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*दाम्पत्यक्लेश : कारण और निवारण* 

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          ~ पुष्पा गुप्ता 

  संसार में धन है, बल है, घर है, बुद्धि है, धर्म-कर्म है, आय है, ठाट बाट पर व्यय हो रहा है, सन्तान है, स्त्री है। इतना सब होते हुए दाम्पत्यक्लेश है। जिसकी स्त्री लठैत हो गई, उस पुरुष को भाग्यशाली कहने में मुझे संकोच हो रहा है। स्त्री को लठैत (लड़ाकू) बनाने वाला पुरुष ही है। स्त्री और पुरुष में जब भी युद्ध होगा, उसमें स्त्री की जीत एवं पुरुष की हार निश्चित है।

      सूर्य पूर्व दिशा में उदित न होकर पश्चिम में उगे और पूर्व में अस्त हो, यह सम्भव है। परन्तु स्त्री-पुरुष के संग्राम में पुरुष जीते और स्त्री हारे, यह असंभव है। 

      स्त्री महिषासुर मर्दिनी देवी हैं। स्त्री रक्तबीज नाशिनी देवी है। वो शुम्भनिशुम्भ घातिनी देवी है। सभी देवता इस देवी की शरण में जाते हैं। वे देव अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर पाते और असुरों से लात खाते हैं तो यही देवी उन्हें बचाती है, असुरों को मारती है। दुर्दान्त राक्षस दैत्य दानव सबको हरा देते हैं पर, एक स्त्री / देवी से हार जाते हैं। जो पुरुष, स्त्री से बढ़कर अपने को समझता है अथवा जिस पुरुष में स्त्री के प्रतिहीन भाव होता है, वह अज्ञानी है और दुर्दशा को प्राप्त होता है। अबला नाम से ख्यात यह स्त्री सबला है। जो यह जानता है, वह ज्ञानी है।

       स्त्री कारण है। पुरुष कार्य है। स्त्री से पुरुष है, पुरुष से स्त्री नहीं क्योंकि पुरुष के गर्भ में स्त्री नहीं होती, स्त्री के गर्भ में पुरुष का जन्म होता है। स्त्री ही पुरुष को धारण करती है। स्त्री अपने स्तन से दूध पिला कर पुरुष का पालन करती है। अतः स्त्री बड़ी है और पुरुष उससे हीन है। कारण अपने कार्य से बड़ा होता है। कारण रूप स्त्री अपने कार्य पुरुष से बड़ी है। 

       स्त्री शब्द दीर्घान्त है, पुरुष हस्वान्त नर शब्द के दोनों वर्ण ह्रस्व हैं, नारी के दोनों वर्ण दीर्घ । ह्रस्व और दीर्घ के न्याय से स्त्रीवाचक शब्द बड़े हैं पुरुषवाचक शब्दों से उदाहरणार्थ- राम हस्व, सीता दीर्घ कृष्ण हस्व, राधा दीर्घ शिव हस्व, गौरी दीर्घ नारायण ह्रस्व, नारायणी दीर्घ अतः स्त्री के समक्ष पुरुष तुच्छ है। 

      पुरुष तत्व चेतन एवं अधिकारी है। यह यथावत बना रहता है। स्त्री तत्व जड़ है, बिकारी है। यह अपना विस्तार करती है। यह एक से अनेक होती है। सांख्य शास्त्र के २५ तत्वों में से १ तत्व पुरुष है तो २४ तत्व स्त्री के/से हैं। इसलिये स्त्री बड़ी हुई पुरुष से।

       प्राकृतिक कुण्डली में लग्न १ = पुरुष तथा सप्तम भाव = ७ स्त्री। इससे सिद्ध हुआ कि स्त्री तत्व ७ गुना अधिक भारी है पुरुष तत्व से। अतः स्त्री बड़ी है, पुरुष से।

      कुण्डली में प्रथम भाव ऊपर है, सप्तम भाव नीचे है। इसका अर्थ हुआ पुरुष ऊपर है स्त्री के। अर्थात् पुरुष का आसन स्त्री है या स्त्री को नीचे कर उसे अपना आधार बना कर पुरुष उस पर आश्रित / आरूढ़ है। यदि यह आधार खिसक/ हट जाय तो वह (पुरुष) गर्त में गिर पड़े। पुरुष को गर्त में गिरने से बचाने वाली भार्यारूप में स्त्री ही है। इसलिये स्त्री बड़ी है पुरुष से। 

