Site icon अग्नि आलोक

दुनियाभर में नाम रोशन कर रहे मध्यप्रदेश के कई प्रवासी भारतीय

Share

योगेश पाण्डे

मेरे पास पैसे नहीं थे। अपनी बाइक बेची और प्लेन की टिकट कराई। 30 सितंबर 2001 को मैं पहली बार लंदन गया। मेरी जेब में केवल 200 पाउंड थे। मैं पहली बार प्लेन में बैठा। लंदन में किसी को नहीं जानता था। वहां 3 साल जॉब की। फिर बिजनेस करने लगा। 2016 में राजनीति में एंट्री की और लंदन का डिप्टी मेयर बना। मैं भारतीय मूल का पहला व्यक्ति था, जो लंदन में डिप्टी मेयर बना। यह कहानी है इंदौर के राजेश अग्रवाल की। इनकी तरह दुनियाभर में नाम रोशन कर रहे मध्यप्रदेश के कई प्रवासी भारतीयों की दिलचस्प कहानियां हैं।

लंदन के डिप्टी मेयर राजेश अग्रवाल के लंदन में बसने और राजनीति में एंट्री की कहानी बताती है कि यदि आप मेहनत करते हैं तो सफलता जरूर मिलती है। राजेश बताते हैं- 1999 में मुझे वेब डिज़ाइनिंग में सेल्स के काम के दौरान छह महीने मुंबई, छह महीने लंदन जाने का मौका मिला। कंपनी ने कहा टिकट करा लो, रीइम्बर्समेंट देंगे। मेरे पास पैसा नहीं था। मैंने बाइक बेची और प्लेन की टिकट कराई।

तीन साल नौकरी करने के बाद बिजनेस शुरू किया, किस्मत से एक के बाद एक कामयाबी हासिल करता रहा। अभी मेरा फोकस राजनीति में है। वे कहते हैं- इंदौर में बीते 20 सालों में बड़ा बदलाव हुआ है। 6 बार से इंदौर देश का सबसे साफ शहर बना हुआ है। ये दिखाता है कि यदि राजनीति, जनता की भागीदारी हो तो बड़े से बड़ा काम हो सकता है। इंदौर को स्वच्छ बनाना यहां का एक जन आंदोलन है। ये दुनिया के लिए भी एक उदाहरण है। इंदौर में प्रतिभा की कमी नहीं है।

निवाड़ी के इस प्रवासी भारतीय ने लंदन में मध्यप्रदेश के 10 हजार परिवारों को खोज निकाला

मध्यप्रदेश के छोटे से जिले निवाड़ी में जन्मे रोहित दीक्षित IT प्रोफेशनल हैं। 2010 में जॉब के सिलसिले में लंदन पहुंचे। यहां उनके बड़े भाई राहुल दीक्षित पहले से ही रियल एस्टेट में काम कर रहे थे। रोहित कहते हैं, 2016 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान MP के लोगों से बात करना चाहते थे। मैंने रात-दिन एक करके सोशल मीडिया की मदद से यहां रहने वाले परिवारों को खोजना शुरू किया। धीरे-धीरे अब हमारे MP चैप्टर में 10 हजार परिवार जुड़ चुके हैं। मेरी बहन अमेरिका में थी, हम दोनों भाई यहां थे। फिर हमारे कहने पर बहन भी UK में शिफ्ट हो गई। हम तीनों भाई बहन एक ही कॉलोनी में रहते हैं। रोहित कहते हैं कि जब आप बाहर होते हैं तो आपको सबसे ज्यादा जरूरत अपने परिवार की होती है।

राहुल कहते हैं- अब लंदन में MP के परिवारों की ऐसी बॉडिंग है कि कोई मुसीबत में हो तो सब साथ होते हैं। कोविड के दौरान यहां MP चैप्टर के लोगों ने PM फंड और CM रिलीफ फंड में मदद भेजी। MP के 17 जिलों के लिए 50 हजार खाने के पैकेट हमने वहां से आर्डर किए। मदद का ये सिलसिला अभी थमा नहीं है।

इंदौर में किचन खोलने जा रहे अक्षय पात्रा को डिलीवरी वैन डोनेट करने की तैयारी है। रोहित की मां उमा दीक्षित कहती हैं- 1986 में उनके पति का निधन हो गया। अनुकंपा नियुक्ति में उन्हें भारतीय खाद्य निगम में नौकरी मिली। बच्चों ने अपने पिता का नाम विदेश में भी रोशन किया है। तीनों बच्चे लंदन में सेट हो गए हैं, लेकिन भारतीय संस्कारों को नहीं भूले। यही सबसे बड़ा संतोष है।

झाबुआ के अमित 130 मिलियन डॉलर के मार्केट कैपिटल वाले फैनकॉइन के मालिक

ये कहानी है अमित सिंह राठौर की। अमित इंदौर के पास झाबुआ में पले-बढ़े। इनके पिता अशोक सिंह राठौर और मां अर्चना राठौर एडवोकेट हैं। दोनों अब भी झाबुआ में ही रहते हैं। अमित ने बिट्स पिलानी से पढ़ाई की। फिर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से। उनके नाम क्लाउड कम्यूटिंग के दो पेंटेंट हैं। अमित 2007 में UK पहुंचे। अब उन्होंने ब्रिटिश नागरिकता ले ली है। पहले उन्होंने 2011 से 2017 तक OTT प्लेटफॉर्म बनाया और ऑपरेशन किया। तब हाट स्टार और दूसरे प्लेटफॉर्म नहीं हुआ करते थे। इसमें सिर्फ भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का कंटेंट होता था।

