन लोगों के लिए भी; जो ऐसे समूहों की बैठक को बढ़ावा देते हैं या बढ़ावा देने में सहायता करते हैं”।

विधेयक राज्य सरकार को किसी संगठन को “गैरकानूनी” घोषित करने का अधिकार देता है। यह एक ऐसा निर्णय है,जिसकी समीक्षा राज्य सरकार द्वारा गठित सलाहकार बोर्ड द्वारा की जा सकती है। महाराष्ट्र में “माओवादी नेटवर्क के सुरक्षित ठिकानों और शहरी ठिकानों” का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि ऐसे समूह “संवैधानिक जनादेश के ख़िलाफ़ सशस्त्र विद्रोह की अपनी विचारधारा का प्रचार” करना चाहते हैं। विधेयक में ‘गैरकानूनी गतिविधि’ को इस प्रकार परिभाषित किया गया है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, शांति और सौहार्द के लिए खतरा या संकट उत्पन्न करती है। सार्वजनिक व्यवस्था “कानून प्रशासन या इसकी स्थापित संस्थाओं और कार्मिकों” के रखरखाव में हस्तक्षेप करती है, किसी भी लोकसेवक पर आपराधिक बल का प्रयोग करने के लिए बनाई गई है। हिंसा, बर्बरता, आग्नेयास्त्रों, विस्फोटकों का उपयोग या रेल, सड़क, वायु या जल द्वारा संचार को बाधित करने के कार्यों में लिप्त या प्रचारित करना, “स्थापित कानून और इसकी संस्थाओं की अवज्ञा को प्रोत्साहित करना या प्रचार करना”, गैरकानूनी गतिविधियों को करने के लिए धन या सामान एकत्र करना।

विधेयक में कहा गया है कि इस कानून के तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे तथा इनकी जांच उप-निरीक्षक स्तर से नीचे के रैंक के पुलिस अधिकारी द्वारा नहीं की जाएगी। विधेयक में अपराधों के लिए दंड का उल्लेख करते हुए कहा गया है:

विधेयक के अनुसार एक सलाहकार बोर्ड का गठन किया जाएगा,जिसमें तीन व्यक्ति होंगे “जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जा चुके हैं या नियुक्त किए जाने के योग्य हैं।” किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित करने के छह सप्ताह के भीतर सरकार को बोर्ड को एक संदर्भ देना होगा, जिसे उसके सामने रखे गए साक्ष्यों की जांच करने और संगठन में शामिल व्यक्तियों की सुनवाई करने के बाद तीन महीने के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, यदि बोर्ड किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित करने के लिए पर्याप्त कारण खोजने में विफल रहता है, तो सरकार अधिसूचना को रद्द कर देगी।

यदि किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित किया गया है, तो जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त इसकी गतिविधियों के लिए उपयोग किए जाने वाले किसी भी स्थान को अधिसूचित कर सकते हैं और उसे अपने कब्जे में ले सकते हैं। इसमें चल संपत्ति शामिल हो सकती है, जिसमें “पैसे, प्रतिभूतियां या अन्य संपत्तियां शामिल हैं।” इसमें आगे कहा गया है कि “जहां सरकार ऐसी जाँच के बाद जिसे वह उचित समझे, संतुष्ट हो जाती है कि किसी धन, प्रतिभूति या अन्य परिसंपत्तियों का उपयोग किसी गैरकानूनी संगठन के उद्देश्य के लिए किया जा रहा है या उपयोग किए जाने का इरादा है, तो सरकार ऐसे धन, प्रतिभूतियों या अन्य परिसंपत्तियों को सरकार के लिए जब्त घोषित कर सकती है।” सरकार की कार्रवाई के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर की जा सकती है।

