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मेडिकल सप्लीमेंट से नहीं मिलेगी डिप्रेशन से मुक्ति

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 डॉ. विकास मानव

      _प्रकृति में तीन का आंकड़ा व्याप्त है। ब्रम्हा विष्णु और महेश। ठंड, गर्मी और बरसात। ठोस, द्रव्य और गेस यानी बर्फ, पानी और भाप। ठंड, गर्मी और बरसात, यदि इन तीनों का अनुपात बिगड़ता है तो मुसीबतें खड़ी होती हैं। प्रकृति में जब भी इन तीनों का अनुपात बिगड़ता है तो वह कुपित होने लगती है। परिणाम में बाढ़, भूकंप और महामारी हमारे सामने आ खड़े होते हैं।_

      इसी भांति आयुर्विज्ञान वात, पित्त और कफ की बात कहता है। वह कहता है कि वात, पित्त और कफ यह तीनों हमारे शरीर की तासीरें हैं। यदि इन तीनों का अनुपात बिगड़ता है तो हमारा शरीर कुपित होने लगता है। परिणाम में मानसिक अवसाद और गंभीर बिमारियां हाथ लगती है। 

      प्रकृति का कुपित होना तो हमारी समझ में आता है कि इसमें सारी दुनिया का हाथ है लेकिन हमारे शरीर की तासीर वात, पित्त और कफ के अनुपात के बिगड़ने में, हमारे शरीर के कुपित होने में, बीमार होने में हमारा ही हाथ है।

      वात, पित्त और कफ, हमारे शरीर की इन तीनों तासीरों का अनुपात बिगड़ता है हमारे भोजन, श्रम और नींद के अनुपात के बिगड़ने के कारण। और यह बात हमारी समझ में नहीं आती है। 

हम भोजन जरूरत से ज्यादा कर रहे हैं। और काम मशीनें कर रही है। इसी कारण हम नींद से वंचीत हो रहे हैं। और हमारे शरीर की तासीर बिगड़ रही है जिससे हमारा शरीर कुपित हो रहा है और हम बीमार हो रहे हैं। 

      पहले आता है भोजन, भोजन हमारा सम्यक नहीं है। सम्यक का मतलब न कम और न ही ज्यादा। शरीर की जरूरत के अनुसार नहीं है। भोजन हम इतना कर लेते हैं कि जितने की हमारे शरीर को जरुरत ही नहीं थी। शरीर अपनी जरूरत है उतना भोजन ले लेगा, जितनी उर्जा की उसको जरूरत है उतना ले लेगा बाकी का क्या होगा?

     बाकी का जो भोजन है वह मांस बढ़ाएगा, चर्बी बढ़ाएगा, शरीर को मोटा बनाएगा और शरीर का मोटा होना बिमारियों को खुला निमंत्रण देना है। 

यह हमने गलत भोजन करके शरीर की तासीर को कुपित होने की अवस्था में डाल दिया है। अब जैसे बाहर प्रकृति में आंधी तूफ़ान चलते हैं वैसे ही हमारे शरीर में भी बिमारियों के आंधी-तूफान चलने लगेंगे। 

दूसरा है श्रम। हमने श्रम करना छोड़ ही दिया है। पसीना बहाना बंद ही कर दिया है। हम यदि श्रम नहीं करेंगे तो हमने भोजन द्वारा शरीर में जो ऊर्जा डाली है उसका क्या होगा? हम जितनी उर्जा शरीर में डालते हैं। उससे आधी भी खर्च नहीं कर पाते हैं।

      अतिरिक्त बची हुई उर्जा तनाव पैदा करती है और नींद में बाधा डालती है और नींद लाने के लिए हमें फिर शामक दवाइयां लेनी पड़ती है। एक ओर तो हम शरीर की ऊर्जा को श्रम में खर्च नहीं कर रहे हैं और वहीं दूसरी ओर वही उर्जा नींद नहीं आने का कारण बनती है तो नींद की दवाई ले रहे हैं? 

     जब हम श्रम नहीं करेंगे तो अतिरिक्त उर्जा हमारी नींद में बाधा उत्पन्न करेगी। यदि हम दिन में काम करते हैं, अपने शरीर में भोजन द्वारा डाली गई उर्जा को खर्च करते हैं। तो शरीर को अतिरिक्त उर्जा की जरूरत पड़ेगी और फिर से उर्जा को पाने के लिए वह नींद में जाएगा? 

