~ सुधा सिंह
समाज का सहयोग प्राप्त करना, लोकप्रिय बनना मानव जीवन में एक आवश्यक बात है। वर्तमान समय में जबकि विस्तृत मानव-समाज परस्पर निकट सम्पर्क में आता जा रहा है, राष्ट्रीय, द्वीपों, महाद्वीपों की दूरी घटकर उनका संबंध पड़ोसियों की तरह होता जा रहा है, विज्ञान और बौद्धिक प्रगति ने मनुष्य का कार्यक्षेत्र व्यापक बना दिया है। ऐसी स्थिति में लोकप्रियता की बात भी व्यापक और महत्वपूर्ण बन गई है।
जो व्यक्ति जितना लोकप्रिय होगा, जिसको समाज का सहयोग जितने बड़े रूप में मिलेगा, वह उतना ही महान बन सकेगा। समाज का सहयोग, लोकप्रियता मनुष्य के अपने ही प्रयत्न, व्यवहार, दूसरों से मधुर संबंध, सहयोग, सहिष्णुता की भावना तथा अन्य सद्गुणों पर निर्भर है। इसके लिए अपने सोचने में, काम करने में, दैनिक व्यवहार में बहुत सुधार करना पड़ता है।
अपने पड़ोसियों, मिलने-जुलने वालों तथा सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों से निकट संबंध बढ़ाये जाएंँ। उनके सुख-दु:ख, हानि-लाभ, चिन्ता, समस्याओं आदि में जितनी अभिरुचि प्रकट करते हुए उनके लिए सहानुभूति, सहयोग के प्रयास करना, उन्हें उचित सलाह देकर सहृदयतापूर्वक उनके दुःख-दर्द को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। इससे दूसरों को अपना बनाया जा सकता है।
यदि किसी के दुख-दर्द दूर करने में इस तरह मदद की जाए, तो उस व्यक्ति की सहानुभूति, आत्मीयता, सहयोग स्वत: ही मिल जाते हैं। जब इस तरह के व्यक्तियों का क्षेत्र व्यापक हो जाता है, तो मनुष्य उतना ही लोकप्रिय बन जाता है।
देखा जाता है कि दफ्तरों, कारखानों में काम करने वाले व्यक्तियों का व्यावहारिक संबंध केवल दफ्तर तक ही होता है। एक अध्यापक स्कूल की सीमा तक की बच्चों से संबंध रखता है, बाद में नहीं। ऐसी हालत में दूसरों से भी किसी तरह के सहयोग की आशा नहीं की जा सकती।
एक दूसरे के प्रति हमदर्दी, दिलचस्पी, हार्दिक संबंध रखने पर ही आत्मीयता की नींव लगती है। महापुरुषों की जीवनियों से मालूम होता है, कि वे पर-दुःख-कातर हो, दूसरों के दुःख, द्वन्द्वों में सहायता करते थे। गिरे हुए को उठाने, भूले भटकों को मार्गदर्शन देने, उलझनों में दूसरों का साथ देने वाले ही लोकप्रिय बनते हैं,दूसरों को अपना बनाते हैं।
महापुरुषों की विशेषता रही है कि एक बार भी जिससे मिले,कि वह उन्हें कभी नहीं भूला। इसका कारण है, उसका दूसरों के प्रति सहज प्रेम, गहरी सहानुभूति, निश्चल आत्मीयता। जिनके हृदय में अपने-पराये का कोई भेदभाव नहीं, वे ही लोकप्रियता प्राप्त करते हैं। स्वार्थी, औपचारिक व्यवहार करने वाला, शुष्क हृदय व्यक्ति दूसरों को अपना नहीं बन सकता।
जब किसी में कोई सद्गुण देखें, उसे कोई सत्कर्म करता पायें, तो उसकी उचित प्रशंसा करने में भी न चूका जाय। इसके लिए अपना दृष्टिकोण सदैव शुभदर्शी और उदार बनाया जाए। यदि इस तरह का दृष्टिकोण बन जाए, तो किसी भी व्यक्ति में कुछ न कुछ बातें ऐसी अवश्य मिल ही जाएगी, जिसके कारण उसकी प्रशंसा की जा सके।
सर्वथा बुरे व्यक्ति में भी कुछ न कुछ अच्छाइयांँ भी होती है। यदि मनुष्य की अच्छाइयों को महत्व देकर उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए, प्रशंसा की जाए, तो दूसरों के दृष्टिकोण को भी सरस और उदार बनाया जा सकता है। इसमें सुधार की संभावनाएंँ निहित हैं, साथ ही बुरा व्यक्ति अपनी प्रशंसा सुनकर अनन्य मित्र, सहयोगी, साथी बन सकता है।
दोष दर्शन, छिद्रान्वेषण का दृष्टिकोण हेय है। इससे परस्पर दुर्भावना और कटुता ही बढ़ती है। सुधार के बजाय बिगाड़ को ही प्रोत्साहन और उत्तेजना मिलती है। वस्तुतः विवेकपूर्वक देखा जाय, तो कुछ न कुछ कमी, बुराई हर जगह होती है। आवश्यकता इस बात की है, कि अपना दृष्टिकोण अच्छाइयों को देखने का हो और उनके लिए उचित प्रशंसा करने की उदारता हो। इसके लिए तनिक भी कंजूसी न रखी जाए।

