मुनेश त्यागी
पश्चिमी बंगाल के पंचायत चुनावों में नामांकन के दौरान उम्मीदवारों की सुरक्षा में हुई चूक ने गंभीर रूप धारण कर लिए हैं। इस हिंसा को लेकर वहां की हाईकोर्ट भी सख्त हो गई है। उसने सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और उम्मीदवारों को नामांकन करने से रोकने के कारण नामांकन प्रक्रिया को एक दिन के लिए बढ़ा दिया है।
पश्चिमी बंगाल में अगले महीने पंचायत चुनाव होने जा रहे हैं जिन्हें लेकर वहां नामांकन प्रक्रिया जारी है। मगर पश्चिमी बंगाल की विपक्षी पार्टियों कांग्रेस, लेफ्ट फ्रंट और बीजेपी ने ममता सरकार और तृणमूल कांग्रेस पर नामांकन करने वाले उम्मीदवारों पर हिंसा, अपराध और मारपीट के गंभीर आरोप लगाए हैं, इस हिंसा का विरोध किया प्रतिवाद किया और सरकार से निष्पक्ष और शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव प्रक्रिया को संपन्न कराने की मांग की है। मगर विपक्षी पार्टियों की इन मांगों पर पश्चिमी बंगाल सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया और उन्हें अनदेखा और अनसुना कर दिया।
इसके बाद कोई उपचार न देखकर बंगाल के वरिष्ठ अधिवक्ता बिकास रंजन भट्टाचार्य ने कोलकाता हाईकोर्ट में याचिका दायर की जिसमें उन्होंने न्यायालय को बताया कि चुनाव के लिए नामांकन करने वाले उम्मीदवारों के साथ हिंसा हो रही है और पुलिस उन्हें सुरक्षा प्रधान नहीं कर रही है और पूरे चुनाव में लगभग हिंसा, अशांति और अपराध का माहौल है, पुलिस प्रशासन और चुनाव आयोग लगभग नाकाम हो गये हैं और वे हिंसा को रोकने में सक्षम नहीं है।
इन सारी दलीलों और तथ्यों पर गौर करते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि वहां उम्मीदवारों को सुरक्षा मोहिया कराए और पूरे चुनाव क्षेत्रों में केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए। हाईकोर्ट के आदेश के बाद, ममता बनर्जी इस कदर खौफजदा हो गई कि उसने हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर की है।
अब यहां सवाल उठता है कि आखिर पश्चिमी बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान इतनी हिंसा क्यों हो रही है? चुनाव अधिकारी और पुलिस निष्पक्षता से अपना काम करने में नाकाम क्यों हो रहे हैं? और ममता सरकार क्यों डर गई है और उम्मीदवारों को समय सीमा के अंदर अपने नॉमिनेशन क्यों नहीं फाइल करने दिये जा रहे है?
इस सबके प्रमुख कारण है कि ममता बनर्जी सरकार बंगाल के अंदर अपने जनविरोधी कारनामों के कारण और उस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण, वह जनता की नजरों में एक्सपोस हो गई है। वहां की सरकार पर नियुक्तियों और ट्रांसफर को लेकर मोटा पैसा कमाने के आरोप हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर जो पैसा लिया गया था वह पैसा वापस नहीं हुआ है उनकी नौकरियां चली गई हैं। इसके अलावा ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी मोर्चे और कांग्रेस के गठबंधन से भी पूरी तरह से भयभीत हो गई है और जनता की नजरों में तृणमूल कांग्रेस और सरकार की छवि धूमिल हो गई है।
यह तब भी गौर करने वाला है कि जब से वामपंथी मोर्चे और कांग्रेस का गठबंधन बना है तब से बंगाल की जनता इस मोर्चे के पीछे हो गई है। पिछले दो-तीन महीने में समितियों और यूनियनों के जो भी चुनाव हुए हैं उसमें वामपंथी और कांग्रेसी मोर्चे की जबरदस्त जीत हुई हैं जिसमें तृणमूल कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी है। पिछले दिनों यह भी देखा गया है तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों से परेशान होकर वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन ने जो रैलियां निकाली गई हैं, उनमें जनता के बहुत बड़े हिस्से ने भागेदारी की है। जनता की इस एकजुटता से तृणमूल कांग्रेस में डर का माहौल व्याप्त हो गया है।