सम्यक भोजन नहीं होने के कारण हमारे शरीर में अनावश्यक तत्व इकठ्ठा हो जाते हैं। और श्रम नहीं करने के कारण यह अनावश्यक तत्व पसीने द्वारा शरीर से बाहर नहीं निकल पाते हैं और शरीर में ही घुमते हुए विभिन्न बिमारियों को जन्म देते हैं। इनके बाहर निकलने का एक ही रास्ता है चमड़ी का रास्ता, पसीना बहाने का रास्ता।

      हम जो भोजन लेते हैं उसमें से सार तत्व तो हमारा शरीर ग्रहण कर लेता है और असार तत्व को अपने से बाहर फेंकने लगता है। शरीर मुंह के रास्ते भोजन ग्रहण करता है और अलग-अगल रास्तों से भोजन के अवशेषों को बाहर फेंकता है।

       हमारा शरीर भोजनवशेष को मल द्वार से मल द्वारा, मूत्र-मार्ग से मूत्र द्वारा, चर्म छिद्रों से पसीने द्वारा, आंखों से आंसूओं के द्वारा और नाक से कफ के द्वारा असार-असार तत्वों को बाहर निकालता है। 

हम अपने शरीर को इतना नियंत्रण में रखते हैं कि यह सिर्फ  मल-मूत्र वाले दो रास्तों को ही खुला रखता हैं। बाकी के रास्तों का हम इसे उपयोग ही नहीं करने देते हैं।

       चमड़ी में पसीना भरा हुआ है जिसे चल-फिर कर, दौडकर हमारा शरीर निकलना चाहता है लेकिन हमारा मन आलसी है, कहता है कल देखेंगे। और हम इसकी बात मानकर फिर सो जाते हैं। हम अपने इस मन के प्रति जरा भी होश में नहीं है। शरीर भाव से भर गया है रोना चाहता है, सिर के भीतर आंसुओं के रूप में कचरा भरा हुआ है, उस कचरे से तनाव पैदा हो रहा है वह कचरा सिर से खून में मिल रहा है।

     शरीर मष्तिष्क में प्रवेश कर रहे इस कचरे को बाहर फेंकना चाहता है, भावुक पलों में वह उन आंसुओं के कचरे को आंखों के रस्ते बाहर निकलना चाहता है लेकिन हमारा मन कहता है कि “समझदार आदमी होकर रोते हो? लोग क्या कहेंगे?” हमने अपना रोना रोक लिया। लोगों के भय से हमने अपने स्वास्थ्य को खूंटी पर टांग दिया है। 

जो आंसू  बाहर जाकर शरीर को स्वस्थ करते उन्ही आंसूओं को हमने पुनः संजोकर रख लिया है। अब यह आंसू तनाव पैदा करेंगे, हिस्टीरिया पैदा करेंगे, डिप्रेशन पैदा करेंगे। 

      अनावश्यक तत्वों को शरीर में रोककर हम अपने शरीर को बिमारियों के घर में तब्दील कर रहे हैं। सदा से हमने अपने मन की ही सुनी है अपने शरीर की कभी नहीं सुनी है।

      अच्छा संगीत बजा, हमारे पैरों में थिरकन उठी, पैर नाचने के लिए थिरकने लगे और हमने शरीर को नाचने से रोक लिया कि “लोग क्या कहेंगे?”  शरीर को नाचने में आनंद मिलता है। श्वास नाभी तक चलती है तो उर्जा को प्राण तत्व मिलते हैं जिससे वह सक्रिय होती है।

     शरीर के सारे अंग गति करते हैं तो खून सारे शरीर में दौड़ता है जिससे पूरे शरीर में प्राण तत्व का विस्तार होता है और नाभी पर पड़ी चोंट से उठी उर्जा को प्राण का ईंधन मिलते ही वह पूरे शरीर में फैलने लगती है। 

ये “लोग” कौन हैं? जो हमारे हंसने, रोने और नाचने में बाधा बने हुए हैं? 

और मजे की बात यह है कि वे लोग भी ऐसा ही सोच रहे हैं जैसे हम सोच रहे हैं। कि “लोग क्या कहेंगे?” 

      हमें लोगों की चिंता नहीं करनी है? लोग कौन होते हैं हमारे विषय में निर्णय लेने वाले? और हम उन लोगों को ढूंढने जाएंगे तो वह मिलेंगे भी नहीं!और वैसे भी लोगों की राय हमारे विषय में अच्छी नहीं है! तो हम क्यों लोगों की परवाह करें? हमारे हंसने, रोने, नाचने से किसका नुकसान हो जाएगा? 

       हम भीतर से नाचने के लिए किसी उत्सव का इंतजार क्यों करें। अपना कमरा बंद कर कानों में हेंड फ्री लगाकर अपने मनपसंद गीत पर अकेले नाचेंगे। घरवालों को भी कोई बाधा नहीं होगी?

     रोने के लिए हम अपनी बेटी के विदा होने वाले अवसर का इंतजार क्यों करें? अपने रोने के लिए मां के कंधों का इंतजार क्यों करे कि मां मिलेगी तो उसके कंधे पर सिर रख कर रो लेंगे? नहीं… ! अपने कमरे में गिर जाएं धरती मां पर जो सदेव हमारे साथ ही हैं।

     गिर जाएं अपने भगवान के चरणों में, अपने ईष्ट देव के चरणों में, कि तुम यह क्या क्या दिखला रहे हो? तुम यह मेरे साथ क्या कर कर रहे हो? तुम्हारे होते क्यों मुझे इतनी मुसीबत है? शिकायत करें अपने प्रेमी से अपने भगवान से! उठने दें भावों को, रोने दें अपने शरीर को हिचकोले ले लेकर। निकल जाने दें सारा गुबार।

      निकल जाने दें सारे आंसुओं को बाहर जो तनाव पैदा कर रहे हैं डिप्रेशन पैदा कर रहे हैं। मीरा ने तो रो रो कर भगवान को पा लिया था। रोने पर भगवान खुद चले आए थे? हम भी रोकेंगे तो क्या वे हमारी चिंता दूर करने नहीं आएंगे? हमें निरोग और स्वस्थ करने नहीं आएंगे? 

