~ डॉ. विकास मानव
आयुर्वेद में धी, धृति, स्मृति- ये तीन बुद्धि के भेद माने गये हैं। वस्तुतः ये नामकरण बुद्धि के विशिष्ट कार्यों के आधार पर किये गये हैं। मानवीय व्यवहार में स्मृति का बहुत महत्त्व है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली एवं व्यावहारिक जगत् में स्मृति का महत्त्व अत्यधिक बढ़ गया है, क्योंकि जितनी अधिक स्मरणशक्ति होगी, उतनी ही अधिक योग्यता एवं सफलता प्राप्त होती है।
व्यक्ति के पास स्मरण रखने के लिए इतनी अधिक वस्तु या सूचनाएँ है कि उसके मस्तिष्क पर स्मृति सम्बन्धी बोझ बढ़ता जा रहा है और स्मृति सम्बन्धी व्याधियाँ दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है।
स्मरतव्यं हि स्मृतौ स्थितम्।
जो स्मरण रखने योग्य है, वहीं स्मृति में होता है। हम अपने दैनिक व्यवहार में सुबह से शाम तक सैकड़ों विषयों को देखते-सुनते हैं, किन्तु सभी को स्मृति में नहीं रखते । इसमें से कुछ चीजें, कुछ भाव ऐसे होते हैं, जिन्हें हम अपनी स्मृति में संगृहीत करते हैं।
योगसूत्रकार महर्षि पतंजलि के अनुसार अनुभूत विषयों का विलोप न होना ही स्मृति है।
अनुभूतविषयाऽ सम्प्रोषः स्मृतिः।
~योगसूत्र (1/11)
जब भी कोई विषय हमारी ज्ञानेन्द्रियों के सम्पर्क में आता है तथा उसका आभ्यन्तर साक्षात्कार होता है तो हमारे मनोमस्तिष्क पर उसका अंकन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसे वैशेषिकदर्शनाकार ‘संस्कार’ शब्द से सम्बोधन करते हैं।
उनके अनुसार आत्मा- मन के संयोग विशेष के परिणामस्वरूप जो संस्कार बनते हैं वहीं स्मृतिसंज्ञक होते हैं।
आत्मामनसोः संयोगविशेषात् संस्काराच्च स्मृतिः ।”
~ वैशेषिक सूत्र (9/2-6)
वस्तुतः हमारे इन्द्रिय प्रत्यक्ष विषयों का स्मृति में संगृहीत होना अनेक आधारों पर नियत रहता है। कभी कोई वस्तु अल्पकाल के लिए इन्द्रियप्रत्यक्ष होती है और बहुत काल तक स्मृति में बनी रहती है। कभी कोई भाव दीर्घकाल तक इन्द्रिय-सम्पर्क में रहने के बाद भी स्मृति में संगृहीत नहीं हो पाता। इसका कारण चरकाचार्य द्वारा पठित ‘स्मरतव्य’ शब्द है।
अर्थात् जिस वस्तु को हमारा मन ‘स्मरतव्य’ अथवा स्मरणीय समझता है, वही वस्तु स्मृति में संगृहीत होती है। इससे स्पष्ट होता है कि स्मृति बुद्धि का व्यापार होते हुए भी उसमें उसकी प्राप्ति एवं क्रियात्मकता में मन की भूमिका प्रमुख है। इसीलिए मानसिक व्याधियों में स्मृति सम्बन्धी विकृतियाँ प्रायः मिलती हैं।
स्मृति दो प्रकार की मानी गयी है :
1. तात्कालिक स्मृति (Immediate memory).
2. संगृहीत स्मृति (Stored memory).
