(यह चिंतन स्प्रिचुअल पाठक’मित्रों के लिए है)
~ डॉ. विकास मानव
_सविकल्प समाधि के बाद है निर्विकल्प समाधि। योग की सर्वोच्च स्थिति है यह। योगियों को इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए कई जन्मों तक लगातार योगाभ्यास करना पड़ता है। निर्विकल्प समाधि में मन का अस्तित्व पूर्णरूप से आत्मा में लीन हो जाता है।_
केवल आत्म-बोध रहता है। ‘मैं-पन’ का बोध रहता है। इस बोध के समय योगियों का सम्बन्ध आत्म-लोक से रहता है। इसी अवस्था में वे अपने आत्म- खण्ड के अस्तित्व का भी बोध करते हैं।
आत्म-खण्ड ने यदि कहीं जन्म लिया है तो वे उसका भी पता लगा लेते हैं और बाद में उसकी खोज में निकल पड़ते हैं।
अगर-आत्म खण्ड ने संसार में कहीं जन्म नहीं लिया है तो उस स्थिति में उन्हें स्वयं इस बात का ज्ञान हो जाता है ‘वह खंड’ कहाँ है और किस स्थिति में है और फिर उससे सम्पर्क स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि अगर आत्म-खण्ड किसी अभौतिक सत्ता के क्षेत्र में है तो योगिगण उसकी संसार में जन्म लेने की प्रतीक्षा करते हैं।
अगर जन्म लेने की सम्भावना किसी कारणवश नहीं रहती तो वे स्वयं अपने पार्थिव शरीर को त्याग कर वहां उस क्षेत्र में पहुँच जाते हैं, जहाँ उनका आत्म-खण्ड रहता है।
सविकल्प समाधि का सम्बन्ध ‘मनोलोक’ से और निर्विकल्प समाधि का सम्बन्ध आत्म-लोक से है। मनोलोक और आत्मलोक की जितनी विशेषतायें हैं, उनमें एक है–त्रिकाल-ज्ञान और त्रिकाल-दर्शन।
वहां काल ‘खण्ड’ (भूत, वर्तमान और भविष्य के रूप में ) नहीं, ‘अखण्ड’ है। उसके अखण्ड प्रवाह में तीनों काल एक साथ भासते हैं जिसके फलस्वरूप मनोलोक में एक साथ ही एक समय और एक अवस्था में तीनों कालों का बोध होता है।
काल का प्रवाह अक्षुण्ण है। काल की तरह जीवन का प्रवाह भी अक्षुण्ण है। योगी के लिए न जन्म है और न मृत्यु। वह जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि को ही जीवन नहीं मानता, मृत्यु और जन्म के बीच की अवधि में आत्मा क्या करती है, कहाँ रहती है ? यहाँ भी वह जीवन मानता है.
जीवन एक सतत प्रवाहशील धारा है। उस सतत प्रवाहशील धारा का मूल उद्गम कहाँ है, उसका आदि कहाँ है, अन्त कहाँ है ? कहाँ जाकर समाप्त होती है वह ?–यह सब कोई नहीं जानता, सिवाय ईश्वर के।
सविकल्प समाधि में मनोलोक में प्रवेश होने पर जो सर्वोपरि उपलब्धि है, वह है–‘त्रिकाल बोध’ या ‘त्रिकाल ज्ञान’। योग की भाषा में इसे ही ‘काल-सिद्धि’ कहते हैं। काल-सिद्धि प्राप्त योगियों को अपने जन्म-जन्मान्तरों की सारी कथा, सारा विवरण ज्ञात होता है।
आत्म-लोक मनोलोक से भी उन्नत है। जैसे मनोलोक में मन की असीम शक्ति का प्रभाव है, उसी प्रकार वहां आत्मलोक का विस्तार है। निर्विकल्प समाधि में पहुँचने वाले योगियों को तीनों कालों से सम्बंधित सभी घटनाओं के दर्शन होते है जिसे योग की भाषा में ‘काल-दर्शन-सिद्धि’ कहते हैं।
इस सिद्धि वाले योगी अपने आगे-पीछे के जन्मों को चलचित्रवत देखते हैं। अपने आलावा वे किसी भी व्यक्ति के आगे और पीछे के जन्मों को भी देख सकते हैं और उसे दिखला भी सकते हैं।

