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मन, एकाग्रता, ध्यान और अ-मन

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~डॉ. विकास मानब

     मनन का अर्थ है विचारना, दिशाबद्ध विचारना। हम सब विचार करतें हैं, लेकिन वह मनन नहीं है। वह विचारना दिशा—रहित है, अस्पष्ट है, कहीं जाता हुआ नहीं है। असल में हमारा विचारना मनन नहीं है, बल्कि फ्रायडवादियों की भाषा में उसे एसोसिएशन कहना चाहिए।

     आपके अनजाने ही एक विचार दूसरे विचार को जन्म दिए जाता है। एसोसिएशन के कारण एक विचार अपने आप ही दूसरे विचार पर चला जाता है।

    आप एक कुत्ते को गली पार करते देखते हो। जिस क्षण कुत्ते को देखते हो, मन कुत्तों के संबंध में सोचने लगता है। कुत्ता आपको ले चला। और फिर मन के अनेक एसोसिएशन हैं। जब आप बच्चे थे,  एक विशेष कुत्ते से डरा करते थे। वह कुत्ता अब मन में उभर आता है और उसके साथ आपका बचपन चला आता है।

       कुत्ते तो भूल जाते हैं और एसोसिएशन के प्रभाव के कारण, लेकिन आप अपने बचपन के संबंध में दिवा—स्‍वप्‍न देखने लगते हो. फिर बचपन के साथ जुड़ी हुई अनेक चीजें आती हैं, और आप उनके बीच चक्कर काटने लगते हो।

जब फुरसत हो तो सोचने से पीछे चलो, विचारने से पीछे हटकर वहां जाओ जहां से विचार आया। एक—एक कदम पीछे हटो। और तब पाओगे कि वहां कोई दूसरा विचार था जो इस विचार को लाया। और उनके बीच कोई संगति नहीं है।

    आपके बचपन के साथ इस गली के कुत्ते का क्या लेना—देना है! कोई संगति नहीं है, सिर्फ मन का एसोसिएशन है। अगर मैं गली पार करूं तो वह कुत्ता मुझे मेरे बचपन में नहीं ले लाएगा, कहीं अन्यत्र ले जाएगा। किसी तीसरे व्यक्ति को वह कहीं और ले जाएगा।

हरेक आदमी के मन में एसोसिएशन की श्रृंखला है। कोई भी घटना एसोसिएशन की श्रृंखला से जुड़ जाती है। तब मन कंप्यूटर की भांति काम करने लगता है। तब एक चीज से दूसरी चीज, दूसरी से तीसरी निकलती चली जाती है।

     यही आप दिन भर करते रहते हो। जो भी मन में आए उसे ईमानदारी से एक कागज के टुकड़े पर लिख लो। हैरान होओगे कि यह क्या मेरे मन में चल रहा है! दो विचारों के बीच कोई संबंध नहीं है। और आप इसी तरह के विचार करते रहते हो। इसे विचारना कहते हो? यह सिर्फ एक विचार का दूसरे विचार के साथ एसोसिएशन, और आप उनके साथ बह रहे हो।

विचार तब मनन बनता है जब वह एसोसिएशन के कारण नहीं, निर्देशन से चलता है। अगर आप किसी खास समस्या पर काम कर रहे हो तो सब एसोसिएशन की श्रृंखला को अलग कर देते हो और उसी एक समस्या के साथ गति करते हो। तब अपने मन को निर्देश देते हो। मन तब भी इधर—उधर से, किसी पगडंडी से किसी एसोसिएशन की श्रृंखला पकड़कर भागने की चेष्टा करेगा। लेकिन आप सभी अन्य रास्तों को रोक देते हो और मन को एक मार्ग से ले चलते हो। तब आप अपने मन को दिशा देते हो।

किसी समस्या में संलग्न एक वैज्ञानिक मनन में होता है। वैसे ही किसी समस्या में उलझा हुआ तार्किक या गणितज्ञ मनन करता है। जब कवि किसी फूल पर मनन करता है तब शेष संसार उसके मन से ओझल हो जाता है। तब दो ही होते हैं, फूल और कवि, और कवि फूल के साथ यात्रा करता है।

       रास्ते के किनारों से अनेक चीजें आकर्षित करेंगी, लेकिन वह अपने मन को कहीं नहीं जाने देता है। मन एक ही दिशा में गति करता है—निर्देशित।

यह मनन है। विज्ञान मनन पर आधारित है। कोई भी तार्किक विचारक मनन है। उसमें विचार निर्देशित है, दिशाबद्ध है। विचार की दिशा निश्चित है। सामान्य विचारना तो व्यर्थ है। मनन तर्कपूर्ण है, बुद्धिपूर्ण है।

फिर एकाग्रता है। एकाग्रता एक बिंदु पर ठहर जाना है। यह विचारना नहीं है, एक बिंदु पर होने को एकाग्रता कहते हैं। सामान्य विचारणा में मन पागल की तरह गति करता है। मनन में पागल मन निर्देशित हो जाता है, उसे जहां—तहां जाने की छूट नहीं है।

        एकाग्रता में मन को गति की ही छूट नहीं रहती। साधारण विचारणा में मन कहीं भी गति कर सकता है; मनन में किसी दिशा—विशेष में ही गति कर सकता है; एकाग्रता में वह कहीं भी नहीं गति कर सकता।

      एकाग्रता में उसे एक बिंदु पर ही रहने दिया जाता है। सारी ऊर्जा, सारी गति एक बिंदु पर स्थिर हो जाती है।

      योग का संबंध एकाग्रता से है. साधारण मन दिशाहीन, अनियंत्रित विचारक से संबंधित है और वैज्ञानिक मन दिशाबद्ध विचारना से। योगी का चित्त अपने चिंतन को एक बिंदु पर केंद्रित रखता है, वह उसे गति नहीं करने देता।

   एकाग्रता के बाद है ध्यान। साधारण विचारणा में मन कहीं भी जा सकता है। मनन में उसे एक दिशा में गति करने की इजाजत है, दूसरी सब दिशाएं वर्जित हैं।

    एकाग्रता में मन को किसी भी दिशा में गति करने की इजाजत नहीं है, उसे सिर्फ एक बिंदु पर एकाग्र होने की छूट है। और ध्यान में मन है ही नहीं। ध्यान अ—मन की दशा है।

ये चार अवस्थाएं हैं : साधारण विचारना, मनन, एकाग्रता और ध्यान।

ध्यान का अर्थ है, अ—मन। उसमें एकाग्रता के लिए भी गुंजाइश नहीं है; मन के होने की ही गुंजाइश नहीं है। यही कारण है कि ध्यान को मन से नहीं समझा जा सकता।

     एकाग्रता तक मन की पहुंच है, मन की पकड़ है। मन एकाग्रता को समझ सकता है, लेकिन’ मन ध्यान को नहीं समझ सकता। वहां मन कि पहुंच बिलकुल नहीं है। एकाग्रता में मन को एक बिंदु पर रहने दिया जाता है; ध्यान में वह बिंदु भी हटा लिया जाता है।

       साधारण विचारणा में सभी दिशाएं खुली रहती हैं; एकाग्रता में दिशा नहीं, एक बिंदु भर खुला है; और ध्यान में वह बिंदु भी नहीं खुला है। वहां मन के होने की भी सुविधा नहीं है।

     साधारण विचारणा मन की साधारण दशा है, ध्यान उसकी उच्चतम संभावना है। निम्नतम है सामान्य विचारना, एसोसिएशन। और उच्चतम शिखर है ध्यान, अ—मन

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