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*ORGASM : स्त्री-तृप्ति को लेकर छिड़ी बहस के मायने

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   _तकरीबन हर सोशल साइट्स पर हर तरफ लिखा जा रहा है पढ़ा जा रहा है की महिला समझौता कब तक करे. उसे अपने तन मन को तृप्त करने का हक़ है._

 ~ डॉ. नीलम ज्योति

लेकिन कितने दिन?
फिर कोई नया विषय आ जाएगा और फिर हर तरफ उसका हो-हल्ला होने लगेगा।
सबसे पहले तो यही बता दूँ कि इसे पढ़ने वाले बहुत से लोग ये भी कहेंगे कि इस पर लिखा ही क्यों? कुछ और नहीं मिला लिखने को …? जबकि मजेदार बात ये रहेगी. इसे सब पढ़ेंगे।
अब जब हर तरह के विषय और विचारों, इच्छाओं पर बातें होने लगी हैं तो ये भी क्यों नहीं : लेकिन उससे पहले कि आखिर चरम-सुख की परिभाषा है क्या।
जबकि कोई चीज जब अपने चरम पर पहुँच जाती है तब वहाँ से वह खत्म हो जाती है कोई इच्छा चाह सबसे मुक्त हो जाती है।
तलाश एक गलत वक्तव्य है जबकि सच तो ये है कि लगभग 70 बल्कि इस आंकड़े को और अधिक रूप में भी देखा जा सकता है कि भारतीय महिलाएँ सन्तुष्ट नहीं हैं।
ये अलग बात है कि वे इससे लोक-लाज से बचने के लिए इंकार भी करती हों या तो कुछ समझ ही नहीं पातीं कि वे उस सुख से वंचित हैं या ये कि यह भी एक सुख की चीज है।

ऑर्गेज्म, शारीरिक सुख, आनन्द और खुशी की उत्तेजना से भरी वह भावना है, सेक्स या संभोग करते हुए दोनों पार्टनर को मिलना चाहिए या मिलता है।
ऑर्गेज्म यौन उत्तेजना का चरम है। अधिकतर पुरुष स्त्री को उस चरम सुख से वंचित रखता है क्योंकि वह इस सुख को केवल स्वयं के लिए महसूस करता है जाने या अनजाने ही सही और स्त्रियाँ इस बारे में बोलना पाप समझती हैं या जानती ही नहीं।
अधिकतर स्त्रियाँ इसे केवल पति को सुख देने का कर्तव्य मान लेती हैं और अपनी उठती कामनाओं को चुपचाप दबा जाती हैं।
लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा है क्यों ? हम जिस सामाजिक संस्था में रहते हैं यहाँ हमारी नैतिक जिम्मेदारी हमारे जीवन के हर एक जगह दखल देते हैं या यह कह लीजिए कि हमारे जीवन की सामाजिक और मानसिक गतिविधियों पर नैतिकता के नियमों का शासन है।

लेकिन इसकी जरूरत से हम इंकार नहीं कर सकते क्योंकि यही नैतिकता हमें एक परिवार और सुगठित समाज प्रदान करता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता को सुचारू रूप से चलाता है।
लेकिन इन सबके बीच स्त्रियों की हर तरह की स्वतन्त्रता की डोर पुरुषों ने अपने हाथ में ले रखी है और वे इसका अपने मनमाफिक और सहूलियत से इस्तेमाल करते हैं।
स्त्रियों की सभी तरह की स्वतन्त्रता के बीच उनके शारीरिक सुख की चाह को सबसे अधिक दबाया गया यहाँ तक कि उस बारे में बोलना भी उनके चरित्र से जोड़ा गया।

