–सुसंस्कृति परिहार
पिछले 9 अक्टूवर को बसपा सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ के कांशीराम स्मारक स्थल मैदान में एक विशाल रैली का आयोजन सम्पन्न हुआ जिसमें सूत्रों के मुताबिक इसमें दस लाख के करीब लोग पहुंचे।यह रैली कांशीराम की पुण्यतिथि पर आयोजित थी।
ज्ञातव्य हो मायावती लगभग तेरह साल बाद राजनीति में सक्रिय रूप में दिखाई दीं। उनकी तमन्ना है कि एक बार फिर वे 2012 की तरह अकेले दम पर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनकर दलित कल्याण करना चाहती हैं। लेकिन उनके वनवास के बाद पुनर्स्थापना की यह कोशिश भीड़ देखकर उन्होंने लगाई है लेकिन वह भरोसेमंद नहीं है।

दरअसल जो लोग आए थे वे दलित नेत्री मायावती में उनके प्रति हुए भाजपा अत्याचार के विरुद्ध कोई सक्रिय मुहिम की उम्मीद लेकर आए थे। किंतु वे नाउम्मीद हुए। उन्होंने वर्तमान सरकार पर दलित अत्याचार के मर्म को तनिक भी नहीं छुआ।जिससे बड़ी आरजू लेकर आई भीड़ ख़फ़ा हो गई है। उन्होंने तीन घंटे तक रमाबाई अंबेडकर मैदान में जिन प्रतिनिधियों को मुलाकात का समय दिया था। उनमें बहुसंख्यक लोगों ने दलित शोषण उनके संहार की दुखद स्थितियों से अवगत कराया। जिसे उनने सुना ज़रुर है किंतु वे कुछ नहीं कर पाएंगी। क्योंकि भाजपा से वे अभी भी विरोध करने की स्थिति में नहीं है।लोग सब जानते हैं कि जिस दिन उन्होंने भाजपा शासन के ख़िलाफ़ कुछ भी किया वे तुरंत जेल में ठूंस दी जाएंगी उन पर कदाचरण और भ्रष्टाचार के आरोप वाली ईडी और आईटी की सम्बंधित फाइलें सुरक्षित हैं।वनवास के पीछे यही वजह रही है।उनकी गिरती ताकत का पता इस बात से चलता है कि वे सिर्फ अपने बेटे भतीजे के साथ पुराने साथी सतीश चन्द्र मिश्रा के साथ मंच पर दिखी।
हो सकता है उन्होंने सोचा हो अब भाजपा की विदाई की बेला जल्द आने वाली है इसलिए अपने पैर मजबूत कर लिए जाएं और कांशीराम की पुण्यतिथि के बहाने अपनी ताकत भाजपा और समाजवादी पार्टी को दिखा दी जाए। क्योंकि वे 2027 में अकेले अपनी दम पर पूरे प्रदेश में बसपा को खड़े करने की बात कर रहीं हैं इसलिए उनके भाषण में निशाने पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ही रही।
दूसरी ओर उन्होंने बुनियादी मुद्दे ना उठाकर सिर्फ अपने द्वारा निर्मित पार्कों के रखरखाव पर ही ध्यान केन्द्रित किया। समाजवादी पार्टी को पुरजोर तरीके से कोसा और यह गौरवान्वित होकर बताया कि भाजपा प्रदेश सरकार ने पार्क की व्यवस्था को सुधारने का आश्वासन दे दिया है।मतलब समझिए चार साल तक भाजपा ने कुछ नहीं किया फिर आश्वासन पर खुश हो गई मायावती। कासगंज का कांशीराम नाम समाजवादी पार्टी ने बदल दिया। इसके लिए भी भीड़ में कहीं गुस्सा नज़र नहीं आया। दलित सीजेआई के अपमान पर भी दो शब्द नहीं कह पाईं।
कुल जमा भीड़ का मूड बुरी तरह से योगी के खिलाफ है।वह इसे उखाड़ फेंक देने बेताब है और मायावती जो हैं ना उन्हें दलितों पर हो रहे अत्याचार दिखाई दे रहे ,ना मंहगाई, भ्रष्टाचार और ना उन पर चलते बुल्डोजर नज़र आए। इसलिए मायावती इस भीड़ को भंजाने में नाकाम रहीं।वे चुनाव लड़ती है तो उन्हें पिछले चुनाव में मिली एक सीट भी खोना पड़ सकती है। मायावती यदि यह सोच रही है कि भाजपा जाने के बाद उनका बर्चस्व कायम होगा तो वे यह जान लें कि आने वाले तूफान से वे नहीं टकरा पाएंगी।उनको कांशीराम के नाम पर जुटी भीड़ का सहारा अब नहीं बचा पाएगा।