भोजन, श्रम और नींद यह तीन हमारे स्वास्थ्य के लिए ब्रम्हा विष्णु और महेश हैं। इन तीनों में यदि सम्यकत्व होगा तो ही स्वास्थ्य के मंदिर में हमारा प्रवेश होगा। भोजन, न तो कम और न ही ज्यादा। जितना शरीर की जरूरत है उतना।

     भोजन ज्यादा इसलिए हो जाता है कि भोजन करते समय हम विचारों में उलझे रहते हैं या भोजन के साथ ही बातचीत भी करते रहते हैं। विचार और बातचीत में भोजन के स्वाद का पता नहीं चलता है और जब स्वाद का पता चलता है तब तक पेट भर चुका होता है। अतः स्वाद लेने के लिए हम और ज्यादा भोजन कर लेते है। 

      ज्यादा भोजन न हो इसके लिए भोजन के समय कोई बातचीत नहीं करनी है और काम धंधे का कोई सोच-विचार भी नहीं करना है। भोजन को स्वाद ले लेकर करना है। जितना ज्यादा स्वाद लेंगे उतना ज्यादा चबाना पड़ेगा।

     जितना ज्यादा चबाएंगे पेट पर उतना बोझ नहीं पड़ेगा और हमारे दांत मजबूत रहेंगे। क्योंकि जो अंग जितना काम करता है उतना मजबूत होता है। और पूरा स्वाद ले लेंगे तो हम ज्यादा भोजन नहीं कर पाएंगे। 

भोजन एक बार में इकठ्ठा नहीं लेना है। क्योंकि जब भी हमें भूख लगती है तो हमारा पेट भोजन को पचाने के लिए अम्ल (एसीड) छोड़ता है। हमारे पेट के अम्ल छोड़ने की एक क्षमता है, एक सीमा है कि वह एक समय में कितना अम्ल छोड़ेगा और उससे कितना भोजन पचेगा! यदि हमारे पेट ने एक बार में तीन से चार रोटी पचाने जितना ही अम्ल छोड़ा है और हमने पांच से छ:रोटी खा ली है।

      तो अतिरिक्त रोटी जो नहीं पचेगी वह सड़ेगी और पेट में दर्द, गैस, जलन, बदहजमी और कब्ज जैसी बिमारियों को जन्म देगी। अतः हमें थोड़ा-थोड़ा भोजन लेना है और एक बार की अपेक्षा दो से तीन बार में लेना है ताकी भोजन ठीक तरह से पच जाए और हमारे पेट पर अतिरिक्त बोझ न हो और हम पेट की बिमारियों से बचे रहें! 

      सुबह सूर्योदय से पहले उठकर टहलना है, चलना है, दौड़ना है ताकि पसीना निकले और बीमारी पैदा करने वाले सारे तत्व पसीने द्वारा शरीर से बाहर चलें जाएं।

       जितना हम चलेंगे, दौड़ेंगे उतनी हमारी श्वास गहरी चलेगी। श्वास गहरी चलेगी तो शरीर में आक्सीजन की मात्रा बढ़ेगी। शरीर में आक्सीजन बढे़गी तो वह हमारी बिमारियों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाएगी। यदि कुम्हार हंडा घड़ता है तो एक हाथ से बाहर से चोट करता है और एक हाथ से भीतर हंडे को संभालता है।

 आक्सीजन हमारे शरीर को भीतर से संभालने का काम करती है। तभी तो अस्पताल में भर्ती होने पर नाक में आक्सीजन की नली लगाते हैं। ताकि वह हमारे शरीर को भीतर से संभाल ले और बाहर से डाक्टर दवाई और इंजेक्शन  से संभलते रहें। 

      तनाव से बाहर आने के लिए, डिप्रेशन से बाहर आने के लिए शरीर से अनावश्यक तत्वों का बाहर निकलना बहुत जरुरी है। और तनावों को विचारों को शिथिल करने के लिए शरीर में, खून में आक्सीजन का होना बहुत जरूरी है।

      श्रम करने से, व्यायाम करने से, प्रणायाम करने से, नाचने से, शाम को एक घंटा बच्चों के साथ खेलने से हमारे भीतर से पसीने द्वारा अनावश्यक तत्व बाहर चले जाते हैं और गहरी श्वास चलने से आक्सीजन की मात्रा हमारे भीतर बढ़ने लगती है। जो बिमारियों से लड़ने में हमारी मदद करती है।

      जितने भी लोग केंसर से लड़कर आए हैं उनके मूल में एक ही बात थी, गहरी श्वास लेकर शरीर को ज्यादा आक्सीजन देना। और इसमें व्यायाम, प्राणायाम और ध्यान ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

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