(डॉ. विकास मानवश्री से हुए साक्षात्कार पर आधारित)
*~ रीता चौधरी*
भोग योग है और रोग भी. भोग से भागे तो मानसिक रोगी बनोगे. भोग को ढंग से साधे तो योगी बनोगे. सारी हदें पार करके भोगोगे तो जागोगे और भगवत्ता को उपलब्ध हो जाओगे. सम्भोग सत्य का द्वार है : ऋषि-महर्षि-ब्रह्मऋषि ही नहीं, भगवान तक संभोग को इसीलिए साधे. भोग से जन्मे हो, भोग से जीवन है. जो लोग जीवन से भागते हैं, वे नार्किक परिवेश को बदलने में असमर्थ हो जाते हैं।
वे लोग भी नार्किक परिवेश को बदलने में असमर्थ हो जाते हैं जो जीवन को सिर्फ पशुवत भोगते हैं. जो एक से अधिक को भोगते रहते हैं, सिर्फ भोगने के लिए. यूँ भोगने वाले भोग में भटक जाते है. ऐसे कचरा लोग वास्तविक रूप से भोगने और जीवन को जानने : दोनों से वंचित रह जाते हैं।
*चेतना, एनर्जी और सेक्स :*
चेतना/कांशसनेस ही सत्य है. समस्त जीवन एक ऊर्जा है. सैक्स मनुष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऊर्जा का नाम है। यह सभी ऊर्जाओं का मूल है.
यदि सैक्स सफल हो जाये तो परिग्रह बन जाता है। यदि सैक्स स्वयं की हीनता से विफल हो जाये तो चोरी/पापकर्म बन जाता है। यदि सैक्स दूसरे के कारण से विफल हो जाये तो हिंसा बन जाता है।
मनुष्य एक ऊर्जा है, एक एनर्जी है। इस जगत में ऊर्जा, एनर्जी के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। समस्त जीवन एक ऊर्जा है। वे दिन लद गये कि जब कुछ लोग कहते थे, पदार्थ है। वे दिन समाप्त हो गये। नीत्से ने इस सदी के प्रारंभ होते समय में कहा था कि “ईश्वर मर गया है।’ लेकिन यह सदी अभी पूरी नहीं हो पाई, ईश्वर तो नहीं मरा, पदार्थ मर गया है। मैटर इज डेड। “मर गया है’ कहना भी ठीक नहीं है।
पदार्थ कभी था ही नहीं। वह हमारा भ्रम था, दिखाई पड़ता था। वैज्ञानिक कहते हैं कि पदार्थ सिर्फ सघन हो गई ऊर्जा है, कंडेंस्ड एनर्जी। पदार्थ जैसी कोई चीज ही जगत में नहीं है। वह जो पत्थर है इतना कठोर, इतना स्पष्ट, इतना सब्सटेंसियल वह भी नहीं है। वह भी विद्युत की धाराओं का सघन हो गया रूप है।
आज सारा जगत, विज्ञान की दृष्टि में ऊर्जा का समूह है, एनर्जी है। धर्म की दृष्टि में सदा से ही यही था। धर्म उस शक्ति को परमात्मा का नाम देता था। विज्ञान उस शक्ति को अभी एनर्जी, शक्ति मात्र ही कह रहा है। थोड़ा विज्ञान और आगे बढ़ेगा तो उससे एक और भूल टूट जाएगी। आज से पचास साल पहले विज्ञान कहता था, पदार्थ ही सत्य है।
आज विज्ञान कहता है, शक्ति ही सत्य है। कल विज्ञान को कहना पड़ेगा कि चेतना ही सत्य है, कांशसनेस ही सत्य है। जैसे विज्ञान को पता चला कि ऊर्जा का सघन रूप पदार्थ है, वैसे ही विज्ञान को आज नहीं कल पता चलेगा कि चेतना का सघन रूप एनर्जी है. इसका अजस्र स्रोत सेक्स है.
