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मिल गया! मिल गया !एक वामपंथी सेनानी मिल गया

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सुसंस्कृति परिहार

 साथियों हिंदी पखवाड़ा चल रहा है इसलिए यूरेका –यूरेका कहने में संकोच हो रहा है। ख़ुश ख़बर ये है कि आज़ादी का नया इतिहास भाजपा ने खोज डाला है एक ऐसा सेनानी जिसकी कांग्रेस ने उपेक्षा की जिसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को ज़मीन दान की किंतु उनका कहीं उल्लेख नहीं।कौन है ये यह महान व्यक्तित्व एक दिसंबर 1886 को  एक बालक पैदा होता है जिसको 3 साल की उम्र में हाथरस के राजा-जमींदार हरनारायण सिंह गोद लेते हैं। नाम रखा जाता है महेंद्र प्रताप सिंह ।आगे चलकर महेंद्र प्रताप सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस की मुरसान रियासत के राजा बनते हैं। जाट परिवार से ताल्लुक रखने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह की गिनती अपने क्षेत्र के पढ़े-लिखे लोगों में होती थी। उनका विवाह जींद रियासत की बलबीर कौर से हुआ था। उनकी बारात के लिए हाथरस से संगरूर के बीच दो विशेष ट्रेनें चलाई गई थीं। आगे चलकर महेंद्र कांग्रेसी बनते हैं फिर एक राइटर, एक पत्रकार और फिर क्रांतिकारी देशभक्त । देश के लिए अपनी उच्च शिक्षा त्याग देते है और देश को आज़ाद कराने के लिए ऐशो-आराम  छोड़कर  एक समाजवादी राष्ट्र बनाने का सपना लिए दर ब दर भटकते रहते है। अपने 28 वें जन्मदिन पर वो  सुदूर अफगानिस्तान के काबुल में एक निर्वासित सरकार बनाते है स्वयं राष्ट्रपति बनते है और एक मुसलमान मौलवी बरकतुल्लाह भोपाल को अपना प्रधानमंत्री बनाते है। 

   विदित हो महेंद्र प्रताप लेनिन के मित्र थे। सोवियत सरकार से बाबस्ता थे । वो हिंदुस्तान में भी एक समाजवादी सरकार बनाना चाहते थे। सांप्रदायिकता जाति-पाति के कट्टर विरोधी थे। अंग्रेजों ने उन पर जिंदा या मुर्दा लाने पर लाखों का इनाम रखा। वे 1925 में जापान चले गए और 32 साल बाद 1946 में भारत लौटे।राजा महेंद्र प्रताप सिंह कांग्रेस की नीतियों से सहमत नही थे क्योंकि वे एक वामपंथी विचारक थे और समाजवादी राष्ट्र की कल्पना करते थे।1957 में मथुरा संसदीय सीट से वे निर्दलीय चुनाव लड़े और जनसंघ के अटल बिहारी बाजपेयी को हराया। अटल बिहारी को तो हम सब लोग  भली-भांति जानते ही हैं।आज  महेंद्र प्रताप सिंह को जाट नेता बता रहें है तथा उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान के बरक्स खड़ा कर रहें हैं। वे नहीं जानते कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह की आरंभिक शिक्षा उसी मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेजिएट स्कूल में हुई। जो बाद में अलीगढ़ विश्वविद्यालय बना।
अब प्राचीन इतिहास से जो बात महत्वपूर्ण खोज की गई वह है उनका अलीगढ़ विश्वविद्यालय को ज़मीन दान देना , कांग्रेस की उपेक्षा और बहुत ज़रूरी बात उनके जाट होने की बात।अब नया इतिहास रच दिया जा रहा है उनके नाम से महेन्द्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय बनेगा जिसका शिलान्यास हो गया ।अलीगढ़ आगे चलकर दो विश्वविद्यालयों के लिए जाना जाएगा। इस मुद्दे पर कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनेगा ।साथ ही उत्तर प्रदेश के जाटों को भी साधा जा सकेगा ।यह संदेश सभी जाटों को आकर्षित करेगा ऐसा सोचा जा रहा है।
यकीनन भाजपा ऐसे ही लोगों की तलाश में जुटी है। उनके पुराने इतिहास की बलि चढ़ाकर मत हासिल करने की कुचेष्टा करेगी ।आपने जान ही लिया होगा कि महेंद्र प्रताप साम्प्रदायिकता और जात पांत के खिलाफ थे। वामपंथी विचारक थे और कांग्रेस की नीतियों के विरोधी थे।जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेई के खिलाफ चुनाव लड़े और उन्हें परास्त भी किया। अलीगढ़ विश्वविद्यालय को ज़मीन दान की। लेकिन भाजपा है कि वह उन्हें गले लगा रही है। ऐसों को उदार जग माहीं।यह तमाम नये समीकरण यही संकेत दे रहे कि भाजपा की हालत कितनी गंभीर है। मोदीजी ने कई बार समारोह में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह अमर रहे के नारे भी लगवाए। इतिहास में ऐसे लोगों की तलाश यदि ईमानदारी से की जाए तो ऐसे असंख्य हिंदु मुस्लिम, सिख और ईसाई मिल जाएंगे जिन्होंने देश में शिक्षा और स्वास्थ्य के विकास हेतु अपनी ज़मीनें दान की है अपना कर्तव्य समझकर। उनके नाम कहीं नहीं  हैं।इसी तरह मंदिरों मस्जिदों के निर्माण में जो परस्पर सहयोग की मिसालें हैं उन सब को भी क्या इस तरह सामने लाया जाएगा?
यह तो सब समझ रहे हैं कि इन तमाम कार्यों का मकसद उत्तर प्रदेश में जाट वोट बचाना तो है ही साथ ही साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के महत्त्व को कम करने एक ऐसे राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय के रूप महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय को खड़ा करना है जो उनके संघी विचारों के अनुरूप नई शिक्षा का संवाहक बने और सर सैयद अहमद खान जैसे  समाजसेवी जिन्होनें 1921में  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की थी उस महामना की छवि को क्षति पहुंचाई जा सके।जबकि महेंद्र प्रताप सिंह जी 29अप्रेल 1979तक जीवित रहे उनके मन में कभी इस तरह की कोई चाहत कभी सामने नहीं आई।
कुल जमा बात यह कि एक चटपटा मसाला हाज़िर है। जिसकी तलाश में भाजपा रहती है। विवेकानंद,भगतसिंह, सरदार पटेल के बाद अब कम से कम यू पी के जाटों के लिए यह पसंदीदा तो हो सकता है लेकिन अलीगढ़ में विभाजन की दीवार खड़ी कर अलग विश्वविद्यालय की स्थापना से अलीगढ़ के मज़बूत सद्भाव के ताले तोड़कर जो रचने की कोशिश है वह सैयद अहमद खान और महेंद्र प्रताप सिंह की भावनाओं के साथ विश्वासघात होगा ।इसे इतिहास माफ नहीं करेगा।

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