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अर्थव्यवस्था के राष्ट्रपिता मनमोहन

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अपूर्व भारद्वाज

बात 1991 की है मैं ज्यादा बड़ा नही था 8 वी में पढ़ता था लेकिन अखबार पढ़ने का बड़ा शौक था अकसर अख़बार में खबर पढ़ता था कि भारत की अर्थव्यवस्था बड़े संकट में है भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ सकता है अर्थव्यवस्था क्या होती है उसके नाम पर संघ के स्कूल में केवल उसकी परिभाषा को रटा था इसलिए कुछ पल्ले नही पड़ता था इसलिए एक दिन हिम्मत करके आचार्य जी से पूछ लिया की भारत को अपना सोना क्यों गिरवी रखना पड़ रहा है ??

आचार्य जी का जवाब बड़ा कमाल था बोला यह सब कांग्रेस की वजह से हो रहा है मुझे कुछ पता नही था इसलिए उनके जवाब को सही मानकर यह बात एक दिन मैंने घर मे बोल दी तब माँ ने कहा जब घर पर संकट आता है तो सोना ही काम आता है और देश पर संकट के लिए कोई एक आदमी या पार्टी जिम्मेदार नही होती है देखना सोना फिर वापिस आएगा औऱ यह देश फिर सोने की चिड़िया बन जाएगा …

माँ की बातों में आशा थी इस देश के नेतृत्व पर विश्वास था की वो ईमानदारी से इस संकट से देश को निकाल लाएंगे नब्बे के दशक में मंडल और कमंडल का आंदोलन जोर पर था पूरी राजनीति पर मंडल कमंडल का आभामंडल था इसमे जनता को आर्थिकी भला कैसे याद रहती वीपी सिंह की सरकार गिर गई चन्द्रशेखर को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया देश मे एक अस्थिरता थी 

विदेश में खाड़ी युद्ध के कारण अस्थिरता थी 1985 से चले आ रहे मौद्रिक कुप्रबंधन के कारण मुद्रा का अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया चन्द्रशेखर सरकार बजट तक पारित नही कर पाई  हालात यह थे कि भारत के पास केवल तीन हफ्ते का विदेशी मुद्रा का भंडार बचा था वर्ल्ड बैंक और imf ने भी हाथ खींच लिए थे भारत डिफाल्टर बनने की कगार पर खड़ा था 

ऐसे भयावह संकट में आते है अर्थव्यवस्था के “मनमोहन” उनके आते ही तस्वीर बदलना शुर हो जाती है वो भारत मे अभूतपूर्व आर्थिक सुधार लाते है उन्होंने लाइसेंस राज को कम किया, टैरिफ और ब्याज दरों को कम किया और कई प्रकार की मोनोपोली को समाप्त कर दिया, जिससे कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को जबरदस्त बढ़ावा मिला मन मोहन सिंह के द्वारा शुरू किए गए सुधारो का ही कमाल था कि 21 वीं सदी के अंत तक, भारत ने मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रगति की, अर्थव्यवस्था में सरकार नियंत्रण में पर्याप्त कमी और वित्तीय उदारीकरण में वृद्धि हुई और भारत एक नई आर्थिक शक्ति बनकर उभरा

2008 में जब विश्व वैश्विक महामंदी से गुजर रहा था तब यह मनमोहन सिंह थे जिन्होंने एक बार फिर इस देश को मंदी के संकट से उबारा था 1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों के कारण भारत की आर्थिकी का आधारभूत ढांचा इतना मजबूत हो गया था कि उसे वैश्विक संकट से उबरने में ज्यादा समय नही लगा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें भारत की आधुनिक अर्थव्यवस्था का जनक कहा था 

आज हम जब कौन इस देश का राष्ट्रपिता है और कौन नही की बहस में उलझे है इस समय मुझे माँ की बात याद आ रही है माँ ने कहा था जो सोना क्या अपने आप को भी गिरवी रखकर अपने बच्चों का भविष्य बचाता है वहीँ तो पिता कहलाता है आप किसी को भी राष्ट्रपिता मान सकते है लेकिन मैं तो इस देश की अर्थव्यवस्था के राष्ट्रपिता तो डॉक्टर मनमोहन सिंह को ही मानूँगा जन्मदिन पर भारत की मिट्टी के इस महान सपूत को बहुत बधाई बधाई  

अपूर्व भारद्वाज

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