एक पागलखाने में कुछ लोग पागलों का अध्ययन करने और उन्हें समझने गए। मित्रों का एक मंडल वहां गया।
उन्होंने एक-एक पागल के पास जाकर उसके जीवन को, उसके जीवन में घटी दुर्घटना को समझने की कोशिश की। एक पागल के पास वे बहुत देर तक रुके रहे।
न केवल उस पागल के जीवन को उन्होंने समझा, वरन उनके हृदय को भी उसके जीवन ने छुआ।
उस पागलखाने के चिकित्सक ने उस पागल के संबंध में बहुत सी बातें उन्हें बताईं। वह अत्यंत दया-योग्य पागल था।
उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे और उसके ओंठ कुछ कहना चाहते थे उसके लिए फड़क रहे थे, लेकिन कह नहीं पाते थे।
उसके हाथ में एक बहुत बड़ी मनुष्य के ही बराबर एक स्त्री की पुतली थी, एक प्रतिमा थी, एक गुड़िया थी। उस गुड़िया को वह हृदय से लगाए हुए था।
उन लोगों ने पूछा चिकित्सक को कि इस पागल को क्या हो गया है? तो सारी घटना बताई गई। समझाया गया।
वह जब युवा था, कोई बीस साल पहले की बात है, तब वह किसी युवती को प्रेम करता था, इतना प्रेम किया था उसने कि उसके अभाव में उससे अलग होकर वह या तो पागल होता या आत्मघात कर लेता।
किसी भांति उसके घर के लोगों ने उसे आत्मघात करने से बचा लिया, तो वह पागल हो गया था।
तब से इन बीस वर्षों में उस युवती की गुड़िया को बना कर उससे ही प्रेम किया करता था, उससे ही बातें किया करता था।
वे सभी जो इस कथा को सुने दुखी हो आए और उनकी आंखें भी गीली हो गईं।
उन्होंने पूछा कि उस लड़की का फिर क्या हुआ? चिकित्सक ने बताया, उसने दूसरे व्यक्ति से विवाह कर लिया। और तब वे आगे बढ़े और दूसरी कोठरी के समक्ष पहुंचे।
उस चिकित्सक ने कहाः यही वह दूसरा आदमी है। वे सब हैरान हो गए, उन्होंने पूछाः इसे क्या हुआ?
चिकित्सक ने कहाः यह उस लड़की से विवाह करने के कारण पागल हो गया। इसने बहुत कोशिश की, इसने मरने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने मरने न दिया।
तब यह पागल हो गया। वे दोनों ही पागल हो गए। जिसने युवती को प्रेम किया और न पा सका और वह भी जिसने उसे पा लिया।
यह कहानी बहुत अजीब मालूम होगी. लेकिन अधिक लोगों के जीवन में यही कहानी घटित होती है।
एक कारागृह में एक ही सुबह दो व्यक्तियों को फांसी होने वाली थी। उनमें एक बहुत बड़ा पापी था, जिसको हम पापी कहते हैं।
जिसने जीवन में जो भी बुरा था सब किया था और जीवन के सब भांति के कड़वे अनुभव लिए थे।
दूसरा एक पुरोहित था, एक पादरी था, एक संन्यासी था, वह राजद्रोह में पकड़ा गया था, उसने कोई पाप कभी नहीं किया।
जहां-जहां पाप की छाया थी, वह वहीं-वहीं से दूर रहा। उसने जीवन को अत्यंत पवित्रता में और प्रार्थना में व्यतीत किया था। उन दोनों को फांसी होने वाली थी।
जो उस कारागृह का पुरोहित था, मरने के पहले लोगों को परमात्मा की याद दिलाने वाला, वह आया।
वह पहली कोठरी में गया और उसने उस पापी को कहा कि क्षमा मांगो परमात्मा से, दुखी होओ, प्रार्थना करो और पश्चात्ताप करो।
उस पापी की आंखों से आंसू बहने लगे, वह रोने लगा, और उसने कहा कि हे परमात्मा! क्षमा करो उन पापों के लिए जो मैंने किए और मुझे बल दे कि अगले जन्म में उन पुण्यों को जिन्हें मैं करना चाहता था, उनके करने की शक्ति और संकल्प पा सकूं।
वह दुखी था, जो पाप उसने किए उनके लिए, और दुखी था उन पुण्यों के लिए जो वह नहीं कर पाया।
उसको प्रार्थना करवा कर पुरोहित दूसरी कोठरी में गया। वहां एक दूसरा पुरोहित बंद था।
उसकी आंखों से भी आंसू बहते थे, पादरी ने उसे कहा कि क्षमा मांगो जीवन में तुमने जो भूलें की हैं और पश्चात्ताप करो।