      स्त्री के दो रूप हैं-जननी और जाया। पुरुष के दो रूप हैं-पति और पुत्र इन दोनों रूपों में स्त्री (जननी/जाया) पुरुष के भार को सुख पूर्वक वहन करती है। पुत्र रूप पुरुष, जननीरूप स्त्री के वक्षस्थल पर शिशु बन कर लेटता एवं स्तन पान करता है। पति रूप पुरुष, जाया रूप स्त्री के ऊपर सवार होकर मैथुन में प्रवृत होता है। स्त्री के द्वारा पुरुष को दिया गया यह सम्मान उसे बड़प्पन प्रदान करता है। जो है दूसरे को ऊंचा आसन/ सम्मान देता है, वह बड़ा है। यह सम्मान पाकर मूर्ख पुरुष अपने को स्त्री से बड़ा समझ बैठता है। यहाँ उसके पतन का हेतु है।

अब तक के विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री पुरुष से बड़ी है, भारी है। सप्तम स्त्री भाव नोचे है, प्रथम पुरुष भाव ऊपर है। जल में पत्थर भारी होने से नीचे चला जाता है तथा काष्ठ तृणादि हल्के होने से पानी में ऊपर रह जाते/ तैरते रहते हैं। पुरुष का ऊपर होना उसका हल्कापन है। स्त्री का नीचे होना उसका भारीपन है। जो नीचे/ अप्रकट है, वह गूढ़ तत्व स्त्री है जो ऊपर/प्रकट है, वह पुरुष तत्व निश्चय हो स्त्री से लघु है।

      जो स्त्री दाम्पत्य जीवन में पुरुष के लिये फूलों की शय्या होती है, वही आगे चल कर काँटों की सेज बन जाती है। जो पुरुष घर के भीतर स्त्री के साथ रतियुद्ध करता है, वही घर के बाहर उससे पिण्ड छुड़ाने के लिये तड़पता छटपटाता और घमासान मारामारी करता है। स्त्री से पुरुष न तो शय्या युद्ध में जीतता है। और न सामाजिक समर में। वो अपने प्राणों से खेलती है, पुरुष अपना प्राण बचाता है। स्त्री हार कर भी जीतती है, पुरुष जीत कर हारता है। पुरुष के अन्दर श्रेष्ठत्व का अहं उसे खा जाता है। स्त्री से वही पुरुष नहीं हारता जो पुनः स्त्री की कामना नहीं करता। जो अपने भीतर के स्त्री भाव को विकसित कर स्वयं स्त्री हो जाता है, वह स्त्री से कैसे हार सकता है?

 स्त्री = कोमल भावना ।

            पुरुष = कठोर भाव।

       जब तक स्त्री स्वयं में स्त्री रहती है वह देवी है। वही स्त्री जब पुरुषत्व के आवेश से युक्त होती है तो राक्षसी होती है। पुरुष जब स्त्रीत्व के भाव में होता है तो देवता होता है। ऐसे पुरुष को स्त्री नहीं हरा सकती। स्त्री का सामना पुरुष को स्त्री बन कर ही करना चाहिये। स्त्रीगुणों से युक्त पुरुष भक्त बनता है। भक्ति = समर्पण। कबीर कहते हैं-“हरि मेरो पीव मैं तो राम की बहुरिया।” परमात्मा के सामने स्त्री बनना ही भक्ति है। प्रपत्ति हो स्त्रीत्व है।

       जिस स्त्री में पुरुष के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव नहीं है तथा जिस पुरुष में स्त्री के आत्मसमर्पण को पाने की शक्ति नहीं है,  वहाँ कलियुग का ताण्डव अहर्निश होता है। ऐसे दाम्पत्य को धिक्कार है। स्वार्थ, अविश्वास, असहिष्णुता, दम्भ, पाखण्ड एवं नास्तिकता के कारण दाम्पत्य जीवन में नरक का प्रादुर्भाव होता है। इस नरक में पड़े धक्के खाते लोगों को भी मैं नमन करता हूँ और अपने स्व में रमण करता हूँ।

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