पूर्व कथन :
हमारे अभिन्न मित्र डॉ. विकास मानव ने कहा : “प्राणप्रतिष्ठा पर आधारभूत जानकारी कुछ पाठक/पाठिकाओं की ओर से मांगी गयी है. दसरथ पूत्र राजा’श्री रामचंद्र जी की प्राण प्रतिष्ठा का यह दौर है. ईश्वर सर्वत्र सम्व्याप्त निराकार सत्ता है. सबके प्राणदाता- हर्ता में प्राण डालने की बात किसी के भी द्वारा करना हास्यास्पद है. मैं तो कुछ लिखूंगा नहीं, आप लिखिए.”
तो पढ़िए आप सभी मेरा यह सहज प्रतिसंवेदन :
*~ पवन कुमार ‘ज्योतिषाचार्य’*
प्रतिष्ठा श्रमण एवं ब्राह्मण परम्परा का एक अत्यंत प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण विधान है। यह एक सामूहिक अनुष्ठान है। संघ-समाज का हर एक व्यक्ति एवं हर तबका किसी न किसी रूप में इस विधान का अंश बनता है। सकल संघ को जोड़ने के लिए यह एक महत अभियान है।
प्रतिष्ठा एक ऐसा वैज्ञानिक विधिक्रम है कि जिसका प्रभाव व्यक्ति, समाज, संघ, गाँव, नगर, शहर और देश के ऊपर प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है।
प्रतिष्ठा पाषाण को पूज्य, कंकर को शंकर और जिन प्रतिमा को साक्षात जिन रूप में स्थापित करने की अद्भुत प्रक्रिया है, प्रतिष्ठाचार्य के सम्पूर्ण जीवन की साधना का निचोड़ है, श्रेष्ठ भावों की अभिवृद्धि का मंगल उपक्रम है तथा बहिरात्मा से अंतरात्मा में प्रवेश करने का श्रेष्ठ आलम्बन है।
यह संस्कार स्वानुभव की प्राप्ति एवं शुद्ध अवस्था की उपलब्धि के उद्देश्य से किया जाता है। इस अनुष्ठान का मुख्य प्रयोजन अनादिकाल से आवृत्त परमात्म स्वरूप को प्रकट करना है।
प्रतिष्ठा का शाब्दिक अर्थ प्रति उपसर्ग + स्था धातु आड्. टाप् प्रत्यय के संयोग से प्रतिष्ठा शब्द निष्पन्न है।
यहाँ ‘प्रति’ उपसर्ग विशेष के अर्थ में है तथा ‘स्था’ धातु ठहरना, रहना, स्थिरता, स्थिति, स्थैर्य आदि के प्रसंग में है। इसका सामान्य अर्थ होता है कि विशिष्ट रूप से स्थिर करना अथवा किसी वस्तु का अच्छी तरह से रहना प्रतिष्ठा है।
संस्कृत हिन्दी कोश के अनुसार किसी देव प्रतिमा की स्थापना करना प्रतिष्ठा है। प्रस्तुत सन्दर्भ में प्रतिष्ठा का यही अर्थ अभीष्ट है।’
प्राकृत कोश में सन्दर्भित अर्थ के सूचक दो शब्द हैं- पइट्ठव और पइट्ठा।
पइड्डा (प्रतिष्ठा) के निम्न अर्थ किये गये हैं- आदर, सम्मान, स्थापना, अवस्थान, स्थिति और मूर्ति में ईश्वर के गुणों का आरोपण। पइट्ठव (प्रति+स्थापय्) का भावार्थ मूर्ति आदि की विधिपूर्वक स्थापना करना है।
वस्तुतः ‘प्रतिष्ठा’ शब्द में पूर्वोक्त सभी अर्थ घटित होते हैं। स्थानांग टीका और पंचाशक टीका में प्रतिष्ठा शब्द अवस्थान यानी किसी वस्तु या देव प्रतिमा को अच्छी तरह से अवस्थित करने के अर्थ में है।
एक अर्थ के अनुसार ‘प्रतिष्ठापनं प्रतिष्ठा’- स्थापित करने योग्य पूजनीय देवों की स्थापना करना प्रतिष्ठा है।
प्रतिष्ठा शब्द की दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार ‘प्रतिष्ठान्त्यस्यामिति प्रतिष्ठा’ जिसमें ईश्वरीय गुणों का स्थैर्य किया जा रहा है वह प्रतिष्ठा है। सार रूप में कह सकते हैं कि पूज्य प्रतिमा में तदयोग्य शक्तियों का आरोपण करते हुए उनकी विधिपूर्वक स्थापना करना प्रतिष्ठा कहलाता है।
प्रतिष्ठा की सैद्धान्तिक परिभाषाएँ ।
सूत्रकृतांग टीका में प्रतिष्ठा का आत्मलक्षी अर्थ करते हुए कहा गया है कि “संसार भ्रमण विरतौ” – संसार परिभ्रमण से विरत (निवृत्त) करने वाली क्रिया का नाम प्रतिष्ठा है।