उस पुरोहित ने कहाः मेरे मित्र, जरूर मैं पश्चात्ताप कर रहा हूं, लेकिन उन पापों के लिए नहीं जो मैंने किए, बल्कि उन पापों के लिए जो मैं नहीं कर पाया। मैं दुखी हो रहा हूं उन पापों के लिए जो मैं नहीं कर पाया, और कर सकता था।
मृत्यु के इस क्षण में वे सब पाप मुझे याद आ रहे हैं जो मैं कर लेता, हो सकता था उनमें आनंद होता। हो सकता है मैंने जीवन व्यर्थ गंवाया।
उसने कहा कि मेरे मित्र, तुम अभी युवा हो, और तुम भी उसी मार्ग पर हो जिस पर मैं गया, मैं तुमसे प्रार्थना करूंगा कि मैं तो मर रहा हूं, लेकिन तुम पाप करने से मत चूकना। क्योंकि जो पाप करने से चूक जाता है बाद में पछताता है।
वह युवा पादरी बहुत हैरान हुआ! पास में ही कोठरी में एक पापी पछता रहा था उन पापों के लिए जो उसने किए, और पास में ही एक पुरोहित पछता रहा था उन पापों के लिए जो वह नहीं कर पाया।
जीवन दोनों ही तरह से उलझ जाता है। ये दो जीवन के रूप करीब-करीब हर मनुष्य के सामने विकल्प होकर खड़े हो जाते हैं।
एक रास्ता है जीवन में वासनाओं को भोगने का, उनमें डूब जाने का। एक रास्ता है उनसे भाग जाने का, उनके प्रति पीठ मोड़ लेने का। ये दो ही बातें निरंतर हमारे समक्ष हैं।
*ऑंखें अंधी नहीं होने दें : दृष्टियां ‘अध्यास’ हैं :*
दृष्टियां अध्यास हैं। इसलिए खयाल रखें, दर्शन का मतलब दृष्टि नहीं है. दर्शन का मतलब है वैसी अवस्था, जब सब दृष्टियां शांत हो जाती हैं; कोई दृष्टि नहीं रह जाती, तब देखना।
जब अपनी कोई आख नहीं रह जाती थोपने को, और अपना कोई भाव नहीं रह जाता आरोपित करने को, अपनी कोई आकांक्षा नहीं रह जाती।
मरुस्थल को तब देखना, जब भीतर कोई प्यास नहीं होती, फिर मरुस्थल धोखा नहीं दे सकता। प्यास की वजह से धोखा हो जाता है। पानी की चाह होती है, और नहीं मिलता तो चाह और बढ़ जाती है।
जब चाह ज्यादा बढ़ जाती है तो मन विक्षिप्त हो जाता है, और जो नहीं है उसे भी मानने का मन होने लगता है। एक ऐसी स्थिति भी है जब सब दृष्टियां क्षीण हो जाती हैं और दर्शन का उदय होता है।
कब होती हैं दृष्टियां क्षीण? दृष्टियां तभी क्षीण होती हैं, जब सभी वासनाएं क्षीण हो जाती हैं, क्योंकि हर दृष्टि वासना का खेल है, वासना का फैलाव है।
सूत्र कहता है ‘देह, इंद्रियां आदि अनात्म पदार्थ हैं, इनके ऊपर मैं —मेरा ऐसा जो भाव होता है, वह अध्यास है। इसलिए बुद्धिमान को ब्रह्मनिष्ठा द्वारा इस अध्यास को दूर करना चाहिए।
*जागरण का मूलभूत सूत्र : मैं कौन?*
मैं कौन हूं, मैं क्यों हूँ, मैं कहां से हूं, मैं कहां के लिए हूं?
पहला प्रश्न जो प्रत्येक को अपने से पूछ लेना चाहिए, वह यह कि “क्या मैं अपने को जानता हूं?’ मैं कौन हूं, मैं क्या हूं, मैं कहां से हूं, मैं कहां के लिए हूं?
लेकिन किसी बात का कोई उत्तर नहीं है! न ज्ञात है कि मैं कौन हूं, न ज्ञात है कि मैं क्या हूं, न ज्ञात है कि मैं कहां से हूं, न ज्ञात है कि मैं कहां के लिए जा रहा हूं। इन चार बुनियादी प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है, लेकिन हम स्वीकार कर लिए हैं कि हम अपने को जानते हैं!
शॉपेनहार–एक सुबह, कोई तीन बजे होंगे, एक छोटे-से बगीचे में गया हुआ था। रात थी। अभी अंधेरा था। बगीचे का माली हैरान हुआ कि इतनी रात गये कौन आ गया है। उसने अपनी लालटेन उठायी, अपना भाला उठाया और वह गया बगीचे के भीतर । शॉपेनहार वहां टहलता है वृक्षों के पास और कुछ अपने से ही बातें कर रहा है!
