अग्नि आलोक

महुआ

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प्रखर अरोड़ा

अपने महुआ देखा है? उसके फूल को चुगा है? फूल को या उसके हलवे को या उसकी रोटी को खाया है? उसके कच्चे फल की शब्जी या उसका पका फल खाया है? महुआ के फूल की मदिरा पी है, उसके बीज का तेल खाया है? उसके पेड़ पर चढ़कर पकडम-पकडी खेले हो? नहीं ना!
महुआ दरख़्त है , फूल , फल , लकड़ी , आक्सीजन , शीतल छाया , परिंदों को बसेरा सब देता है। माँगता कुछ नही , न पानी न खाद.
यह अनुदान भोगी नही है. इसे पुरुषार्थ पर यक़ीन है. धरती इसकी मा है. ताउम्र उसी के सहारे खड़ा रहता है।
स्वाभिमानी दरख़्त है। चैत की अलसायी भोर में चूता है। मादक गंध का पीलापन लिए सफ़ेद फूल दूब घास की हरियाली पर दूर से दिखायी पड़ता है। भँवरे खुद पर नियंत्रण नही कर पाते, इर्द गिर्द चक्कर लगाते हैं।
ऊपर कमनीय त्रिभंगी उप शाख़ों पर झूलते कूचों पे रसचूसनी चोंच मारती है. पट्ट से महुआ चू जाता है। मधु मक्खी रस के अग़ल बग़ल घूम घूम कर मान मनौवल करती है।

खजुराहो के रेस्तराँ में बैठा शहर भी अकनता है कि ये चम्पा की इतनी ज़बरदस्त महक कहाँ से आ रही है? कनछेदी आँख गोल कर के शहर को देखता है और फिस्स ऐ हँस देता है – यह चम्पा की महक नही है. महुआ चुआ है !
– महुआ ?
कोने में पड़ी आराम कुरसी में धँसा दाढ़ी बुदबुदाता है :
महुआ
और हँस देता है
ज़ोर से
बिल्कुल आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की तरह
बाक़ी कुरसियाँ उचक के उस हंसी से मुख़ातिब हो जाती हैं
जो कोने से उठी थी।

शार्ट स्कर्ट को उत्सुकता हुयी. काजलवक्री हुआ. सहेली को टिप दिया :
फ़िलासफ़र लगता है
जितने आराम से बैठा है
कोई नार्मल इंसान नही बैठ सकता
देखो ज़रा
शहर को उत्सुकता हुई
अपने सवाल पर
कम हंसने वाले शख़्सियत में उसकी दिलचस्पी बढ़ गयी.

लेकिन यह टफलर कहता है :
रिहाईस का पता – जनता प्रेस, काली कुत्ती, ओलंदगंज, जौनपुर शहर से बाहर निकलो. शाही पुल की ओर बढ़ो. दाएँ बेनी राम इमरती की दुकान है. बाएँ बलई पूड़ी वाले हैं. यहीं से मुड़ जाओ बदलापुर पड़ाव की ओर. यह रंडियों का मुहल्ला है. दस कदम की दूरी पर शास्त्री जी का छापाखाना है.
वही नीम के पेड़ के नीचे बिलायती चबैना वाले भूँज मिलेंगे। उनका भाड़ ठेले पर बरता है। पांच रुपए का चबैना लीजिए, लहसुन नमक मुफ़्त में मिलेगा. लीजिए और चबाते हुए लौट आइए कालीकुत्ती।
बोर हुए न ? आप नही. उसकी बात कर रहा हूँ जो चबैना लेने गया था। आन लाइन मंगा सकता था।
-मतलब ?

अनुत्तरित सवाल थे। समाज बाँटकर मुल्क मज़बूत नही किया जा सकता. फ़क़ीर बोला ही था क़ि बंदूक़ से गोली निकल गयी। फ़क़ीर आगे आगे , गोली पीछे पीछे।
-फिर ?
– इंटरेस्टिंग. स्कर्ट और बिंदी दोनो कुरसियाँ कोने की तरफ़ घूम चुकी हैं।
– बकवास है. हम जानते हैं , लेकिन अमर्त्यसेन को तो बचाना है. दुनिया उन्हें सुनती है। “बकबकी भारत“ उनकी मशहूर किताब है ( The talkative India ) /हम बदल जाँय तो उनकी किताब का क्या होगा ?

तो हम कह रहे थे, गाँव गया था। पहले चकवड़ की खोजबीन की। उसकी दूसरी और लम्बी कहानी है। किस तरह चकवड़ लिए लिए दर दर भटका हूँ। काशी विश्वविद्यालय द्रव्य विभाग के दुबे जी से मिला. ग़ज़ब की जानकारी , लेकिन निर्गुन. यह जानकारी गाँव-गाँव क्यों नही गयी? गाँव का चकवड़ चवनप्रासों का बाप। ग़ज़ब की विटामिन का श्रोत. शाहरुख़ खान की क्रीम की आदि आजी चकवड़ की पाती. छोड़ो, आओ महुआ पर.
– क्या, सुनाओ ?
-बकरी चरा रहा था. शाम ढल रही थी. “काठ की घंटी“ सर्वेश्वर जी ने इसी जंगीपुर-खुर्द गाँव में देखा होगा.
हमने तो यही सुना है।

कितना फितरती इंसान रहा – प्रकृति का अकेला जंतु है यह इंसान. अपनी माँ के अलावा दूसरों की माओं का भी दूध पी कर अकड़ता है। अछा लगा यह देख कर माएँ इंसान के बच्चे को हांकने लगी है। चरवाहा आगे है बकरियाँ पीछे पीछे।
– साहेब ! कांग्रेस का होगा ?
अमर्त्यसेन के सवाल को हमने ब्रेख़्त के पास टिका दिया।
ब्रेख़्त की उँगली भारत के नक़्शे पर है. ठहाका यहाँ तक सुनायी पड़ता है :

“चरवाहे की मामूली सी गलती पर बकरियों ने खुद को कसाई के हवाले कर दिया.“
ब्रेख़्त से बात नही कर सका चरवाहा. बकरियों के साथ उनके घर तक आ गया था। बकरियाँ अपने आप दालान में चली गयी और चरवाहा आगे आगे.
अब बकरियों की जगह हम थे।एक खंडहर की साँकल बजी :
– तेवारी जी ! दरवाज़ा खोलअ. एक ठो महुआ चाही.
-हमारी तरफ़ मुड़ा : एकय चाही न साहेब ?

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