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*क्षुद्रता शत्रु है बड़प्पन की*

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        राजेंद्र शुक्ला, मुंबई

       कौन कितना क्षुद्र है, इसकी नापतौल का मापदण्ड यह है कि कौन कितना अहंकारी है? आधा भरा घड़ा बहुत छलकता है। थोथा चना बहुत बजता है। जो अपूर्णता और अधूरेपन से लदा है, उसी को यह प्रतीत होता है, कि वह सबसे बड़ा है।

       अर्द्ध शिक्षित ही अपने को उद्भट विद्वान होने की शेखी बघारते देखे जाते हैं। यह संसार अति विस्तृत और अथाह है। यहाँ एक से एक समर्थ और सुयोग्य हो चुके हैं तथा विद्यमान है। यदि उन सब से ऊंँची अपनी स्थिति हो, तो भी घमण्ड करने जैसी कुछ बात हो सकती है, पर देवदार के जङ्गल में सरकण्डा का इतराना कुछ समीचीन नहीं लगता है। कोई कितना बड़ा है, इसका अहंकार तभी बन सकता है, जब वह छोटों के साथ अपनी तुलना करें।

       प्रगति का द्वार उसी के लिए खुला है, जो अपनी कमियों को जानता है और उन्हें पूरा करने के लिए नम्रतापूर्वक प्रयत्न करता है। किसी से पूछने या सीखने समझने के लिए नम्रता आवश्यक है। इसके बिना न पूछते बनेगा और न समझते। दोनों ही परिस्थितियों में अहं का चोट पहुंँचती है।

       यदि अपना बड़प्पन ही सिद्ध करना हो, तो यह कार्य नम्रता अपनाकर और भी अच्छी तरह पूरा किया जा सकता है। फूलों से लदी हुई टहनियाँ झुक जाती है, जबकि मात्र लम्बी पत्तों वाली खजूर ऐंठती अकड़ती सर ऊंँचा उठाया रहती है। जबकि राहगीर उसकी छांँव में सर तक नहीं छिपा पाते। दूर से ऊंँचा दिखने वाला ताड़ अंगूर की उस पतली बेल जितना भी सम्मान अर्जित नहीं कर सकता, जो जमीन में फैली या झाड़ियों पर छाई रहती है,  किन्तु अपने मीठे फलों से सभी को प्रसन्नता प्रदान करती है।

       बड़प्पन उस दिखाने वाले के पास ठहरता नहीं। अहंकार और सम्मान का एक साथ रहना नहीं हो सकता। दूसरों को नीचा समझने वाला ही अहंकारी हो सकता है। यदि दूसरों को भी मान देने की आवश्यकता प्रतीत हो, तो अपने को विनम्र बनाना पड़ेगा। नम्रता और अहंकार की दिशा एक दूसरे से विपरीत जाती है। अहंकारी उपहास और तिरस्कार के भाजन बनते हैं।

       आतंक जमाने के लिए अपनाई गई अहंता परिणाम के ठीक उल्टी पड़ती है। उसमें सुनने वालों का तिरस्कार जो होता है। यही है किसी के मर्म पर चोट पहुंँचाने वाली प्रक्रिया, जिसके कारण बड़प्पन जताने के लिए ओढ़ा गया आडम्बर अपने को ही भारी पड़ता है।

       अहंकारी अपने प्रयोग में सदा असफल ही रहता है। दूसरों की आंँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने वाला, आतंक दिखाकर अपनी गरिमा सिद्ध करने वाले जिस प्रकार कहते और करते हैं, उस शैली में क्षुद्रता की दुर्गंध आती है। फलत: आकर्षित करने का उद्देश्य सपना ही रह जाता है। धन वैभव चातुर्य से नहीं मिलता। 

      सम्मान पाने का सीधा एक ही तरीका है कि दूसरों को मान दें और बदले में मान पायें। इसके लिए सज्जनता चाहिए। नम्रता, विनयशीलता ही वह दे सकती है, जिससे लोग अहमन्यता के सहारे प्राप्त करने का सफल प्रयत्न करते हैं।

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