उन्होंने कहा- इन देशों के टीवी चैनल्स को हम अपने प्लेटफॉर्म पर यूरोप ले गए थे। इस वक्त अमित दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले गेम फुटबॉल पर काम कर रहे हैं। वे फुटबॉल के दीवाने हैं। उन्होंने ऐसा मॉडल बनाया है कि उनके ऐप पर फुटबॉल का कंटेंट डालने वालों को फैन कॉइन रिवॉर्ड क्रेडिट होते हैं। अभी फैनकॉइन का मार्केट कैपिटल 130 मिलियन डॉलर होने का दावा करते हैं, हालांकि ये भी कहते हैं कि 13 मिलियन डॉलर एक्टिव ट्रांजेक्शन हैं। अमित कहते हैं- कॉइन मार्केट कैप वेबसाइट पर इसका वैल्यू देखा जा सकता है। फैन कॉइन से पेमेंट करने पर दुनिया के कई प्रोडक्ट्स पर अलग-अलग रियायतें भी मिलती हैं।

इंदौर के डॉ. संजीव अग्रवाल लंदन में अनूठा वर्चुअल अस्पताल चला रहे, 15 स्कूल भी

डॉ. संजीव अग्रवाल 32 साल पहले पढ़ाई के लिए लंदन गए थे। पढ़ाई के बाद कुछ साल अमेरिका और कनाडा में रहे। फिर 1997 में लंदन लौट आए। अब वहां के ख्यातनाम कंसल्टेंट हैं। मां के गर्भ में भ्रूण की सर्जरी करने वाले डॉक्टर्स में उनका भी नाम है। डॉ. अग्रवाल लंदन में कृष्ण भक्ति के ध्वजवाहक हैं। इस्कॉन के ट्रस्टी हैं और गीता पर वर्कशॉप लेते हैं। इसी ट्रस्ट के माध्यम से वहां 15 कृष्णा अवंति स्कूल चलाते हैं। इन स्कूलों में बच्चों को ब्रिटिश पाठ्यक्रम के साथ संस्कृत भी सिखाई जाती है। दो साल पहले 8 हजार डॉलर खर्च कर अनूठा वर्चुअल अस्पताल बनाया है। इसमें ऐलोपैथी के साथ, आयुर्वेद और होम्योपैथी के 175 एक्सपर्ट्स जुड़े हैं। ये दुनिया भर के लोगों को टेली मेडिसिन के माध्यम से बिना किसी फीस के सलाह देते हैं।

एक्सीडेंट में हाथ कट जाए या उंगलियां.. डॉ. अनिल त्रिपाठी को याद करते हैं ब्रिटिशर्स

डॉ. अनिल त्रिपाठी इंदौर के हैं। इंग्लैंड में 20 सालों से हैं। इससे पहले 10 साल आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया में भी रहे। वे कहते हैं- मेरी यात्रा 1992 से शुरू हुई। हैंड सर्जरी की ट्रेनिंग देने के लिए कई देशों में काम कर चुका हूं। 2001 में लंदन आ गया। इससे पहले इंदौर में असिस्टेंट प्रोफेसर भी रह चुका हूं। मैंने भारत को करीब से समझा। जब आप दूर जाते हैं तो आप भारत को ज्यादा बेहतर ढंग से जानते हैं।

डॉ. त्रिपाठी प्लास्टिक सर्जन हैं। इंदौर के किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज से ही पढ़ाई की। लंदन में हैंड सर्जरी के एक्सपर्ट हैं। यदि किसी एक्सीडेंट में किसी का हाथ कट जाए या उंगली कट जाए तो उसे जोड़ने में डॉ. त्रिपाठी ही सबको याद आते हैं। डॉ. त्रिपाठी कहते हैं- कई हादसों में हाथ या उंगली शरीर से अलग हो जाती है। उन्होंने एक टेंडेंस टेक्नीक विकसित की है, जिससे शरीर के इन अंगों को जोड़ने में मदद मिलती है। वे अब तक 10 हजार से ज्यादा हैंड सर्जरी कर चुके हैं और 15 हजार से ज्यादा प्लास्टिक सर्जरी कर चुके हैं।

डॉ. त्रिपाठी कहते हैं- प्रदेश में हेल्थ सेक्टर की स्थिति खराब है। इसके लिए हमारे पास अच्छा विजन है। हम ग्राउंड पर काम करना चाहते हैं, लेकिन डॉक्टर्स काफी कम संख्या में आए हैं। सबका जोर इन्वेस्टमेंट पर ही है। मेरा ऐसा ख्याल है कि हेल्थ सेक्टर पर भी बातचीत होनी चाहिए।

भास्कर से साभार

Exit mobile version