जिसका असर आज हम परिवारों में समाज में एक विकृत रूप की तरह देख रहे हैं।
आखिर कितने पुरुष अपने सेक्स पार्टनर के साथ सहवास को एक आनन्द के रूप में लेते हुए अपने साथी को अपनी हर इच्छा जाहिर करने की सहजता और स्वतन्त्रता देते हैं … कितने पुरुष ?
सच यह है कि वे इसे सही मानते ही नहीं, वे स्वयं स्खलित होने तक ही स्त्रियों पर अपना आनन्द दिखाते-जताते हैं।
अधिकतर स्त्रियाँ पुरुष की मांग अनुसार सपोर्ट करती हैं, अपनी इच्छा और अधिक सुख पाने की चाह के अनुसार नहीं।
और अगर कभी स्त्री ने अपनी इच्छा जाहिर कर भी दिया तो पुरुष उसे सन्देह की दृष्टि से देखने लगता है, लेकिन क्यों देखता है पुरुष … क्यों? क्यों उसे एक सुख की प्राकृतिक प्रकृति पर सन्देह होने लगता है।
क्या इच्छाएँ स्त्री, पुरुष के लिए अलग अलग बनी हैं? क्या स्त्री-पुरुष की जीभ में स्वाद लेने या उसकी चाह अलग-अलग होती है, क्या स्त्री-पुरुष की ग्रन्थि एक ही चीज के लिए अलग-अलग होती है?
नहीं बिल्कुल भी नहीं। हाँ, स्त्रियाँ ऑर्गेज्म की तलाश नहीं करती लेकिन चाह रखती हैं और उसे दबा जाती हैं. क्योंकि ऐसी स्त्रियों को समाज ने चरित्रहीन माना है, समाज ने अनैतिक माना है।
जबकि पुरुष भी इससे बच नहीं पाए, उन्हें भी लम्पट और चरित्रहीन माना गया है। लेकिन पुरुष की प्रकृति इस मामले में बेपरवाह है।
तभी तो पुरुष एक ही बार में कई औरतों से खुल्लम-खुल्ला सम्बन्ध बनाकर भी लज्जित नहीं होता और तो और …. उसे अपने पौरुष पर गर्व होता है। अक्सर तो वे इसके चर्चे भी बड़े मजे ले लेकर करते हैं।
लेकिन सवाल अब भी वहीं है। क्या करें स्त्रियाँ, कहाँ जाएँ, किसके पास जाएँ और क्या गारंटी है कि कोई दूसरा उसे ऑर्गेज्म दे सकेगा। इस तरह तो एक के बाद एक यही सिलसिला चलता रहेगा और अन्त में एक मानसिक रोगी की तरह हो जाएगा।
सांसारिक व्यस्तता और जरूरतों और हर पल भागम-भाग की ज़िन्दगी के बीच में ऑर्गेज्म एक दवा भी है और जहर भी । और यही कारण है लेट नाइट पार्टीज में शराब, शबाब और …!

छोटी-छोटी बच्चियाँ भी इसकी गिरफ्त में आती जा रही हैं। लड़कों में शीघ्र पतन जैसी समस्या आम हो चली है। शादी के बाद बच्चे न होने का भी ये एक बड़ा कारण है।
शादियाँ जल्द-जल्द टूटने की कगार पर खड़ी हो जाती हैं। पार्टनर अपनी असन्तुष्टि का समाधान आपस में खोजने की बजाय गलत हाथों में चले जाते हैं, जिसका अधिक नुक्सान स्त्रियों को ही उठाना होता है।और बलात्कार जैसा घृणित कर्म भी कहीं हद तक इसी का नतीजा है।
जहाँ यह कई तनावों से मुक्त कर मनुष्य को रीफ्रैश करता है, वहीं इसके पूरे न होने पर इसका सीधा नकारात्मक प्रभाव हर काम पर पड़ता है और स्त्रियाँ जानती हैं यह सुख इतना आसान नहीं।
इसलिए वे अपना ध्यान दूसरी चीजों में लगाती हैं जिसमें अध्यात्म सबसे अधिक है। और कुछ इस सुख को पाने के लिए एक क्षणिक मुलाकात पर भी आसानी से सहवास कर लेती हैं लेकिन यह सुख नहीं, क्षणिक आनन्द होता है, कुछ समय का रिलेक्सेशन होता है और दोबारा इसकी प्यास और चाह अधिक तीव्रता के साथ उठती है और यही कारण है कि स्त्रियाँ किसी के भी सम्पर्क में थोड़ा प्यार, अपनापन पाकर आसानी से सब-कुछ सौंप देती हैं जिसका परिणाम अक्सर उन स्त्रियों को चरित्रहीन के नाम के साथ मिलता है।
ये एक ऐसा ड्रग्स है जो इस खोज में एक बार निकल गया … वो वापसी नहीं कर पाता और समाज उसे हमेशा ग़लत नजरों से ही देखता है।

