
कुछ महीने पहले, नेपाल की एक 50 वर्षीय महिला इलाज कराने लखनऊ आई। टमी टक के दो दिन बाद उसे भयंकर बुखार चढ़ गया। फेफड़े में इन्फेक्शन के साथ हालत और खराब हो गई। कुछ दिन में लिवर और किडनी भी प्रभावित हो गए। सेप्सिस काफी तेजी से डिवेलप हुआ और महिला को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। डॉक्टर्स ने पाया कि सारी कारस्तानी Pseudomonas aeruginosa नाम के ग्रैम-निगेटिव बैक्टीरिया की है। ये ऐसे बैक्टीरिया होते हैं जिनपर दवाएं असर नहीं करती। इस महिला के केस में Pseudomonas A बैक्टीरिया सभी एंटीबायोटिक्स से लड़ रहा था, बस Colistin को छोड़कर। तीन हफ्ते बाद, Colistin भी बेअसर हो गया। मतलब अब मरीज का इलाज करने को कोई दवा नहीं बची थी। महिला मौत के मुंह के पास पहुंच चुकी थी। उसे एक स्थानीय अस्पताल से मेदांता में शिफ्ट किया गया। वहां, एक अंडरट्रायल एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से उसकी जिंदगी बच गई। यह एंटीबायोटिक दवा विदेश में नहीं, औरंगाबाद की एक लैबोरेट्री में बनी है। इसे एक भारतीय फार्मा कंपनी Wockhardt रिसर्च सेंटर ने तैयार किया है।
केवल परिवार ही मंगा सकता है दवा, DCGI से भी लेनी पड़ी इजाजत
मेदांता लखनऊ में क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट, डॉ दिलीप दुबे ने WCK5222 के बारे में पढ़ा था। उन्होंने Wockhardt को फोन लगाया। वहां से पता चला कि केवल परिवार ही ‘अनुकंपा’ के आधार पर दवा मंगा सकते हैं। साथ ही ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) से परमिशन की भी जरूरत पड़ती है। परिवार ने फौरन DCGI को लिखा और 48 घंटों के भीतर अप्रूवल मिल गया। मरीज को 10 दिन तक WCK5222 दवा दी गई। डॉ दुबे के अनुसार, ‘हमने 10 दिन दवा दी, लेकिन वे (मरीज) 5वें दिन ही बैक्टीरिया से मुक्त हो चुकी थीं।’
नेपाली महिला को ठीक होने के बाद 12 सितंबर को डिस्चार्ज किया गया। उसके बाद से वह पांच बार फॉलोअप के लिए आ चुकी है। करीब दो हफ्ते पहले, डॉक्टर्स ने उसे नेपाल लौटने की इजाजत दे दी।
अभी ट्रायल्स से गुजर रही है ‘चमत्कारी’ दवा
WCK5222 पर रिसर्च 2012 में 130 वैज्ञानिकों के साथ शुरू हुई। अमेरिका में 200 मरजीों पर फेज 1 ट्रायल हुआ। पता चला कि दवा इंसानों पर इस्तेमाल की जा सकती है। Wockhardt रिसर्च सेंटर के चीफ साइंटिफिक ऑफिसर महेश पटेल ने कहा, ‘हमारा ड्रग WCK5222 अभी कुछ यूरोपियन देशों में क्लिनिकल ट्रायल से गुजर रहा है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने इसका जिक्र उभरते एंटीबायोटिक की तरह किया है।’ कंपनी का अगला कदम WCK5222 का भारत में ट्रायल शुरू करना है। रिसर्चर्स ने कहा कि WCK522 के लिए उनके पास खास USFDA अप्रूवल्स हैं और भारत में जल्द स्टडी शुरू होगी।
क्या हैं एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस?
