कॉरपोरेट में नौकरी करने वालों के लिए नीतीश कुमार बहुत शानदार केस स्टडी है। नीतीश की राजनीति से मैनेजमेंट के कई सबक मिलते है…*
1. जब तक दूसरा ऑफर लैटर हाथ में न हो, पहली कंपनी से रिजाइन मत करो।
2. एक बार दूसरा ऑफर स्वीकार कर लो तो पहली कंपनी कितना भी इन्क्रीमेंट, प्रमोशन का लालच दे, रुको मत क्योंकि एक बार इस्तीफा देने के बाद हायर मैनेजमेंट की नजरों में आ चुके होते हो और भले आप रुक गए हो, कंपनी आपका रिप्लेसमेंट ढूँढने लगती है।
3. अगर आप में स्किल्स है और आप कंपनी के लिए असेट हो तो पहली कंपनी के दरवाजे आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे। इसलिए अपने स्किल्स को तराशते रहिए, मार्केट में डिमांड बनी रहेगी! बारगेनिंग के लिए हमेशा ओपन रहिए। अड़ियल रवैया नुकसान कर सकता है।
4. कंपनी लॉयल्टी, एथिक्स, वर्क कल्चर वगैरे सब हवाई बातें है। कॉरपोरेट के जंगल में हर व्यक्ति/कंपनी शिकार भी है और शिकारी भी। यहाँ आपको बस अपने लिए सोचना है। जब लेऑफ़ होंगे, कंपनी एक बार भी आपके लिए नहीं सोचेगी जब अच्छा ऑफर आयेगा आपका कोई टीम मेम्बर आपके लिए नहीं रुकेगा। इसलिए बस शिकार पर नजर रखिये और जब मौका मिले अपना हिस्सा लेकर अगले मिशन पर चल निकले।
5. नेटवर्किंग हमेशा सॉलिड बनाकर रखिये। किससे कब फिर से पाला पड़ जाए भरोसा नहीं!
आज के लिए मैनेजमेंट सबक बस इतना ही!
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बंटवारा उसी का हो सकता है जिसका वजूद हो, जो हो ही न उसका बँटवारा कैसे होगा। ये बात विवादित लगेगी लेकिन आप सोच कर प्रतिक्रिया देंगे तो मैं भी आप से सीखूंगा।
1947 से पहले क्या एक देश के रूप में भारत का अस्तित्व था? इतिहास की मानें तो यहाँ सैकड़ों राजा थे, उनकी हुकूमतें थीं, कभी वो आज़ाद राजा होते थे कभी किसी के अधीन। अशोक से लेकर अकबर तक शासकों ने विशाल इलाकों पर हुकूमत की, पर क्या उनके हुकूमत में आने वाले इलाके एक देश थे ? क्या जनता में देश वाली भावना भी पनपी थी ?
अंग्रेज़ों ने ज़रूर पूरे देश को एक प्रशासनिक व्यवस्था में लाने का काम किया, लेकिन तब भी बहुत से आदिवासी और दूर दराज़ के इलाके अलग ही रहे। राजे और नवाब अंग्रेज़ों के अधीन हुकूमत कर रहे थे।
दुनिया में जो देश बने हैं उनमें अमूमन सांस्कृतिक एकता है या कम से कम कोई एक ज़बान पूरे देश में या देश के बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली जाती है। भारत इस मामले में भी विशिष्ट है। यहाँ भाषा और संस्कृति के आधार पर इतनी विभिन्नताएं हैं कि इसे राष्ट्रीयताओं का समूह कहना चाहिए।
दरअसल, 1947 को दो नए मुल्क़ वजूद में आये, जो पहले भारत नामक राष्ट्रीयताओं के समूह का ही हिस्सा थे। बाद में सांस्कृतिक विभिन्नताओं के कारण पाकिस्तान दो मुल्क़ों में बंट गया।
इस हकीकत को स्वीकार कर लेने से मुल्क़ में अमन क़ायम करने में थोड़ी मदद मिल सकती है। वरना किसने देश को बांटा, क्यों बांटा, ये ग़लत था या सही, ये अनंत तक चलने वाली बहस है।
दरअसल धर्म और देश के इर्द गिर्द खड़ी की गई सियासत ने दुनिया में अब तक लाखों लोगों को मार दिया है। वैसे भी इस सियासत का आम आदमी की ज़िन्दगी को तो कोई फायदा हो नहीं रहा है और देशों को बाँटकर पूंजीवादी लूट का भविष्य भी अब नहीं रहा। अब तो पूंजीपति कहीं भी बैठकर किसी भी देश को उसी देश के कुछ दलाल खड़े कर लूट सकता है।
अमेरिका वहीं बैठे बैठे घुड़केगा और किसी मुल्क़ की हुकूमत उसके मन मुताबिक नीतियां बना देगी। चाइना आराम से घर में घुस जाएगा और घर का मालिक चूं भी नहीं करेगा।
बेहतर यही है कि नस्ल, धर्म और देश के इर्द गिर्द एक दूसरे को आँख दिखाना बन्द कीजिये। जैसे पूंजीपतियों के लिए दुनिया उन्हीं की है वैसे मेहनत करने वालों के लिए भी सारी दुनिया उन्हीं की है।
लड़ाई के मोर्चे तय करने से पहले दिल नहीं दिमाग़ का इस्तेमाल कीजिये !

