अग्नि आलोक

मामा बालेश्वरदयाल ने आदिवासियों को समस्याओं से लड़ने का साहस ,इज़्जत से जीने का ढंग दिया

Share

मामा बालेश्वर दयाल की 24 वी पुण्यतिथि पर

रामस्वरूप मंत्री

26 दिसंबर को उस मसीहा को याद करने का दिन है, जिसने गरीब आदिवासियों उपेक्षित वर्ग उत्थान के लिए अपने घर वालों तक को छोड़ दिया था इस दौरान बामनिया स्थित उनके भील आश्रम व समाधि स्थल पर अंचल सहित समीपवर्ती राजस्थान व गुजरात से आस्था से हजारों अनुयायी शीश नवाने बड़ी संख्या पहुंचते रहे हैं आस्था भी ऐसी कि कभी उनके अनुयायियों को न तो तिथि याद दिलाने की जरूरत पड़ती है और ना ही बुलावा देना पड़ता है, बस पुण्यितिथि के दिन आश्रम पर कतार लगना शुरू हो जाती है।

आजाद भारत में शायद ही ऐसा कोई राज नेता हो जिसकी पुण्यतिथि पर हजारों आदिवासी जुटे हों और उन्हें भगवान की तरह पूजते हों मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के आदिवासी अंचल से हजारों की संख्या में 25 दिसम्बर से 27 दिसम्बर तक हर वर्ष जुटते हैं, पूरे अंचल में  उनकी सैकड़ों मूर्तियां स्थापित हैं, जहां आदिवासियों को मानता करते देखा जा सकता है। पश्चिम भारत के आदिवासी बहुल, झाबुआ, धार, रतलाम, दाहोद, बाँसवाड़ा, डूँगरपुर जि़लों के लाखों आदिवासियों की आज़ादी गाँधी से नहीं बल्कि, मामा जी की आँधी से आई, जिन्हें राजाओं के शोषण, वेठ बेगार, नशा खोरी, पुलिस, पटवारी और फ़ौरेस्ट की तानाशाही और दमन जैसी सैंकड़ों दैनिक समस्याओं से लड़ने का साहस दिया मामा जी ने, इज़्जत से जीने का ढंग दिया और इस पूरे क्षेत्र को एक अलग राजनैतिक पहचान दी इस आंदोलन का लाल झण्डा पुलिस, पटवारी और फ़ॉरेस्ट गार्ड को आदिवासियों के घरों से दूर रखता था।

इस इलाके के भील स्थानीय राजाओं की वेठ बेगार से बहुत त्रस्त थे। राजा का नियम था कि चोखियार  उच्च जाति के लोग – को बेगार माफ़ थी। मामा जी ने तिकड़म लगाई और पुरी के शंकराचार्य से मिलकर आदिवासियों को जनेऊ पहनाने की अनुमति ले ली। शंकराचार्य का आदेश आया कि दारू मास छोड़ो और जनेऊ पहनो। बस मामा जी ने इंदौर के कृष्ण कांत व्यास से कहकर इस बात के तीन लाख परचे छपवाये। गाँव-गाँव में खबर पहुँचाई। प्रचार का ज़बरदस्त असर हुआ और हज़ारों की संख्या में आदिवासी दूर-दूर से बामनिया आने लगे। जनेऊ पहन कर आदिवासियों को राजा की बेगार नहीं करनी पड़ती थी हालाँकि इसके लिये लोगों को गांव गांव में कड़ा संघर्ष करना पड़ा। बेगार विराधी आंदोलन इस भील क्षेत्र की बारह रियासतों में फैल गया। बेगार के साथ साथ अकाल के समय में जबरन कर वसूली के विरोध में भी आंदोलन छेड़ा।

राजाओं व कर्मचारियों की दमनकारी नीतियों का विरोध करने के साथ मामा जी ने सामाजिक मुद्दों पर भी काम किया। भीलों में नशाबंदी का लंबा आंदोलन चला। शराब पीने में आई कमी के चलते राजा की शराब के ठेकों से आमदनी बहुत कम हो गई। मामा जी की इन हरकतों के कारण राजाओं और पादरियों ने मिलकर मामा जी की शिकायतें करीं जिसके फल स्वरूप 1942 में महू के रेसीडेन्ट ने उन्हें इस क्षेत्र की नौ रियासतों से देश निकाला करने का आदेश दे दिया। कुछ दिन मामाजी को इंदौर की छावनी जेल में रखा गया। बाद में अहमदाबाद के एक होटल में पुलिस पहरे में रखा गया। मामा जी को जब पता चला कि सरकारी खर्च पर उन्हें होटल में रखा गया है तो उन्होंने बामनिया बांसवाड़ा और कुशलगढ़ के लोगों को मिलने के लिये बुला लिया। बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने आने लगे। होटल का खर्च इतना बढ़ गया कि सरकार ने उन्हें छोड़ दिया। छूटने के बाद वे दाहोद में रहने लगे।

