राकेश श्रीवास्तव
कर्नाटक चुनाव परिणाम को लेकर अनुमान, अटकलें और अफवाहें कुछ भी हों पर यह तो स्पष्ट है कि सभी दावेदार बेहद उहापोह से गुजर रहे हैं।वैसे तो हर चुनाव के संदर्भ मे होता है पर इस चुनाव के समय और उसमे उठे मुद्दों ने इसे विशेष रंग दे दिया है।एक राजनीतिक पार्टी के रूप मे भाजपा की यह अच्छी बात है कि वह ग्राम प्रधान और सभासद के चुनाव से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के चुनाव मे पूरी मेहनत लगा देती है और जमीनी स्तर से लेकर प्रधानमंत्री तक सभी अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देते हैं।कर्नाटक मे भी यही हुआ है। कांग्रेस ने भी इस चुनाव को बहुत गम्भीरता से लिया है।एक तो यह मल्लिकार्जुन खड़गे का गृह राज्य है दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया तथा डी के शिवकुमार ने भी सारे मतभेदों को भुलाकर पूरी ताकत झोंक दी।
आज जब आप यह पढ़ रहे होंगे तब तक स्थित स्पष्ट होने लगेगी। आज ही के दिन उप्र नगर निकायों के चुनावों के परिणाम भी आ रहे हैं। उप्र के नगर निकायों मे विशेष कर बड़े शहरों मे भाजपा का ही दबदबा कायम रहा है।अबकी कई स्थानों पर सपा प्रत्याशी भी मजबूती से टक्कर दे रहे हैं। कांग्रेस और बसपा कुछ अपवादों को छोड़कर मुख्य संघर्ष मे नहीं दिख रहे हैं। हिमाचल प्रदेश हारने के बाद भाजपा कर्नाटक कदापि नहीं हारना चाहेगी क्योंकि इसके दूरगामी परिणाम मध्य प्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव पर भी पड़ेंगे।चुनाव के पहले भी मुझे भी लगभग डेढ़ माह का समय कर्नाटक और आसपास के क्षेत्रों मे बिताने का समय मिला।इस दौरान वहां के अनेक वर्गों के लोगों से बातचीत में हुए हर तरह के अनुभवों के आधार पर मेरा आकलन है कि कर्नाटक में स्थानीय स्तर पर लोगों के अंदर परिवर्तन की चाह दिखाइ दे रही है।बंगलौर शहर का रखरखाव आज के कुछ वर्षों पूर्व जैसा नहीं दिखा। बेंगलुरु जैसे शहर में ट्रैफिक की हालत बहुत खराब है,बहुत जगह पर टूटी-फूटी हैं।बुनियादी सुविधाएं, शिक्षा,भ्रष्टाचार, बेरोजगारी प्रमुख समस्याएं दिख रही हैं।दुकानदारों तथा अन्य कामकाजी वर्ग में बाहर से आने वाले वर्ग के प्रति कहीं ना कहीं नाराजगी भी झलकती है। अकुशल श्रमिकों को लगता है की उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले लोग कम मजदूरी पर काम करके उनको भी कम दर पर काम करने पर मजबूर कर रहे हैं या उनको रोजगार से बाहर कर रहे हैं। ऑटो और टैक्सी वालों के मन में भी कुछ भी तरह की बातें थी।
कांग्रेस ने चुनाव की तैयारी राहुल गांधी की यात्रा के परिपेक्ष मे बहुत अच्छे तरीके से की थी। नामांकन के दौर मे बीजेपी से कांग्रेस में गए जगदीश सेट्टार और सावदी ने कांग्रेस को बहुत लाभ पहुंचाया। लक्ष्मण सावदी कर्नाटक विधानसभा परिषद में सदन के उपनेता रह चुके थे। वह येदियुरप्पा और देवी सदानंद गौड़ा के मंत्रिमंडल मे कैबिनेट मंत्री तथा उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं।शेट्टार तो जनसंघ के समय से ही जुड़े हुए थे।भाजपा ने उन्हें लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तरह ही समझ कर किनारे लगाने की भूल कर दी जबकि दोनों ही जमीनी नेता हैं और कर्नाटक की राजनीति मे अपना विशिष्ट प्रभाव रखते हैं।लिंगायत समूह भी इससे आहत हुआ। आज के चुनाव परिणामों से इनके प्रभाव का भी पता चलेगा।
इन चुनावों के परिणाम से यह भी पता चलेगा कि जनता अभी भी लोक लुभावन नारों के सम्मोहन मे ही है या उससे बाहर निकल चुकी है ।कांग्रेस ने कर्नाटक मे अबकी मुख्य मुद्दा सरकार का भ्रष्टाचार और लोगों की परेशानियों जैसे बेरोजगारी, महंगाई आदि को बनाया। राहुल गांधी की पदयात्रा के बाद लोगों से तारतम्यता बनी रही। जमीनी स्तर पर भी कार्यकर्ता सक्रिय दिखे।उनके चुनावी वादों की गारंटी को पहली कैबिनेट मीटिंग मे ही लागू करने के वादे पर लगता है कि लोगों ने यकीन कर लिया है।बजरंग दल और पीएफआइ की बात एक साथ कह कर कांग्रेस ने बहुत बड़ा खतरा मोल लिया है। यह चुनाव परिणाम यह भी तय करेंगे कि कांग्रेस नीति की बात पर दृढ़ता से टिकी रह सकती है या खुद अपने लिए भस्मासुर साबित होगी।अबकी जिस तरह से हमारे आराध्य भगवान बजरंगबली हनुमान जी का नाम बजरंग दल से जोड़ा गया है वह हम जैसे लोगों के लिए बहुत पीड़ादायक रहा। इसके साथ ही कर्नाटक के चुनाव परिणाम यह भी बतायेंगे कि हमारी रुचि इतिहास पढ़ कर समझने मे है या फिर फिल्म देख कर। चुनाव गणित तो है ही पर साथ ही समाजशास्त्र की पाठशाला का एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक भी है।
क्षेत्रीय आधार पर बात की जाय तो लगता है कि तटीय कर्नाटक मे यह मुद्दे प्रभावी रहेंगे और धार्मिक ध्रुवीकरण संभव है और भाजपा को लाभ होता दिखाई पड़ता है।मुम्बई कर्नाटक क्षेत्र मे लगभग बराबर की टक्कर तो सेन्ट्रल कर्नाटक मे यह कांग्रेस की बढ़त की तरफ दिखती है।हैदराबाद बंगलौर और ओल्ड मैसूर क्षेत्र आते आते कांग्रेस काफी आगे दिखती है। ग्रेटर बंगलौर मे यूं तो कांग्रेस आगे लगती है पर आई टी क्षेत्रों मे उत्तर भारतीय क्षेत्रों से नौकरी करने आए लोग भाजपा को बढ़त दे सकते हैं।
परिणाम चाहे भी जिसके पक्ष मे हों पर यह निश्चित है कि इन परिणामों का असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर अवश्य पड़ेगा।

