शैलेन्द्र चौहान
हाल के दिनों में वाराणसी में मणिकर्णिका घाट की तोड़फोड़ को लेकर एक समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख में लेखक अपनी स्थापना को “इतिहास-बोध” का उदाहरण बताता है, किंतु वस्तुतः वह इतिहास की चयनात्मक व्याख्या और आधुनिक सत्ता-परियोजनाओं के औचित्य-निर्माण का उपकरण बन जाता है। जिस विवेक और धीरज की अपील वह पाठक से करता है, उसी विवेक को वह पाठक से छीन भी लेता है—क्योंकि पूरे लेख में तथ्य और निष्कर्ष के बीच आवश्यक दूरी को लगातार मिटाने का यत्न किया गया है। इतिहास, जो प्रश्न पूछने की विद्या है, यहाँ उत्तरों को पहले से तय कर लेने का माध्यम बन जाता है।

लेख का मूल तर्क यह है कि वर्तमान मणिकर्णिका घाट को पौराणिक “महाश्मशान” मानना एक ऐतिहासिक भूल है, और इसलिए वहाँ हो रहे विध्वंस या पुनर्निर्माण पर उठाए गए प्रश्न अतिशय भावनात्मक हैं। यह तर्क इतिहास की बुनियादी समझ के विपरीत है। इतिहास केवल यह नहीं देखता कि कोई स्थल किस ग्रंथ में किस निर्देशांक पर वर्णित है; वह यह भी देखता है कि सामाजिक स्मृति, निरंतर अनुष्ठान, कर्मकांड और सांस्कृतिक व्यवहार किसी स्थान को क्या अर्थ देते हैं। किसी एक ग्रंथ—जैसे काशीखंड—को अकेला “दस्तावेज़” मानकर शेष परंपरा, लोक-स्मृति, मध्यकालीन यात्रावृत्तांतों, औपनिवेशिक गजेटियरों और सदियों से चली आ रही दाह-संस्कार परंपरा को गौण ठहराना इतिहास नहीं, बल्कि ग्रंथ-केन्द्रित संकुचन है।
लेख में बार-बार यह स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि क्योंकि काशी में समय के साथ स्थल बदले हैं, स्थापत्य नष्ट हुए हैं, इसलिए आज जो कुछ हो रहा है वह भी उसी ऐतिहासिक निरंतरता का हिस्सा है। यह तर्क एक खतरनाक बौद्धिक छल है। इतिहास में हुए विध्वंस—चाहे वे आक्रमणों के परिणाम रहे हों या औपनिवेशिक हस्तक्षेप के—को आज के राज्य-प्रायोजित “परिष्कार” के साथ समान धरातल पर रखना, हिंसा और संरक्षण के बीच के बुनियादी अंतर को मिटा देना है। इतिहासकार यह जानते हैं कि जो हुआ और जो होना चाहिए—ये दोनों एक नहीं होते। अतीत के अन्याय वर्तमान के किसी भी अन्याय को वैध नहीं बनाते।
इसी क्रम में लेख का एक वाक्य विशेष रूप से ध्यान खींचता है—“हर निर्माण में कुछ न कुछ विध्वंस होता ही है।” सुनने में यह सामान्य लगता है, किंतु यही वाक्य सत्ता-प्रचार का सबसे सुविधाजनक औज़ार बनता है। आधुनिक संरक्षण सिद्धांत—चाहे वह यूनेस्को के हों या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की आचार-संहिता—स्पष्ट करते हैं कि जीवित विरासत (Living Heritage) के साथ हस्तक्षेप केवल भौतिक प्रश्न नहीं होता। वह धार्मिक आस्था, कर्मकांड, आजीविका, समुदाय और सामाजिक संरचना से गहराई से जुड़ा होता है। मणिकर्णिका कोई परित्यक्त खंडहर नहीं है जिसे नए सिरे से गढ़ा जाए; वह एक सक्रिय श्मशान है, जहाँ हर परिवर्तन जीवन और मृत्यु के अनुभव को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
लेख में व्यक्तिगत अनुभवों—फिसलन, गंदगी, दुर्घटनाओं—का उल्लेख इस तरह किया गया है, मानो वर्तमान स्वरूप अपने आप में अमानवीय था और इसलिए उसका “कायाकल्प” अनिवार्य है। यह अनुभव का राजनीतिक उपयोग है। अव्यवस्था का कारण परंपरा नहीं, बल्कि प्रशासनिक उपेक्षा होती है। दशकों तक राज्य ने श्मशान की सुरक्षा, सफ़ाई, श्रमिकों और डोम समुदाय की स्थिति की उपेक्षा की—और अब उसी उपेक्षा को आधार बनाकर हस्तक्षेप को “उद्धार” कहा जा रहा है। यह वही तर्क है, जिसमें पहले जंगल जलाए जाते हैं और फिर कहा जाता है कि अब यहाँ बाँध बनाना ज़रूरी है।
सबसे चिंताजनक निष्कर्ष यह स्थापित किया जाता है कि “महाश्मशान” तो कहीं और था, और इसलिए आज मणिकर्णिका को लेकर उठने वाली भावनाएँ केवल भ्रम हैं। यह इतिहास नहीं, बल्कि आस्था के पुनर्विन्यास की राजनीति है। आस्था कोई नक्शे पर खींची गई रेखा नहीं होती। वह सतत अभ्यास, सामूहिक स्मृति और सामाजिक स्वीकार्यता से निर्मित होती है। जिस स्थान पर सदियों से चिताएँ जली हैं, जहाँ डोम समुदाय की पीढ़ियाँ रहीं, जहाँ मृत्यु-संस्कार की पूरी सभ्यता विकसित हुई—उसे केवल इसलिए “ग़ैर-महाश्मशान” कहना कि वह किसी एक ग्रंथीय निर्देश से मेल नहीं खाता, आस्था का नहीं, सत्ता का तर्क है।
विडंबना यह है कि लेख अंततः पाठक से धीरज और विवेक की अपील करता है, पर स्वयं उसी विवेक का पालन नहीं करता। वह वायरल कंटेंट की आलोचना करता है, लेकिन अख़बार की प्रतिष्ठा का उपयोग कर एक एकपक्षीय आख्यान गढ़ता है। वह अंधविश्वास का विरोध करने का दावा करता है, पर आस्था को सत्ता-सुविधा के अनुसार पुनर्परिभाषित करता है।
सच यह है कि मणिकर्णिका पर विमर्श इतिहास बनाम विकास का प्रश्न नहीं है। यह सत्ता बनाम स्मृति, प्रशासन बनाम परंपरा और परियोजना बनाम समुदाय का प्रश्न है। इसका उत्तर न तो भावनात्मक नारेबाज़ी में है, न ही ग्रंथीय उद्धरणों की आड़ में। उत्तर है—ईमानदार बहस में, बहु-स्रोत इतिहास में और उस विनम्रता में, जो यह स्वीकार कर सके कि कुछ स्थल ऐसे होते हैं, जहाँ राज्य को नहीं, इतिहास को पहले बोलने देना चाहिए।
शैलेन्द्र चौहान
मो. 7838897877