यहां से इन्होंने जागीरी प्रथा और राजाओं की वेठ बेगार के खि़लाफ़ ज़ोरदार आंदोलन छेड़ दिया। कश्मीर में हुई – देशी राज्य परिषद बैठक में नेहरू ने इन्हें बुलाया। वहाँ मामाजी ने जागीरी प्रथा के कारण आदिवासियों की बर्बादी की कहानी नेहरू को सुनाई। उनकी बातें सुनकर नेहरू ने कहा – .‘‘स्वतंत्रता की पहली किरण के साथ ही जागीरें ख़त्म की जायेंगी’’। इस कथन अनुसार मामाजी ने सारे इलाके में पर्चे छपवा कर बंटवा दिये। परन्तु देश आज़ाद होने के बाद सारे जागीरदार काँग्रेस में शामिल हो गये। और जागीरें ख़त्म करने की बात को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया।

26 दिसंबर 1998 को मामाजी का देंहात हुआ। मामाजी के अवसान के 24 वर्ष बाद भी उनकी कुटिया और भील आश्रम उपेक्षित है। उनकी पुण्यतिथि पर प्रतिवर्ष हजारों अनुयायी समाधि पर श्रद्धाजंली अर्पित करने आते हैं।

अनुयायियों को यहां आने के लिए किसी के बुलावे का इंतजार नहीं करना पड़ता और ना ही किसी राजनीतिक नेता के घोषाणा से उन्हें कोई सरोकार होता है। उन्हें तो बस अपने देवता के धाम पर शीश नवाने से मतलब होता है। वे तो वाहनों से या पैदल ही चले आते हैं। मामाजी के आशीर्वाद से देश की राजनीति के क्षीतीज पर पहुंचे नेताओं ने भले ही उन्हें भुला दिया हो परंतु सच्चे देश भक्त के मन में आज भी उनके प्रति अगाध श्रद्धा है।सोमवार को मामाजी की 24 वीं पुण्यतिथि है। 

1937 में की थी भील आश्रम की स्थापना

मामाजी ने सन 1937 में बामनिया में डूंगर विद्यापीठ भील आश्रम की स्थापना की थी। उस समय बामनिया होलकर राज्य जिला महिदपुर के अंर्तगत आता था।  राज्य में बेगार प्रथा थी। बेगार अर्थात राजशाही द्वारा मजदूरी के स्थान पर दोनों समय केवल भोजन था। उस समय मामजी ने राजा को प्रभावित कर क्रास धारण करने वालों को भी बेगार प्रथा से मुक्त करवाया था।

आदिवासियों में आई जन जागृति को मामा जी ने मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ा जिसके फलस्वरूप आज़ादी के बाद के पहले आम चुनावों में इस पूरे क्षेत्र में मामा जी से जुड़े आदिवासी कार्यकर्ता विधायक और सांसद चुने गये। 1952 के पहले मध्य प्रदश विधान सभा चुनाव में झाबुआ की पाँचों सीटों से समाजवादी कार्यकर्ता जीते। इनमें जमना देवी भी थीं जो बाद में उप मुख्य मंत्री भी बनीं। राजस्थान में जसोदा बहन विधान सभा में जाने वाली पहली महिला विधायक थीं। सन् 71 में जब पूरे देश में इंदिरा गाँधी की लहर थी, बाँसवाड़ा में मामा जी के सहयोगी 45 हज़ार वोट से जीते थे। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि मामा जी ने समाजवादी पार्टी को देश के इस आदिवासी क्षेत्र में पहचान दिलाई।

पश्चिम भारत के इन जि़लों की खासियत यह है कि यहाँ अधिकाँश आदिवासी रहते हैं और थोड़े बहुत अन्य जातियों के लोग गाँवों से घिरे छोटे-छोटे बाज़ारों में रहते हैं। इसीलिये आदिवासी इन्हें बज़ारिया या शहरिया भी कहते हैं। आदिवासी बहुल इलाके होने के बावजूद यहाँ चलती इन्हीं गिने-चुने बज़ारियों की थी जो कि अधिकतर दुकानदार, साहूकार, वकील या सरकारी कर्मचारी या सरकारी दलाल होते थे। ये बाज़ार पूरी तरह आदिवासियों के शोषण पर पनपते हैं। इसीलिये आदिवासियों में जागृति की ज़रा सी गंध आते ही ये लोग इसे कुचलने में लग जाते हैं। आदिवासियों को तोड़ने में शराब की ऐतिहासिक भूमिका रही है।

