मीना राजपूत
उस रात की बात
न पूछ सखी री
क्या क्या जुल्म वो सितम
मेरे साथ हुआ
स्नानगृह में नहाने के लिये
जैसे ही मैं निर्वस्त्र हुई
मेरे कानों को लगा जैसे
दरवाज़े पर है खड़ा कोई
धक्-धक् करते दिल से मैंने
दरवाज़ा खोल दिया
उस रात की बात……….
आते ही साजन ने मुझको
अपनी बाँहों में कैद किया
मेरे यौवन की पा के झलक
जोश का यूँ संचार हुआ
जैसे कोई कामातुर योद्धा
रण गमन हेतु तैयार हुआ
उस रात की बात ………..
मदिरापान प्रारंभ किया वो
मेरे होठों के प्याले से
जैसे कोई पीने वाला
बरसों दूर रहा मधुशाले से
उरोजों को हाथों से लेके
जोर जोर से मसल दिया
उस रात की बात………..
फिर साजन ने सुन री सखी
जल का फव्वारा खोल दिया
भीगे यौवन के अंग-अंग को
उसने काम-तुला में तौल दिया
कंधे, स्तन,उदर, नितम्ब, कमर
कई तरह से पकड़े-छोड़े
उस रात की बात……………
गीले स्तन सख्त हाथों से
वस्त्रों की तरह निचोड़े गए
जल से भीगे नितम्बों को
दांतों से काट-कचोट लिया
जल क्रीड़ा से बहकी थी मैं
चुम्बनों से मैं थी दहक गई
उस रात की बात…………
मैं विस्मित सी उन की बाँहों में
लिपट चिपट के सिमट गई
वक्षों से वक्ष थे मिले हुए
और साँसों से साँसें मिलती थी
परवाने की आगोश में आके
शमाँ जिस तरह पिघलती थी
उस रात की बात……………
साजन ने नख से शिख तक
होंठों से अतिशय प्यार किया
मैंने भी बरबस ही झुककर के
साजन का अंग दुलार दिया
चूमत झूमत साजन
पंजे बल बैठ गए
मैंने अंग सटाय दिया
उस रात की बात……….
मैं खड़ी रही साजन के लब
नाभि के नीचे तक पैठ गए
मेरे उन गीले नाज़ुक अंग से
उन्होने जी भर रसपान किया
मैंने कन्धों पर पाँवों को रख
रस के द्वार को खोल दिया
उस रात की बात………….
मैं पूरी मस्ती में थी डूब गई
क्या करती थी ना होश रहा
साजन के होठों पर अंग रख
नितम्बों को चहुँ ओर हिलोर दिया
साजन बहके-दहके-चहके
मोहे जंघा पर ही बिठाय लिया
उस रात की बात…………..
मैंने भी उनकी कमर को
अपनी जंघाओं में फँसाय लिया
जल से भीगे और रस में तर अंगों ने
मंजिल खुद खोजी
उनके अंग ने मेरे अंग के
अंतिम पड़ाव तक वार किया
उस रात की बात……………..
ऊपर से थे जलीचे दो तन
दहक-दहक जाते
यौवन के सुरभित सौरभ से
अन्तर्मन महक -महक जाते
एक दंड से चार नितम्ब जुड़े
एक दूजे में धँस-धँस जाते
उस रात की बात………….
मेरे कोमल, नाजुक अंग को
बाँहों में जब तब भर लेते थे
नितम्ब को हाथों से पकड़े वो
स्पंदन को तेज गति देते थे
मैंने भी उन हर स्पंदन पर
दुगना जोर एक लगाय दिया
उस रात की बात…………….
मेरे अंग ने उनके अंग के
हर एक हिस्से को फँसाय लिया
ज्यों वृक्ष से लता लिपटती है
मैं साजन से लिपटी थी यों
साजन ने गहन दबाव दे
अपने अंग से चिपकाय लिया
उस रात की बात ……………
बाहों में जकड़ के मुझको
जब साजन ने खोली अँगिया
अब तो बस एक ही चाहत थी
साजन मुझमें ही खो जाएँ
मेरे यौवन को बाँहों में भरकर
जीवन भर के लिये सो जाऐं
उस रात की बात………….
होंठों में होंठ, सीने में वक्ष
आवागमन अंगों ने खूब किया
सब कहते हैं शीतल जल से
सारी गर्मी मिट जाती है
लेकिन इस जल ने तन मन की
गर्मी को और बढ़ाए दिया
उस रात की बात…………….
वो कंधे पीछे ले गया सखी
सारा तन बाँहों में उठा लिया
मैंने उसकी देखा-देखी सखी
अपना तन पीछे हटा लिया
इससे साजन को छूट मिली
तो नितम्ब को ऊपर उठा लिया
उस रात की बात……….
अंग में उलझे मेरे अंग ने
चुम्बक का जैसे काम किया
हाथों से ऊपर उठे बदन
नितम्बों से जा टकराते थे
जल में भीगे उत्तेजक क्षण
मृदंग की ध्वनि बजाते थे
उस रात की बात……….
खोदत-खोदत कामांगन को
जल के सोते फूटे री सखी
उसके अंग के फव्वारे ने मोहे
अन्तःस्थल तक सींच दिया
मैंने भी मस्ती में भरकर उनको
अपने बाँहों में भींच लिया
उस रात की बात………….
साजन के जोश भर अंग ने
मेरे अंग में मस्ती को घोल दिया
सदियों से प्यासे तन मन को
प्यार का तोहफा अनमोल दिया
फव्वारों से निकले हुए तरलों से
तन-मन थे दोनों तृप्त हुए
उस रात की बात ……….
साजन के प्यार के मादक क्षण
मेरे अंग-अंग में अभिव्यक्त हुए
मैंने तृप्ति के चुंबन से फिर से चिपटे
साजन का सत्कार किया
दोनों ने मिल संभोग समाधि का
यह बहता दरिया पार किया.
(चेतना विकास मिशन)

