3 जनवरी 1948 का दिन… दिल्ली की ठंडी हवा में बिरला हाउस (अब गांधी स्मृति) के बगीचे में महात्मा गांधी की आवाज गूंज रही थी. 78 साल की उम्र में कमजोर शरीर, लेकिन अटूट इच्छाशक्ति… विभाजन की आग में जल रहे देश में दिल्ली की गलियां खून से रंगी थीं. हिंदू, सिख और मुस्लिम एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा में लिप्त थे. लाखों लोग विस्थापित हो चुके थे. गांधीजी कलकत्ता में अनशन कर हिंसा रोक चुके थे, लेकिन दिल्ली में आग बुझ नहीं रही थी.
12 जनवरी की शाम प्रार्थना सभा में गांधीजी ने घोषणा की, ‘मैं आमरण अनशन शुरू कर रहा हूं. यह राजनीतिक नहीं, बल्कि मेरी अंतरात्मा की पुकार है. जब तक हिंदू, मुस्लिम और सिख के दिलों में सच्ची एकता नहीं आएगी, मैं भोजन नहीं लूंगा. मौत मेरे लिए मुक्ति होगी, अगर मैं भारत के विनाश का साक्षी बनकर रह जाऊं.’
महात्मा गांधी ने क्या रखी थी शर्तें?
महात्मा गांधी के इस अनशन की शर्तें साफ थीं… महरौली के हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह का उर्स शांतिपूर्वक मनाया जाए, दिल्ली की 100 से ज्यादा मस्जिदों को मंदिर या घरों में बदले जाने से रोका जाए, पुरानी दिल्ली में मुसलमानों को सुरक्षित घूमने दिया जाए, पाकिस्तान से लौटने वाले मुसलमानों का विरोध न हो, ट्रेनों में मुसलमानों की सुरक्षित यात्रा हो, मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार न हो, और हिंदू शरणार्थियों को मुस्लिम इलाकों में बसाने के लिए मुसलमानों की सहमति ली जाए.
अनशन शुरू होते ही दिल्ली में सन्नाटा छा गया. लोग बिरला हाउस के बाहर जमा होने लगे. पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता चिंतित थे. गांधीजी का वजन तेजी से गिर रहा था. वे सिर्फ पानी ले रहे थे. 78 साल की उम्र में यह अनशन मौत का आमंत्रण था. लेकिन गांधीजी अडिग थे. उन्होंने कहा, ‘मैं दिल्ली में शांति लाने आया हूं या यहां मरने.’
बिगड़ती रही सेहत, अडिग रहे गांधीजी
दिन बीतते गए. 14 जनवरी को ही गांधीजी काफी कमजोर हो गए, लेकिन प्रार्थना सभाएं जारी रहीं. लोग रोते हुए उनसे अनशन तोड़ने की मांग करते रहे, लेकिन महात्मा गांधी अडिग रहे. 15 और 16 जनवरी को उनकी हालत और बिगड़ गई. डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि उनका शरीर अब और नहीं सह सकता. गांधीजी ने सात शर्तें रखीं – सभी समुदायों के नेता इन पर हस्ताक्षर करें.
18 जनवरी 1948 को अनशन के छठे दिन हिंदू महासभा, आरएसएस, जमीयत-उल-उलेमा हिंद, कांग्रेस और अन्य संगठनों के 130 से ज्यादा प्रतिनिधि बिरला हाउस पहुंचे. उन्होंने शांति की शपथ ली: ‘हम हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों के लोग दिल्ली में भाईचारे से रहेंगे. मुसलमानों की जान-माल और धर्म की रक्षा करेंगे. पुरानी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी. मुसलमानों के लौटने पर कोई विरोध नहीं होगा.’
हिंदु चरमपंथियों को क्यों नगवार गुजरा यह अनशन?
इस पर गांधीजी ने कहा, ‘मैं आप पर विश्वास करता हूं.’ और फिर उन्होंने अपना अनशन तोड़ दिया. इस खबर से दिल्ली में खुशी की लहर दौड़ी. लोग सड़कों पर निकल आए, एक-दूसरे को गले लगाया. लेकिन यह शांति अल्पकालिक थी. गांधीजी का अनशन हिंदू चरमपंथियों को नागवार गुजरा. वे इसे मुसलमानों के पक्ष में देखते थे. सिर्फ 12 दिन बाद, 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना सभा में गांधीजी की हत्या कर दी.
यह अनशन गांधीजी का 11वां और अंतिम सार्वजनिक उपवास था. विभाजन की हिंसा में लाखों मारे गए थे, लेकिन गांधीजी ने अपनी जान दांव पर लगाकर दिल्ली में सद्भावना लौटाई. आज भी यह घटना सिखाती है कि अहिंसा और बलिदान से कितना बड़ा बदलाव लाया जा सकता है. गांधीजी ने कहा था, ‘हिंदू-मुस्लिम एकता मेरी जिंदगी का लक्ष्य है.’ उनका अंतिम अनशन उस लक्ष्य की अंतिम कोशिश थी, जो कुछ दिनों के लिए साकार हुई, लेकिन इतिहास में अमर हो गई.

