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ममता का सुप्रीम कोर्ट पहुंचना :एक नई इबारत का श्रीगणेश

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सुसंस्कृति परिहार 

ममता बनर्जी जो पश्चिम बंगाल की लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं जिन्हें हटाने का उपक्रम पिछले तीन राज्य चुनावों से भारत सरकार चला रही है। इसलिए उनके स्थापित वोटर्स को एसआईआर के ज़रिए , इस बार मुहिम ज़ोरदार तरीके से चल रही है। घुसपैठियों के नाम पर बाप दादा के समय से रह रहे मुस्लिम वोटर को लक्षित किया जा रहा है।एसआईआर में हुई गड़बड़ियों की शिकायत लेकर कुछ पीड़ितों के साथ ममता पिछले दिनों चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंची थी जहां चुनाव आयोग ने उनकी बात को सुनने समझने का कोई औचित्य नहीं समझा इसलिए वे ज्ञानेश जी की मीटिंग छोड़कर बाहर आ गई थीं।

आज जब इसी मुद्दे पर सीजेआई सूर्यकांत की बैंच में यह मुद्दा जेरे-बहस था तब ममता बनर्जी इस मामले दलील देने स्वत: पहुंच गई।ये कोई नई बात नहीं थी अंग्रेजी शासनकाल में हमारे कई स्वतंत्रता सेनानी अदालत में ख़ुद अपना केस लड़ते रहे हैं।उसी परम्परा का अनुसरण करते हुए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज सुको पहुंची थी।ये उनका अपना निजी मामला नहीं था यह था उनके राज्य में एसआईआर प्रक्रिया के तहत् वोटर को मतदान से वंचित करने जैसा मौलिक अधिकार।

आज बंगाल में एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सोमवार को बहस उस वक्त बेहद तीखी हो गई, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीधे चुनाव आयोग के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए. जैसे ही ममता बनर्जी ने कहा कि यह चुनाव आयोग, माफ कीजिए… व्हाट्सएप आयोग यह सब कर रहा है। कोर्टरूम में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया और चुनाव आयोग के होश उड़ गए।चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी।

यह पहला मौका है जब किसी राज्य की सीएम सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका पर खुद दलीलें पेश करती नजर आईं। दरअसल, ममता बनर्जी खुद प्रशिक्षित वकील हैं. कानून के जानकारों के अनुसार भारतीय न्याय व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति  चाहे वह मुख्यमंत्री हो या साधारण नागरिक अपना केस खुद लड़ सकता है, लेकिन यह कोई स्वत: अधिकार नहीं है।

यह पार्टी इन पर्सन के तहत आता है जहां याचिकाकर्ता को कोर्ट की अनुमति लेनी पड़ती है. एडवोकेट्स एक्ट की धारा 32 के मुताबिक अदालत किसी भी व्यक्ति को अपनी अनुमति से पेश होने की इजाजत दे सकती है भले वह पेशेवर वकील हो या नहीं. लेकिन यह विशेष परिस्थितियों में होता है जैसे जब मामला व्यक्तिगत हो या याचिकाकर्ता कानूनी रूप से अपनी पैरवी करने में सक्षम हो।

अपनी पैरवी के लिए याचिकाकर्ता को कानून में तय एक पूरी प्रक्रिया तय करनी पड़ती है. जैसे खुद पैरवी के लिए वह याचिका के साथ अलग से आवेदन देगा

 फिर जज यह देखते हैं कि क्या याचिकाकर्ता कोर्ट की मदद कर सकता है या मामला ठीक से संभाल सकता है। आमतौर पर सिविल या रिट याचिकाओं में कोर्ट ऐसी अनुमति दे देता है। 

बहरहाल,ममता ने सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हुए जिस तरीके से अपने राज्य के लोगों की बात रखी तथा बैंच को नोटिस जारी करने बाध्य किया।वह बंगाल की जनता को सुदृढ़ बनाएगी। उन्होंने आगे पूरा केस लड़ने का भी फैसला किया है जो स्वागतेय है।

लेकिन इधर भाजपा जैसी शैतान पार्टी ने उनकी अनुपस्थिति में बंगाल में पुलिस अधिकारियों सहित 12 लोगों पर ईडी के छापे डलवाए हैं। ईडी किसके इशारों पर काम करती है यह सच अब  छुपा नहीं है। लेकिन ममता की ताकत इनसे निरंतर बढ़ेगी ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं। देखिए आगे आगे क्या होता है?

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