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बीजेपी का पसमांदा मुसलमानों को स्नेह’ और ‘सम्मान’ देने के मायने

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तारिक मंसूर


स्थिरता सदैव हितकारी नहीं रहती, खासकर जब बात बराबरी की हो। कुछ ऐसी ही हलचल आजकल देश और विशेषकर उत्तर प्रदेश में दिख रही है। यह प्रतिक्रिया मुसलमानों के पसमांदा वर्ग से संबंधित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पसमांदा मुसलमानों को लेकर एक पहल की। फिर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पसमांदा मुसलमानों तक पहुंचने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित करने, उन्हें ‘स्नेह’ और ‘सम्मान’ देने के निर्देश दिए। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में बीते महीनों में कई कार्यक्रम आयोजित हुए जिन्हें बीजेपी के पदाधिकारियों और मंत्रियों द्वारा संबोधित किया गया। भारतीय जनता पार्टी की इस मुहिम ने मानो ठहरे हुए पानी में पत्थर उछाल दिया।

सवाल-दर-सवाल
निस्संदेह यह बीजेपी की एक गंभीर कोशिश है। इस घटनाक्रम पर हलचल होनी स्वाभाविक है। तमाम प्रश्न उठाए जा रहे हैं। आखिर बीजेपी की इस पहल का निहितार्थ क्या है? किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कुछ बातें स्पष्ट कर लेनी होंगी

अशराफ की पकड़
निस्संदेह जो पिछड़ा है उसे आगे आने, बढ़ने और स्वयं को स्थापित करने का पूरा अधिकार है। इस प्रयोजन में किसी भी धर्म या समुदाय को नहीं रखा जा सकता है। देश में हर वर्ग को इस लिहाज से अवसर मिलना ही चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि आमतौर पर इन अवसरों का अधिक लाभ मुसलमानों में अभिजात वर्ग (अशराफ) को मिला। पसमांदा मुसलमान पिछड़ता चला गया। अशराफ वर्ग संख्या में पसमांदा मुसलमानों से कम है, लेकिन उसने मुस्लिम राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखी। कुछ मुद्दे, जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ, बाबरी मस्जिद पर अधिक बल दिया, लेकिन रोजी-रोटी और शिक्षा को उतना महत्त्व नहीं दिया। जबकि ये चीजें समस्त पसमांदा मुसलमानों के लिए अधिक महत्वपूर्ण रही हैं।

प्रधानमंत्री की पहल
ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल एक बार सोचने को मजबूर कर देती है। इसमें आप राजनीति ढूंढ सकते हैं लेकिन कोई भी राजनीतिक दल चुनावी उद्देश्य का ध्यान रखता है। ऐसे में बीजेपी को पूरा दोष देना समझ से परे है। हाशिए पर खड़े पसमांदा मुसलमानों के लिए एक अवसर सार्वजनिक रूप से देना कोई कम बड़ी बात नहीं है। बीते कई दशकों में उन्हें क्या प्राप्त हुआ, यह भी सर्वविदित है। पसमांदा मुसलमानों के लिए दो बिंदु विशेष महत्व रखते हैं। पहला, राजनीतिक रूप से समुचित भागीदारी और दूसरा, भावनात्मक मुद्दों से अधिक रोजी-रोटी और शिक्षा जैसे मुद्दों का हल। पीएम मोदी ने दिसंबर 2020 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह के अपने संबोधन में मुसलमानों के सशक्तीकरण, महिला शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, उद्यमिता और रोजगार के महत्व पर जोर दिया था। इन मुद्दों पर उन्होंने वैचारिक मतभेद से ऊपर उठकर कार्य करने का आह्वान किया था। निस्संदेह इनमें से समस्त मुद्दे पसमांदा मुसलमानों से सीधे तौर पर जुड़े हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि देश विकास के मार्ग पर अग्रसर है और यहां धर्म के आधार पर किसी को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता है- धार्मिक विविधता को स्वीकार करने का एक उदहारण है।

घोषणा और हकीकत
किसी भी हितकारी राज्य में सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित की जाती हैं। इनका लाभ विभिन्न वर्गों को बिना धार्मिक भेदभाव के मिलता है। अगर एक निगाह डालें तो इन लाभार्थी योजनाओं में धार्मिक पहचान का कोई महत्व नहीं है, जैसे प्रधानमंत्री जन धन योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना आदि। पसमांदा मुसलमान इनसे लाभान्वित हुए हैं। इस बात को प्रसारित भी किया गया कि लाभार्थियों में पसमांदा मुसलमान पर्याप्त संख्या में हैं। जैसे शुरू में कहा कि स्थिरता सदैव हितकारी नहीं होती है, ऐसे में हाशिए पर खड़े पसमांदा मुसलमानों की तरफ पहली बार एक प्रमुख दल ने सद्भाव और विकास का हाथ बढ़ाया है। त्वरित प्रतिक्रिया देने से पहले एक बार फिर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान के जीवन से सीखने की जरूरत है जिसका संदेश है कि मुसलमानों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के अपने ध्येय पर अडिग रहना और विरोधात्मक प्रतिक्रियाओं से अपना कार्य प्रभावित न होने देना ही वास्तविक सफलता है।
(लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति हैं)

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