–सुसंस्कृति परिहार
31अक्टूबर 1984की काली सुबह जब देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके आवास पर उनके दो सुरक्षा गार्डों ने गोलियों से छलनी कर दिया था वह घटना याद रखनी चाहिए। क्योंकि इसकी वजह ना केवल स्वर्ण मंदिर में खालिस्तान बनाने की पृष्ठभूमि थी।बल्कि पहली बार धर्म स्थली का दुरुपयोग देश की अखंडता को तोड़ने किया जा रहा था। वजह वही धार्मिक नशा था कि इंदिरा जी ने इस पवित्र स्थली में सेना को प्रवेश करने की इज़ाजत क्यों दी थी?
यह बेशक आज उन तमाम धार्मिक नेताओं के लिए सबक है कि जब देश की अखंडता और एकता पर किसी नए राष्ट्र के निर्माण की कोशिश हो तो धर्मस्थल से ज्यादा महत्वपूर्ण देश हो सकता है। एक छोटी सी घटना ने उस वक्त नासूर का स्वरूप लिया और कथित तौर पर अमृत चख करके दो अंगरक्षकों ने यह कदम उठा लिया।

ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं ना हों इसलिए भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में इस बात पर गंभीरता से चिंतन होना चाहिए।धर्म का यह नशा जिसे कार्ल मार्क्स अफीम कहते हैं उससे बचने देश की अहमियत या यूं कहें लोगों को वतन और उसमें रहने वाले लोगों से मोहब्बत का पाठ पढ़ाया जाना बहुत ज़रूरी है। धार्मिक स्थलों से ज्यादा भारत भू के प्रति वफादारी होना चाहिए यह इस घटना से सीखने की ज़रुरत है।
यह भारत भू के प्रति वफ़ादारी इंदिरा जी को आज़ादी के दौरान अपने तमाम अग्रज स्वतंत्रता सेनानियों से मिली थी जिनमें गांधी, नेहरू, सरोजिनी नायडू और फ़ीरोज़ गांधी प्रमुख थे। इसलिए उन्होंने अपने प्रिय पंजाब को खालिस्तान बनाने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कदम उठाया था और इसकी खातिर अपनी जान भी कुर्बान कर दी।
लेकिन आज जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ छल करने वाले चीन द्वारा हमारी सीमावर्ती जगह पर कई एकड़ भूमि पर कब्जा कर लिया गया है तब भारत माता की जय-जयकार करने वाली सरकार पर शक होने लगता है। लद्दाख की धरती से उठी सोनम वांगचुक और भाजपा के पूर्व मंत्री सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की बात को तवज्जो नहीं दी जाती तो बेहद अफ़सोस होता है।अब तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस बात को कुबूल कर लिया है।ये कैसा भारत माता से प्यार है।
इतना ही नहीं,यही सरकार जब मंदिरों के ट्रस्ट में प्रवेश कर उनका कायापलट कर कारपोरेट के हवाले करके धार्मिक स्थलों को राजनीति का अखाड़ा बनाती है तो इंदिरा जी की शहादत याद आती है। इस सरकार की यह मंदिरों के प्रति आस्था और समर्पण समर्पण कतई नहीं है। वस्तुत: यह अप्रत्यक्ष तौर पर मंदिरों के ट्रस्ट पर अधिकार जमाने के तरीके हैं।उनकी लूट और कारपोरेट की भक्ति है।
इसीलिए वर्तमान सरकार देशभक्ति का राग अलापती रहती है उसके उलट संविधान की अवज्ञा चहुंओर नज़र आती है। तब एक सीधा साधा सा सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि मंदिरों से देश के राजस्व में वृद्धि होती है, रोज़गार के अवसर मिलते हैं तो सरकार को संविधान के तहत् यह भी कदम उठाना चाहिए कि वे सभी धर्मों,और उनके इबादत गाहों के लिए भी इसी तरह के कदम क्यों नहीं उठाते। हालांकि पूर्ववत ही यह कहा जा चुका है कि यह परम्परा धार्मिक ट्रस्टों के स्वावलंबन और संविधान के खिलाफ है। इसमें सरकारी हस्तक्षेप गुनाह की श्रेणी में आता है।
सरकार का खजाना खाली है इसलिए उसकी नज़र बड़े मंदिरों की संपत्ति और वक्फ़ बोर्ड पर है। भविष्य में यह सभी धर्मों के पावन स्थलों को भी इस कड़ी में जोड़ सकती है।
सरकार को इससे कई फ़ायदे हैं इसलिए निरंतर धार्मिक स्थलों पर नियंत्रण बढ़ता जा रहा है, कारोबारियों और लूट के एवज में वह बहुसंख्यक हिंदुओं के तुष्टिकरण का चुनाव में लाभ लेती है। राममंदिर निर्माण की पूरी कहानी इसी के इर्द-गिर्द लिखी गई।
लेकिन यह बहुसंख्यक समाज की आस्था और धार्मिकता पर गहरी चोट है जिसे अब लोग समझ गए हैं इसलिए पिछले चुनावों से चुनाव आयोग को साधा जाने लगा है।
बहरहाल, सबसे खूबसूरत बात ये है कि पंजाब की समस्या समाधान उनके बेटे प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा शांति और सद्भाव पूर्ण तरीके से सुलझा लिया है यह देश के अस्तित्व का एक बड़ा समझौता था।जिसे ऐतिहासिक कहा जा सकता है।
लेकिन देश के भाईचारे को बिगाड़ने पिछले बारह साल से मुस्लिम , ईसाई और आदिवासी समाज को टारगेट किया जा रहा है तथा धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद शब्द को संविधान से निकालने की बात की जा रही हो तब भी इंदिरा जी याद आती हैं उनके द्वारा देश के संविधान में संशोधन कर इन दो महत्वपूर्ण शब्दों को जोड़ना कितना अहम है यह अब याद आता है। क्योंकि देश की एका और भाईचारा कायम रखने में इन दो शब्दों का बड़ा महात्म्य है। इसे भाजपा और संघ भली-भांति समझ गए हैं इसलिए इसे हटाने की मुहिम चला रहे हैं।
देशवासियों को इन सब बातों पर विचार करने की ज़रूरत है हम कितने देश के निवासी हैं और आज देश किस ओर जा रहा है?
इंदिरा जी चार चाटुकारों की गिरफ्त में रहकर यदि वे आपातकाल नहीं लगाती तो उनकी गणना विश्व के प्रगतिशील प्रधानमंत्री के रुप में होती क्योंकि
वे कुशल राजनीतिज्ञ तो थीं हीं परम देशभक्त और दूरदर्शी भी थीं। आज शहादत दिवस पर उनका स्मरण बहुत ज़रुरी है।ताकि युवा पीढ़ी उनके इस महत्वपूर्ण अवदान से प्रेरणा ग्रहण कर सके। जिन्हें सिर्फ आज इमरजेंसी के लिए ही सरकार याद करती है।