यह भी आरोप लगाये जा रहें हैं कि पुलिस उम्मीदवारों को नामांकन करने से रोक रही है, उन्हें खदेड़ रही है और उन्हें डंडों से पीटा जा रहा है। हालत यहां तक खराब हो गए हैं कि टीएमसी और प्रशासन के लोग आपस में मिल गए हैं, वे उम्मीदवारों को पर्चा भरने से रोक रहे हैं, उनके साथ मारपीट को हिंसा कर रहे हैं। प्रशासन का टीएमसी के पक्ष में किया जा रहा पक्षपात, पूरी जनता में जगजाहिर हो चुका है और एक गहरी साजिश के तहत विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन भरने से रोका जा रहा है ताकि चुनाव में विपक्षी उम्मीदवारों को खड़ा ही न होने दिया जाए जिससे टीएमसी चुनाव में एकतरफा रूप से जीत हासिल कर लेगी।
इन सब कारणों से वहां पर जनता के बीच में गुस्सा है और वह जन विद्रोह पर उतर आई है। चुनाव में शांति और अमन कायम करने के लिए और निष्पक्ष, ईमानदार और फ्री और फेयर चुनाव कराने के लिए कोलकाता हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसकी सत्यता पर गौर करते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने आदेश दे दिया कि पश्चिमी बंगाल के पंचायत चुनाव में केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए और पूरे चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से और निष्पक्षता से सम्पन्न कराये जायें।
इन सब कारणों को लेकर ममता बनर्जी और त्रिणमूल कांग्रेस में डर पैदा हो गया है और अब उन्हें डर लगने लगा है कि निष्पक्ष चुनाव होने पर जनता, उनके के खिलाफ वोट करेगी, उन्हें सत्ता से बाहर कर देगी। इस प्रकार तृणमूल कांग्रेस और प्रशासन और चुनाव आयोग पक्षपाती हो गए हैं और वे तीनों मिलकर तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में चुनाव में काम कर रहे हैं जिस कारण वहां पर निष्पक्ष, फ्री एंड फेयर और शांतिपूर्ण चुनाव कराने में गंभीर स्थिति पैदा हो गई है।
यहीं पर सबसे अहम सवाल उठता है कि ममता बनर्जी सरकार ने केंद्रीय बलों की तैनाती के हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर क्यों की है? आखिर उसे क्या डर है, क्या आपत्ति है कि उसे केंद्रीय सुरक्षा बलों की देखरेख में चुनाव संपन्न हो जाएं ? उसे तो शांति पूर्ण और निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराने के हाईकोर्ट के आदेश से खुश होना चाहिए।
मगर हालात बता रहे हैं कि ऐसा नहीं है। विपक्षी दलों ने ममता सरकार पर आरोप लगाए हैं कि देश के लोकतांत्रिक इतिहास में यह अत्यंत काला अध्याय है और वहां जनतंत्र का लगभग खात्मा हो चुका है। उच्च न्यायालय कोलकाता के आदेश बता रहे हैं कि सरकार अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रही है और इन सब आरोपों के बावजूद भी राज्य चुनाव आयोग इन घटनाओं के प्रति लगभग उदासीन बना हुआ है। यह सब वास्तव में डराने वाला है।
सरकार और राज्य चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और शांतिपूर्ण ढंग से और निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराने की उम्मीदों पर पानी फिरता दिख रहा है। इन सारी आशंकाओं को खत्म किया जाना चाहिए और पश्चिमी बंगाल में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराए जाने का पूरा मौका वहां के मतदाताओं को दिया जाना चाहिए। वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन की सफलता और जागरूक जनता से खौफजदा त्रिणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी को, अपना डर खत्म करना चाहिए। वहां पर निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सम्पन्न हों, संविधान और कानून के शासन और वर्तमान समय की यही सबसे बड़ी मांग है।