उपेक्षित है भील आश्रम और कुटिया

मामाजी आदिवासी वर्ग के मसीहा रहें। उन्होंने आदिवासियों के लिए घरवालों को छोड़ दिया। जीवनभर समाज के उपेक्षित, गरीब वर्ग आदिवासियो के उत्थान के लिए न केवल संघर्ष बल्कि उनके बीच रहकर उन्ही की तरह जीवन-यापन किया और अपने जीवन के अंतिम क्षण एक कुटिया में बिताए, यह कुटिया आज भी यह बताती है कि मामाजी ने अपनी कथनी व करनी में कोई अंतर नहीं किया। आज यह भील आश्रम व मामाजी की कुटिया पूरी तरह उपेक्षित है।हर वर्ष मामाजी की बरसी पर राजनेताओं द्वारा कुटिया-आश्रम आदि के संरक्षण के वादे और दावे किए जाते है, लेकिन आज तक इन पर अमल नहीं हो सका।

घोषाणाएं नहीं हुई पूरी

मामाजी की पुण्यतिथि पर उनके अनुयायियों को कुछ मलाल है, तो केवल इतना कि राजनेताओं ने स्वार्थ के लिए, मामाजी के नाम का भरपूर उपयोग तो किया लेकिन उन्हीं नेताओं द्वारा की घोषणाएं आज तक पूरी नहीं हुई। पिछले एक दशक में मामाजी के सामधि स्थल, बामनिया पर आने वाले राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर के नेताओं ने मंच से कई घोषणाएं की। मामाजी की हर बरसी पर संकल्प लिया गया, लेकिन थोथा साबित हुआ। लिहाजा, इन नेताओं की घोषणाओं, संकल्प व यात्रा से मामाजी के अनुयायियों का मोह भंग होता जा रहा है।

सैनिक स्कूल : मामाजी की दूसरी पुण्यतिथी 26 दिसंबर 2000 को तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नाडीस ने बामनिया मे सैनिक स्कूल बनाए जाने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि यदि प्रदेश सरकार जमीन उपलब्ध कराती है, तो बाकी कार्रवाई हम पूरी करवा लेंगे। लेकिन इस पर भी कोई अमल नहीं हो सका।

सर्वसुविधायुक्त अस्पताल : मामाजी की स्मृति मे सर्वसुविधायुक्त अस्पताल बनाने की घोषणा तत्कालीन उपमुख्यमंत्री व मामाजी की शिष्या स्व. जमुनादेवी ने की थी इस पर भी कोई अमल नहीं हुआ।

सामुदायिक भवन : मामाजी की स्मृति में सामुदायिक भवन बनाने की घोषणा वर्तमान विधायक निर्मला भूरिया ने की थी। ताकि हर वर्ष मामाजी की पुण्यतिथि पर आने वाले अनुयायियों के ठंड और बारिश के मौसम में ठहरने की व्यवस्था हो पाएं। किंतु आज तक यह मांग भी पूरी नहीं हुई।

सभागृह : मामाजी के नाम पर विशाल सभागृह बनाने की घोषणा तत्कालीन् मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने की थी, लेकिन यह घोषणा भी पुरी नहीं हुई। यहां आने वाले हजारों अनुयायियों को ठंड मे खुले स्थान मे ही सोना पड़ता है।

रेलवे कारखाना : तत्कालीन रेलमंत्री लालूप्रसाद यादव ने बामनिया में रेलवे के स्लीपर कोच बनाने का कारखाना खालने की घोषणा की थी, वह आज तक पूरी नहीं हुई।

आधुनिक शिक्षा केंद्र : भीलों को शिक्षित करने के लिए मामाजी ने जिस  आश्रम की स्थापना की थी, उसको सर्वसुविधायुक्त आधुनिक शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित करने का आश्वसान समाजवादी नेता मुलायमसिंह यादव ने अपने बामनिया प्रवास पर पत्रकारों को दिया था।

*रामस्वरूप मंत्री*

*(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार एवं सोशलिस्ट पार्टी इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष है)*

Exit mobile version