विधेयक के ‘उद्देश्यों और कारणों के विवरण’ में कहा गया है, “नक्सलवाद का ख़तरा केवल नक्सल प्रभावित राज्यों के दूरदराज के इलाकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नक्सली संगठनों के माध्यम से शहरी इलाकों में भी इसकी मौजूदगी बढ़ रही है। नक्सली समूहों के सक्रिय संगठनों के प्रसार से उनके सशस्त्र कैडरों को रसद और सुरक्षित शरण के मामले में निरंतर और प्रभावी सहायता मिलती है। नक्सलियों के जब्त साहित्य से पता चलता है कि महाराष्ट्र राज्य के शहरों में माओवादी नेटवर्क के ‘सुरक्षित घर’ और ‘शहरी ठिकाने’ हैं। नक्सली संगठनों या उनके जैसे संगठनों की गतिविधियां उनके संयुक्त मोर्चे के माध्यम से आम जनता के बीच अशांति पैदा कर रही हैं, ताकि संवैधानिक जनादेश के ख़िलाफ़ सशस्त्र विद्रोह की उनकी विचारधारा का प्रचार किया जा सके और सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित किया जा सके।”

इस विधेयक के अनुसार ऐसे संगठनों को प्रभावी कानूनी तरीकों से नियंत्रित करने की आवश्यकता है। “नक्सलवाद की इस समस्या से निपटने के लिए मौजूदा कानून अप्रभावी और अपर्याप्त हैं।” केन्द्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) ने समय-समय पर शहरी क्षेत्रों में ऐसे संगठनों की गतिविधियों का मुकाबला करने और उन्हें मिलने वाले धन के प्रवाह को रोकने के लिए कार्यान्वयन तंत्र के लिए निर्देश जारी किए हैं। माओवाद प्रभावित राज्यों को ‘सुरक्षा संबंधी व्यय’ पर अपने दिशा-निर्देशों में, एमएचए ने राज्यों को ऐसे संगठनों की ‘गैरकानूनी गतिविधियों’ से निपटने के लिए कानून बनाने की सलाह दी है। “छत्तीसगढ़, तेलंगाना , आंध्र प्रदेश और ओडिशा राज्यों ने ऐसे संगठनों की गैरकानूनी गतिविधियों की अधिक प्रभावी रोकथाम के लिए सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम लागू किए हैं और 48 अग्रणी संगठनों पर प्रतिबंध लगाया है।’’ इसमें कहा गया है कि महाराष्ट्र में इसी तरह के कानून के अभाव में ऐसे संगठन राज्य में ‘‘सक्रिय’’ हैं।

पिछले साल नवंबर में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस; जो गृह विभाग भी संभालते हैं-ने कहा था कि राज्य सरकार अन्य राज्यों के इसी तरह के कानूनों का अध्ययन कर रही है। इस बीच विपक्ष ने इसे ‘कठोर कदम’ बताया है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस विधायक पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा, “यह विरोध को दबाने के अलावा और कुछ नहीं है… सरकार इस विधेयक को आज ही पेश करना और पारित करना चाहती थी। हमने इसका विरोध किया और स्पीकर से अनुरोध किया कि इसे आगे न बढ़ाया जाए। हम इस विधेयक का पुरजोर विरोध करेंगे।”

वास्तव में कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था-“किसी भी व्यक्ति को किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य होने पर तब तक सज़ा नहीं दी जा सकती,जब‌ तक कि वह सीधे-सीधे किसी हिंसक गतिविधियों में शामिल न हो।” वास्तव में यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के इसी निर्णय को निष्क्रिय करने के लिए लाया गया है। पिछले दिनों देश के अनेक राज्यों में अर्बन नक्सल के नाम पर ढेरों कार्यकर्ताओं, वकीलों, लेखकों, पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पहले के दिए गए निर्णयों के कारण उन्हें रिहा करना पड़ा। वास्तव में यह विधेयक देश में फासीवादी राज्य को वैधानिक जामा पहनाने जैसा है, इसीलिए सभी जनपक्षधर ताकतों को इस तरह के काले विधेयकों तथा कानूनों का पुरजोर विरोध करना चाहिए।(

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