तात्कालिक स्मृति कुछ देर रहती है। यदि उस वस्तु या भावविशेष की पुनरावृत्ति न हो तो वह विस्मृत हो जाती है। संगृहीत स्मृति का सर्वाधिक महत्त्व है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सूचनाओं का एवं ज्ञान का महत्त्व सर्वविदित है। स्मृति के माध्यम से हम अधिक-से-अधिक सूचनाएँ एवं ज्ञान का संग्रह अपने मन-मस्तिष्क में करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर आभ्यन्तर संस्पर्श द्वारा हमारा चेतन मन उस संगृहीत ज्ञान को क्रियात्मक स्मृति में लाता है।
किसी भी अनुभूत विषय का अधिक-से-अधिक स्मृति में संग्रह होना एवं समय पर उस संगृहीत ज्ञान का स्मृति में आना एक जटिल मनोभौतिक प्रक्रिया है और अनेक तत्त्व इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहभागी होते हैं।
आचार्य चरक ने आठ प्रमुख कारण बताये हैं, जिनके कारण स्मरण-प्रक्रिया होती है :
वक्ष्यन्ते कारणान्यष्टौ स्मृतिर्यैरुपजायते।
निमित्तरूपग्रहणात् सादृश्यात् सविपर्ययात्।।
सत्त्वानुबन्धादभ्यासाज्ज्ञानयोगात्पुनः श्रुतात्।
दृष्टश्रुतानुभूतानां स्मरणात् स्मृतिरुच्यते।”
~चरक संहिता (1/148-49)
1. निमित्त ग्रहण (Relationship between cause and effect)
कार्य को देखकर कारण का और कारण को देखकर कार्य का स्मरण होता है। ऐसा प्रायः समवायी कारण के सन्दर्भ में होता है।
2. रूप ग्रहण (Similar physical constitution)
एक आकार की किसी वस्तु को देखकर उसी आकार की दूसरी वस्तु का स्मरण हो जाता है।
3. सादृश्य (Similarity)
एक-सी दो वस्तुओं के कारण किसी एक को सुनकर दूसरे का स्मरण हो जाता है।
4. सविपर्यय (Contrast) — किसी वस्तु को देखकर उसके एकदम विरोधी वस्तु का स्मरण हो जाता है।
5. सत्त्वानुबन्ध (Attention)
मन की एकाग्रता के साथ किसी वस्तु का ध्यान करने पर स्मरण होता है।
6. अभ्यास (Repeatation)
किसी वस्तु को बार-बार पढ़ने से स्मरण हो जाता है।
7. ज्ञानयोग (Speadual power)
साधकों को अध्यात्मिक साधना द्वारा पूर्व संस्कारों का स्मरण हो जाता है।
8. पुनः श्रुत (Repeated hearing)
किसी बात को पुनः सुनकर तत्सम्बन्धी अन्यान्य बातों का स्मरण हो जाता है।
चरकोक्त उपरोक्त स्मृति कारणों के व्यतिरेक भी अन्य स्मृति-हेतु भारतीय साहित्यों में वर्णित है जिनमें किसी वस्तु से जुड़ी दूसरी वस्तु का स्मरण होना (अनुबन्ध), संकेत या चिह्न से किसी दूसरे का ध्यान होना, किसी वस्तु को देखकर उसके स्वामित्व का स्मरण होना, आश्रय को देखकर आश्रयी का स्मरण होना, कार्य सादृश्य से दूसरे कार्य का ज्ञान होना संकट के समय सहयोगी का स्मरण होना, दुःख काल में सुख का स्मरण होना, जरूरत के समय प्राप्तव्य का स्मरण होना और अत्यन्त स्नेह के कारण किसी का बार-बार स्मरण होना आदि प्रमुख हैं।
इन स्मृति-हेतुओं को विवेचना की दृष्टि से बाह्य, आभ्यन्तर अथवा भौतिक, मानसिक आदि आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इन हेतुओं की न्यूनता अथवा अधिकता स्मृति प्रक्रिया को प्रभावित करती है। जितनी तीव्र स्मरण इच्छा होगी, उतनी ही अधिक अच्छी स्मृति क्रियात्मक मस्तिष्क में आती है। ठीक वैसे ही मन की एकाग्रता स्मृति की न्यूनाधिकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जब मन विभक्त होता है अर्थात् एकाग्र नहीं रहता है तो वह विषय स्मृति में नहीं आता है। वर्तमान में अनेक छात्र यह शिकायत ले कर आते हैं कि खूब पढ़ने, सुनने पर भी कोई विषय याद नहीं रहता है। ऐसा प्रायः मन की एकाग्रता एवं उस विषय में रुचि की कमी के कारण होता है। मन्दबुद्धि व्यक्तियों में स्मृति मन्दता भी रहती है।
संगृहीत स्मृति के मुख्यतः दो विकार वर्णित हैं :
1. स्मृतिभ्रंश।
2. स्मृतिनाश।
*स्मृतिभ्रंश :*
समय पर किसी विषय का स्मरण न हो पाना ही स्मृतिभ्रंश हैं। प्रायः यह देखा जाता है कि व्यक्ति अधिक उत्सुक या चिन्तातुर है तो बात याद नहीं आती है और नहाते समय, सोते समय वही बात सहज ही याद आ जाती है। यह भी मन की एकाग्रता से जुड़ी हुई प्रक्रिया है।
*स्मृतिनाश :*
स्मृति का पूर्णतः लोप हो जाना स्मृतिनाश है। यह प्रायः परतन्त्र स्वरूप की व्याधि है। यह मस्तिष्कगत अर्बुद, रक्तस्राव, शोष अथवा शिरो आघात के परिणामस्वरूप मिलती है। अत्यन्त वृद्धावस्था में भी इसके लक्षण मिलते हैं।
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