जयशंकर गुप्त
उत्तर पूर्व के राज्यों में घूमना, उनके इतिहास-भूगोल, समाज और संस्कृति को समझना हमें प्रिय रहा है। मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर उत्तर पूर्व के सभी राज्यों में हम सघन भ्रमण कर चुके हैं। मेघालय इससे पूर्व भी कई बार जा चुके हैं। इस बार प्रेस काउंसिल आफ इंडिया की एक सब कमेटी के साथ गुवाहाटी जाने का कार्यक्रम बना, बाद में इसमें मेघालय की राजधानी शिलांग में दिन भर का प्रवास भी जुड़ गया। शिलांग में सूचना एवं जनसंपर्क निदेशक एम एस संगमा के कार्यालय में अन्य विभागीय अधिकारियों के साथ हमारी बैठक बहुत सार्थक रही। सब कमेटी विभिन्न राज्यों में प्रेस काउंसिल के दिशा निर्देशों के तहत प्रेस मान्यता समितियों के गठन, पत्रकारों के मान्यता संबंधी नियम-प्रावधानों और उन पर अमल की समीक्षा करने तथा पुराने पड़ गए नियम प्रावधानों में मौजूदा संदर्भों के मद्देदेनजर अपेक्षित बदलाव आदि के बारे में सुझाव देने के काम में लगी है। दोपहर का हमारा भोजन सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय में ही हुआ। वहां से हम लोग शिलांग व्यू प्वाइंट (शिलांग पीक) पर गए जहां से उमड़ते घुमड़ते बादलों के बीच मौसम साफ रहने पर शिलांग शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

मेघालय को मेघों (बादलों) का घर भी कहा जाता है। ब्रिटिश राज के समय अंग्रेज अधिकारी इसे पूरब का स्कॉटलैंड कहते थे। हालांकि आसमान में रूई के विशालकाय फाहों जैसे घुमड़ते-विचरते बादलों के झुंड से हमारी मुलाकात 10 दिसंबर को दिल्ली से स्पाइसजेट की उड़ान के गुवाहाटी पहुंचने से कुछ पहले ही होनी शुरू हो गई थी। विमान हिचकोले खाने लगा था। बादल तमाम तरह के दृश्य बना रहे थे। लेकिन बादलों की अठखेलियां बहुत करीब से देखने का अवसर 13 दिसंबर को शिलांग व्यू प्वाइंट (शिलांग पीक) पर मिला। बादल हमारे सिर के ऊपर से विचरते दिखे। शिलांग पीक व्यू प्वाइंट भारतीय वायु सेना के ईस्टर्न कमांड बेस पर स्थित है। यहां भारतीय वायु सेना का एक रडार स्टेशन भी है। सुरक्षा उपायों के चलते प्रवेश द्वार पर चेकिंग की जाती है। यहां हर रोज हजारों की संख्या में पर्यटक आते हैं। मौसम साफ हो, सूर्य देवता बादलों और कोहरे को छाँटकर अपनी चमक बिखेर रहे हों तो यहां से पूरा शिलांग शहर दिखता है। यह शिलांग की सबसे ऊंची जगह है। हाल के दिनों में सुरक्षा कारणों से यहां आम पर्यटकों की आमद रोक दी गई है। जब हम लोग वहां पहुंचे, अजीब तरह का सन्नाटा पसरा हुआ था। वहां लगने वाली दुकानें भी नहीं थीं। शहर की अपेक्षा ठंड भी कुछ ज्यादा ही थी। कुछ देर हम वहां रहे। तस्वीरें ली गईं। साथ में वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार डेविड भी थे जो बता रहे थे कि शहर का कौन इलाका, इमारत कहां दिख रही है।