एंटीमाइक्रोबियल्स के दायरे में एंटीबायोटिक्स, एंटीवायरल्स, एंटीफंगल्स और एंटीपैरासिटिक्स आ सकते हैं। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस या AMR तब होता है जब बैक्टीरिया, वायरस, फंजाई या पैरासाइट्स इवॉल्व होते हैं। धीरे-धीरे इनपर रेगुलर दवाएं बेअसर होने लगते हैं। मुख्य कारण एंटीमाइक्रोबियल्स का मिसयूज और ओवरयूज है। अगर ड्रग-रेजिस्टेंट इन्फेक्शन हो तो उसका इलाज खासा मुश्किल होता है। WHO के अनुसार, AMR पब्लिक हेल्थ के टॉप 10 खतरों में से एक है।
पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है AMR
- हर साल दुनिया में 7 लाख लोग AMR की वजह से मर जाते हैं।
- एक अनुमान के अनुसार, 2050 तक और 1 करोड़ लोग इसकी वजह से मौत को गले लगा चुके होंगे।
- AMR से होने वाली मौतों की संख्या कैंसर और रोड एक्सीडेंट्स को मिलाकर होने वाली मौतों से भी ज्यादा है।
- 2050 तक, AMR के चलते सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 2%-3.5% की गिरावट हो सकती है।
धड़ल्ले से एंटीबायोटिक्स गटकने का नतीजा समझिए
भारत जैसे देश में लोग खुद से एंटीबायोटिक्स खरीदकर खा लेते हैं। डॉक्टर्स के बेवजह एंटीबायोटिक्स प्रिस्क्राइब करने पर भी बहस होती है। नतीजा यह हुआ है कि एंटीबायोटिक या एंटीमाइक्रोबियिल रेजिस्टेंस (AMR) बेहद चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (ICMR) की AMR ट्रेंड्स पर रिपोर्ट बताती है कि ICU में भर्ती मरीजों को अब Carbapenem से कोई फायदा नहीं होता। इससे निमोनिया और सेप्टिकेमिया का इलाज होता आया है। रिसर्च के अनुसार, हर साल रेजिस्टेंस लेवल में 5% से 10% का उछाल देखने को मिल रहा है। इसकी मुख्य वजह एंटीबायोटिक्स का बेजा इस्तेमाल है।
आपके किचन में मौजूद हैं ये 7 नैचरल ऐंटिबायॉटिक्स, बदलते मौसम में गोली खाने की जरूरत नहीं
नैशनल हेल्थ सर्विस NHS की मानें तो ऐंटिबायॉटिक्स का सेवन करने से हर 10 में से 1 व्यक्ति को पाचन तंत्र से जुड़े साइड इफेक्ट का सामना करना पड़ता है। तो वहीं, 15 में से 1 व्यक्ति को इन ऐंटिबायॉटिक्स से ऐलर्जी भी हो जाती है। साथ ही ऐंटिबायॉटिक्स के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होने से बैक्टीरिया भी ड्रग-रेजिस्टेंट होते जा रहे हैं। साल 2014 में हुई एक स्टडी में यह बात सामने भी आयी थी कि हर्बल थेरपी, केमिकल ऐंटिबायॉटिक जितनी ही असरदार होती है और इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। ऐसे में OTC ड्रग लेने की बजाए इन 5 नैचरल ऐंटिबायॉटिक्स को डायट में करें शामिल। ऐंटि-बैक्टीरियल प्रॉपर्टीज, बीमारियों को रोकने की क्षमता और औषधीय गुणों की वजह से लहसुन का इस्तेमाल आज से नहीं बल्कि सदियों से होता आ रहा है। बैक्टीरियल इंफेक्शन से लड़ने में बेहद असरदार है लहसुन। लहसुन में पाया जाने वाला कम्पाउंड ऐलिसिन, सैल्मोनेला और ई-कोलाई जैसे खतरनाक बैक्टीरिया का भी खात्मा करने में बेहद असरदार है। लहसुन वैसे तो बेहद फायदेमंद होता है लेकिन जरूरत से ज्यादा लहसुन खाना भी हानिकारक साबित हो सकता है। इसलिए हर दिन लहसुन की 2 कली से ज्यादा न खाएं। अगर आप पहले से ही किसी बीमारी की दवा खा रहे हैं तो लहसुन खाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें। अगर आप सोचते हैं कि शहद तो मीठा होता है और इसलिए यह सेहत के लिए नुकसानदेह है तो आप पूरी तरह से गलते हैं। शहद सबसे पुराना और फायदेमंद ऐंटिबायॉटिक है जिसका इस्तेमाल कई पीढ़ियों से होता आ रहा है। लंबे समय से अगर कोई चोट ठीक ना हो रही हो तो उसे ठीक करने में, अगर स्किन जल जाए तो उसे ठीक करने में, अल्सर, स्किन प्रॉब्लम और कई तरह से बैक्टीरियल इंफेक्शन को दूर करने में बेहद असरदार माना जाता है शहद। 