उस माली को शक हुआ कि जरूर कोई पागल घुस आया है, अकेला अपने से बातें कर रहा है! उसने दूर से ही खड़े होकर आवाज दी और पूछा कि “कौन हो, कहां से आये हो, किसलिए आये हो, क्या चाहते हो?’
शॉपेनहार जोर से हंसने लगा और उसने कहा, “तुम ऐसे कठिन प्रश्न पूछते हो, जिनका उत्तर आज तक कोई आदमी नहीं दे पाया। पूछते हो, कौन हो? जिंदगी भर हो गया मुझे पूछते-पूछते, अब तक मुझे उत्तर नहीं मिला कि कौन हूं! पूछते हो कहां से आये हो? आज तक कोई आदमी नहीं बता सका कि कहां से आया है! मैं भी असमर्थ हूं। पूछते हो, किसलिए आये हो? उसका भी मुझे पता नहीं कि किसलिए आया हूं!’
निश्चित ही उस माली ने समझा होगा कि पागल ही है यह आदमी, जिसे इतना भी पता नहीं। लेकिन माली पागल था या वह आदमी, जिसे पता नहीं था। कौन था पागल?
अगर आपको पता है या आपको भ्रम है कि आपको पता है तो आप पागल हो सकते हैं। लेकिन अगर आपको पता नहीं है तो यह मनुष्य की स्थिति है, यह ह्युमन सिचुएशन है कि आदमी को पता नहीं है। इसमें पागलपन का कोई सवाल नहीं है।
लेकिन कहीं हम पागल न मालूम पड़ने लगें, इसलिए हमने कुछ व्यवस्था कर ली है। कुछ अपने को पहचानने और जानने का आयोजन कर लिया है। हमने कुछ उपाय कर लिये हैं, जिससे हमें ऐसा लगे कि हम अपने को जानते हैं। हमने अपने नाम रख लिए है, अपनी जाति बना ली है, अपना धर्म बना लिया है, अपना देश बना लिया है!
हमें इंगित किया जा सके कि कौन है यह आदमी–तो हमारा नाम है, हमारी जाति है, हमारा धर्म है, हमारा देश है; हमारे मां-बाप हैं, उनके नाम हैं; हमारी वंश परंपराएं हैं! और हमने कुछ इंतजाम कर लिया है, जिस भांति यह पहचाना जा सके कि मैं कौन हूं। और हमारी सारी व्यवस्था झूठी है, हमारी सारी व्यवस्था कल्पित और सपने जैसी है। क्या है नाम किसी का? क्या है किसी की जाति? क्या है किसी का धर्म? कौन-सा है देश, किसका?
लेकिन हमने जमीन पर भी झूठी रेखाएं खींच रखी हैं–भारत की और चीन की, और रूस की और अमरीका की! झूठी रेखाएं, जो जमीन पर कहीं भी नहीं है, लेकिन ताकि हम कह सकें कि मैं यहां से हूं!
हमने आदमी के आसपास भी झूठे नाम और लेबल चिपका रखे हैं। कोई राम है, कोई कृष्ण है, कोई कोई है! वे नाम भी बिलकुल झूठे हैं। आदमी कोई नाम लेकर पैदा नहीं होता है।
हमने जातियों के नाम भी चिपका रखे हैं! वे नाम भी बिलकुल झूठे हैं। आदमी किसी जाति में पैदा नहीं होता। सब जातियां आदमी के ऊपर थोपी जाती हैं।
हमने मां-बाप के नाम भी अपने साथ जोड़ रखे हैं! न उनका कोई नाम था, न उनके मां-बाप का कोई नाम था, न उनके मां-बाप का कोई नाम था।
हमने एक छोटा-सा कोना बना लिया है ज्ञान का, और ऐसा भ्रम पैदा कर लिया है कि हम अपने को जानते हैं। इसी भ्रम में हम जीते हैं और नष्ट हो जाते हैं।
जीवन साधक को यह भ्रम तोड़ देना चाहिए, यह कोना उजाड़ देना चाहिए। उसे जान लेना चाहिए ठीक-ठीक कि मेरा कोई नाम नहीं है, मेरी कोई जाति नहीं है। मेरा कोई देश नहीं है; मेरा परिचय नहीं, मैं बिलकुल अज्ञात हूं। जैसे ये हवाओं के झोंके अज्ञात हैं, जैसे ये वृक्ष अज्ञात हैं, जैसे ये आकाश के चांदत्तारे अज्ञात हैं, जैसे यह सागर का पानी अनाम और अपरिचित और अज्ञात है, वैसे ही आदमियों के जीवन की लहरें भी अज्ञात हैं, अनजानी हैं, अपरिचित हैं।