शिलांग पीक से वापस लौटते समय बाहर सड़क के किनारे कुछ स्थानीय लोग (ज्यादातर औरतें) पास में ही उगाई आर्गेनिक सब्जियां बेच रहे थे। गाजर, मूली का स्वाद गजब का था। देखने में मूली बड़ी और मोटी लेकिन खाने में बहुत ही नरम, मुलायम और स्वादिष्ट। यही हाल गाजर का भी था। दुकान के पीछे ही खेत थे जिनमें से आलू, करेला, गोभी आदि सब्जियां निकाल कर बेची जा रही थीं। हमने भी वहां से कुछ आलू और करेले ले लिए। विमान में अधिक सामान नहीं ले जा सकने की मजबूरी के कारण मूली, गाजर नहीं ले सके। और फिर हम लोगों को शीघ्र गुवाहाटी के लिए निकलना और रास्ते में बडा पानी (उमियाम) के नाम से मशहूर झील पर कुछ समय रुकना भी था। शिलांग-गुवाहाटी के रास्ते में सड़क किनारे स्थित यह मानव निर्मित कृत्रिम झील स्कॉटलैंड की झीलों जैसा मनोरम दृश्य पेश करती है। यहां पर एक वाटर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और नेहरू पार्क भी है। झील में बोटिंग के लिए साधारण और स्पीड बोट भी मिल जाती हैं। मानसून के समय इस झील में काफी पानी होता है जबकि गर्मियों में इसमें पानी कम रह जाता है। तकरीबन 10 वर्ग किलोमीटर में फैली इस झील को दक्षिण की खासी पहाड़ियों से आने वाले पानी को रोककर बनाया गया है। इस झील के नैसर्गिक सौंदर्य का आनंद लेने के लिए कई घंटे या कहें पूरा दिन भी कम पड़ जाता है लेकिन लौटते समय हमारे पास समय बहुत कम था। वहां पहुंचने तक दोपहर के साढ़े चार बज चुके थे। इस समय तक मेघालय में सूर्यास्त हो जाता है। सड़क से जितना बन पड़ा हम लोगों ने झील के नैसर्गिक सौंदर्य के दीदार किए। झील के किनारे बने खूबसूरत आर्केड रिजॉर्ट में पीछे का रास्ता झील की तरफ जाता है। हम लोग जहां तक जाना संभव था, गए। तस्वीरें खिंचवाई और फिर गुवाहाटी के लिए निकल पड़े। रास्ते में हमने मेघालय के कुछ मीठे संतरे और अनानास भी ले लिए।
शिलांग हम सुबह के 10.30 बजे ही पहुंच गए थे। इस समय सड़क पर ट्रैफिक की हालत बहुत बुरी हो जाती है। शहर के हिसाब से गाड़ियों की उपस्थिति और आमद कुछ ज्यादा ही होती है। वन वे ट्रैफिक होने के बावूजूद वाहन रेंगते नजर आते हैं। शिलांग क्लब में कुछ देर रुकने के बाद हम लोग वार्ड लेक चले गए। शहर के बीचोबीच स्थित इस मानव निर्मित झील को 1894 में असम के तत्कालीन मुख्य आयुक्त विलियम वार्ड ने बनवाया था। झील के निर्माण का उद्देश्य मुख्य रूप से ब्रिटिश अधिकारियों और उनके परिवारों को एक मनोरंजक स्थान उपलब्ध करना था। अब यह शिलांग आने वाले पर्यटकों के लिए पसंदीदा जगह है। वार्ड झील में हम लोग तकरीबन एक घंटे तक विचरते रहे।
पिछले साल इसी महीने में जब हम शिलांग गए थे, पूरा शहर क्रिसमस और नये साल के स्वागत और जश्न की तैयारियों में जुटा था। चर्च, बंगले, होटल और बाजार खूबसूरत रोशनी में नहाए लग रहे थे। इस बार भी क्रिसमस की तैयारियां आरंभिक स्तर पर दिखीं।
नोट: अगली किश्त गुवाहाटी प्रवास और क्रूज पर ब्रह्मपुत्र नदी में तथा पबित्रा जंगल सफारी में विचरण के बारे में