2011 की एक स्टडी की मानें तो 60 तरह के बैक्टीरिया को रोकने में फायदेमंद है शहद। शहद में पाया जाने वाला हाइड्रोजन पेरॉक्साइड ऐंटि-बैक्टीरियल प्रॉपर्टी से भरपूर होता है। हल्दी में पाया जाने वाला कर्क्युमिन नाम का तत्व बेहद पावरफुल ऐंटिऑक्सिडेंट है और यह ऐंटि-इन्फ्लेमेट्री प्रॉपर्टीज से भी भरपूर होता है। भारतीय किचन में पाया जाने वाला सबसे कॉमन मसाला है हल्दी जो शरीर में फ्री रैडिकल्स की वजह से होने वाले नुकसान को रोकने में मदद करता है। साथ ही साथ हल्दी का नियमित रूप से सेवन करने से शरीर में बीमारी फैलाने वाले कई तरह के बैक्टीरिया को भी रोकने में मदद मिलती है। साथ ही साथ हल्दी सिर्फ बैक्टीरिया ही नहीं बल्कि फंगस और ट्यूमर सेल्स के ग्रोथ को भी रोकती है। कुल मिलाकर देखें तो हल्दी भी एक पावरफुल नैचरल ऐंटिबायॉटिक है। ऐंटि-बैक्टीरियल और ऐंटि-इन्फ्लेमेट्री प्रॉपर्टीज से भरपूर होता है अदरक। वैज्ञानिकों की साइंटिफिक कम्यूनिटी भी अदरक को एक पावरफुल नैचरल ऐंटिबायॉटिक मानती है। वैसे तो कई स्टडीज में यह बात सामने आ चुकी है लेकिन साल 2017 की एक स्टडी में कई तरह के बैक्टीरिया से लड़ने में मददगार है अदरक ये बात साबित हो चुकी है। अदरक में जिन्जेरॉल पाया जाता है जो की एक बेहतरीन ऐंटि-माइक्रोबियल प्रॉपर्टी है जो माइक्रोब्स और बैक्टीरिया से लड़ने में मददगार है। बैक्टीरिया से लड़ने के साथ ही अदरक, जी मिचलाने और उल्टी आने की समस्या को भी दूर करता है। सांस से जुड़ी प्रॉब्लम्स, इन्फ्लेमेशन यानी सूजन और जलन, गैस्ट्रिक की प्रॉब्लम जैसी समस्याओं का समाधान करने में फायेदमंद माना जाता है थाइम इसेंशल ऑइल। थाइल ऑइल में ऐंटि-बैक्टीरियल प्रॉपर्टीज भी पायी जाती हैं तो बैक्टीरिया से जुड़ी बीमारियों को दूर रखने में मदद करता है। हालांकि इस ऑइल का इस्तेमाल सिर्फ बाहर से (externally) ही करना चाहिए। साथ ही साथ थाइम ऑइल को सीधे स्किन पर लगाने से जलन, खुजली या इरिटेशन हो सकती है इसलिए इसे नारियल तेल या ऑलिव ऑइल जैसे किसी तेल के साथ मिलाकर ही यूज करना चाहिए। लौंग यानी क्लोव का इस्तेमाल सदियों से दांतों से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में किया जाता रहा है। लेकिन अब कई रिसर्च में यह बात सामने आ चुकी है कि क्लोव वॉटर एक्सट्रैक्ट यानी लौंग का पानी ई-कोलाई जैसे खतरनाक बैक्टीरिया के खिलाफ भी बेहद असरदार है। लिहाजा लौंग को भी नैचरल ऐंटिबायॉटिक के तौर पर देखा जा सकता है। ऑरिगैनो में मौजूद ऐंटिऑक्सिडेंट आपके इम्यून सिस्टम यानी रोगों से लड़ने की क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करता है। साथ ही इसमें ऐंटि-इन्फ्लेमेट्री प्रॉपर्टीज भी पायी जाती हैं जिस वजह से यह भी आपके किचन में मौजूद नैचरल ऐंटिबायॉटिक का काम करता है। खासकर ऑइल के रूप में। ऑरिगैनो इसेंशल ऑइल अल्सर और इन्फ्लेमेशन की समस्या दूर करने के साथ ही बैक्टीरिया से भी लड़ने में मदद करता है।
ICMR की सीनियर साइंटिस्ट कामिनी गुप्ता देशभर में एंटीमाइक्रोबियिल रेजिस्टेंस और डायग्नोस्टिक्स को कोऑडिनेट करते हैं। उन्होंनेबताया, ‘भारत में enterobacterales और ग्रैम-निगेटिव नॉन-फर्मेंटर्स के बीच मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस काफी ज्यादा है। ऐसे ड्रग-रेजिस्टेंट पैथोजंस के लिए इलाज के नए तरीकों की अर्जेंट जरूरत है।’