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मति न हो जड़

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शशिकांत गुप्ते

इनदिनों सर्वत्र विकास दौड़ रहा है। प्रगति भी विकास के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही है। उन्नति क्या होती है,या उन्नति किसे कहते हैं। यह भारत की जनता को पिछले दस वर्षों में ही ज्ञात हुआ है?
विकास,प्रगति और उन्नति की खबरें समाचार माध्यमों द्वारा त्वचा गोरे होने की क्रीम के विज्ञापनों की तरह ही पढ़ने, सुनने और देखने को मिल रही है।
मानस पटल पर उक्त विचारों के उभरने साथ ही संत रहीम का इस दोहे का स्मरण हुआ।
कै साधे सब सधै,सब साधै सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥

दोहे का भावार्थ “रहीम के अनुसार अगर हम एक-एक कर कार्यों को पूरा करने का प्रयास करें तो हमारे सारे कार्य पूरे हो जाएंगे, सभी काम एक साथ शुरू कर दियें तो तो कोई भी कार्य पूरा नही हो पायेगा। वैसे ही जैसे सिर्फ जड़ को सींचने से ही पूरा वृक्ष हरा-भरा, फूल-फलों से लदा रहता है।”
जिस तरह जड़ को सींचने से वृक्ष हरा-भरा रहने के साथ ही फूलों-फलों से लदा राहत है,ठीक इसी तरह वैचारिक परिपक्वता के लिए जड़ मति को सुनाज होना अनिवार्य है।
कवि वृंद का निम्न दोहे में यही उपदेश है।
करत अभ्यास के जङमति होत सुजान।
रसरी आवत जात, सिल पर करत निशान।।

इस दोहे का अर्थ यह है, “निरंतर अभ्यास करने से एक मुर्ख आदमी भी बुद्धिमान बन सकता है. जिस तरह कुँए की मुडेर पर बार बार रस्सी के घिसने से मुडेर लगे पत्थर पर निशाँ पड़ जाते है.”
उपर्युक्त उपदेशक संदेश उनके लिए हैं,जो लोग स्वयं के दिमाग का उपयोग स्वयं के विवेक को जागृत कर करते हैं। ऐसे लोगों के लिए कतई नहीं है,जिन्होंने अपने सोच विचार को “रहन” रखा है।

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