धवलाटीका में धारणा ज्ञान के नामान्तर के रूप में ‘प्रतिष्ठा’ शब्द का उल्लेख है। तदनुसार “प्रति तिष्ठन्ति विनाशेन विना अस्याअर्थो इति प्रतिष्ठा” जिसमें पदार्थ विनाश के बिना प्रतिष्ठित रहते हैं वह प्रतिष्ठा है। यह परिभाषा प्रतिमा स्थापना के सन्दर्भ में भी प्रयुक्त की जा सकती है चूंकि प्रतिमा में आरोपित गुण सदैव विद्यमान रहते हैं।
निर्वाणकलिका में प्रतिष्ठा का निम्न लक्षण दर्शित है :
तत्र स्थाप्यस्य जिन बिम्बादेर् भद्रपीठादौ विधिना न्यसनं प्रतिष्ठा।
स्थाप्य जिनबिम्ब आदि का योग्य आसन पर विधिवत स्थापन करना प्रतिष्ठा कहलाता है।
प्रतिष्ठा की किंचित विस्तृत परिभाषा यह है :
श्रुतेन सम्यग्ज्ञातस्य, व्यवहार प्रसिद्धये।
स्थाप्य कृतनाम्नोऽन्तः स्फुरतो न्यासगोचर।।
साकारे वा निराकारे, विधिना यो विधियते।
न्यासस्तदिदमित्युक्त्वा, प्रतिष्ठा स्थापना च सा।।
श्रुत के द्वारा समीचीन रूप से जाने गये स्थाप्य के विषय भूत ऋषभ आदि तीर्थंकर की साकार या निराकार पाषाण आदि में जो विधिपूर्वक स्थापना की जाती है उसका नाम प्रतिष्ठा है। इसे दूसरे शब्दों में स्थापना और न्यास भी कहा जाता है।
षोडशकप्रकरण में प्रतिष्ठा का भावात्मक स्वरूप विश्लेषित करते हुए कहा गया है :
भवति च खलु प्रतिष्ठा, निज भावस्यैव देवतोद्देशात्।
स्वात्मन्येव परं यत्स्थापनमिह वचननीत्योच्चैः।।
अर्थात देवता (परमात्मा) के उद्देश्य से आगमोक्त विधिपूर्वक आत्मा में आत्मभावों की अत्यंत श्रेष्ठ स्थापना करना प्रतिष्ठा है। दूसरे शब्दों में प्रतिष्ठा के प्रयोजक कर्ता के विशिष्ट परिणाम की प्रधान रूप से स्थापना करना प्रतिष्ठा है।
इष्टदेव के उद्देश्य से स्वयं की आत्मा में आत्मबुद्धि का स्थापन करने पर वीतरागता की प्राप्ति होती है। और यही भाव प्रतिष्ठा है। बाह्य प्रतिष्ठा उपचारपूर्वक होती है।
देवोद्देशेन मुख्येयमा ऽऽत्मन्येवात्मनो धियः।
स्थाप्ये समरसापत्ते, रूपचाराद् बहिः पुनः।।
इस परिभाषा का गूढ़ आशय यह है कि प्रकृष्ट रीति से स्थापना करना प्रतिष्ठा है।
पूर्वोक्त अर्थ के अनुसार वीतरागता, चिन्मयत्वता आदि गुणों का अवगाहन करने वाली बुद्धि की स्वयं में प्रकृष्ट रूप से स्थापना करना प्रतिष्ठा है। द्रव्यतः वीतरागता आदि गुणों का आरोपण मूर्ति में किया जाता है तथा भावतः जिनागम के अनुसार स्वयं में ही वीतरागत्व आदि भावों की स्थापना की जाती है।
प्रत्येक संसारी आत्मा कर्म से मलीन है। आत्मागत कर्ममल को विनष्ट करने का सामर्थ्य जिनवचन स्वरूप अग्नि की क्रिया में अर्थात जिनाज्ञा पालन में है। इस प्रकार अग्नि स्वरूप जिनवचन का अनुसरण करने से कर्मरूपी कचरा जल जाता है और आत्मा में वीतरागत्व रूपी सुवर्णत्व की प्राप्ति होती है। यही परम प्रतिष्ठा है।
अनुयोगद्वार की परिभाषा के अनुसार आगमतः भाव वीतराग अवस्था भी नोआगमतः भाव वीतराग अवस्था का कारण है ऐसा यहाँ कह सकते हैं। नोआगम से भाव वीतराग अवस्था की प्राप्ति परम प्रतिष्ठा है तथा उसके कारणभूत वीतराग उद्देश्यक स्वभाव का आत्मा में स्थापन करना आगमतः भाव वीतराग अवस्था कहलाती है।
संक्षेप में कहा जाए तो आत्मा में आत्म भाव की स्थापना करना ही मुख्य प्रतिष्ठा है तथा भाव में सहकारी आगम रूपी अग्नि की क्रिया से (आगमोक्त विधि पालन से) कर्म रूपी ईंधन के जलने पर सिद्ध भाव स्वरूप सुवर्णता प्रकट होती है इस कारण कर्तव्यपूर्वक बाह्य प्रतिष्ठा भी सफल होती है। (चेतना विकास मिशन).