सबसे जरूरी है पुरुष-साथी इस बात को समझे और अपनी पार्टनर को वह सहजता प्रदान करे जिससे वे खुल सकें।
एक बूढ़ी महिला से पूछने पर जिसके दस बच्चे हैं … उन्होंने बताया — हमें तो कभी समझ भी नहीं आया कई बार कि कब हुआ … हम आधी नींद में होते थे और हमारा आदमी आता … करता … और चला जाता और ऐसे ही बच्चे कब पेट में आ जाते, पता ही नहीं चलता। कभी होश में भी रहते तो घूंघट रहता चेहरे पर।
क्या बोलें …. ऐसी ही कितनी महिलाएँ ढेर बच्चे पैदा करके भी इस सुख का आनंद तक नहीं ले सकीं तो इसका जिम्मेदार कौन है ?
स्त्रियाँ केवल पुरुष को स्खलित करने की एक टूल या पात्र नहीं हैं, वे जीती-जागती आपकी तरह ही एक इंसान हैं, उनकी भी कामनाएँ आपकी कामनाओं की तरह तृप्त होने के लिए तीव्र होती हैं।
उन्हें समझिए और उन्हें उस सुख की अनुमति लेने के लिए उन्मुक्त कीजिए। यही वो चरम सुख बन जाएगा जिसके लिए कभी शरीर भटकता है, कभी मन भटकता है भीतर ही भीतर मन में कहीं।

हाँ, सब सुख का अपना अलग-अलग आनन्द होता है। रोटी की भूख जैसे शरीर नहीं मिटा सकता, वैसे ही शरीर की भूख रोटी नहीं मिटा सकती। ऐसे उदाहरण एकदम बकवास हैं।
क्योंकि गरीब से गरीब रोटी के लिए कड़कती धूप, बारिश, ठंड में काँपने वाले लोग भी सहवास के आनन्द की सुखद अनुभूति का अनुभव करते हैं।
इसलिए चाहे स्त्री हो या पुरुष … दोनों के लिए इधर-उधर भटकने से अच्छा है वे एक दूसरे की कामनाओं की जरूरत को समझे और कोई समस्या है तो काउन्सलर से मिलें। या अपने किसी ऐसे मित्र से जो इसके बारे में सही सलाह दे सकें।

ऑर्गेज्म एक तलाश को एक सुख में तब्दील कीजिए। स्त्रियों को चरित्रहीन कहने से पहले अपनी पौरुषहीनता पर गौर कीजिए, मालिक नहीं मनचाहा साथी बनिए।
आनन्द लेना नहीं, देना भी सीखिए। ध्यान रहे स्त्री की योनि में आप पेशाब करने नहीं गये हैं।अपनी कामनाओं को स्रावित करने गये हैं इसलिए स्त्रियों को भी स्रावित होने तक का सबर रखिए, उन्हें स्पर्श प्रेम से करें, मन से करें, वासना से नहीं।
इसके आगे भी जीवन में सुख है, यही सुख सब सुख का अंत नहीं
अपनी कामनाओं को संयमित करना भी सीखिए। क्योंकि भूख चाहे कितनी भी हो इंसान का मांस तो नहीं खाना चाहिए न।

जीवन और मन और शारीरिक सुख की चाह से जुड़ी हर इच्छा हर कामना को पूरा करने का स्त्रियों का भी उतना ही अधिकार है जितना पुरुष का।
स्त्री जानती है हर चाह को बांधना!
पुरुष भी तो समझे उसकी चाहना!!

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