वो कहते थे- छोटा लक्ष्य अपराध है, महान लक्ष्य होना चाहिए। देश में शांति की स्थिति होना
आवश्यक है और शांति की स्थापना शक्ति से होती है। रामेश्वरम के एक साधारण परिवार में जन्मे
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम अपने कर्म से फरिश्ता बन गए, उन्होंने सपने देखे और दिखाए भी। सपने
पूरे किए और हमें प्रेरणा दी कि हम भी कर सकते हैं। उनके जन्मदिन पर पूरा देश उन्हें दे रहा है
भावभीनी श्रद्धांजलि।
त मिलनाडु के धनुषकोडी में 15 अक्टूबर 1931 को एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में एपीजे
अब्दुल कलाम का जन्म हुआ, पिता जैनुलाब्दीन न तो ज्यादा पढ़े-लिखे थे, न ही पैसे वाले थे। अब्दुल
कलाम के पिता मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते थे। पांच वर्ष की अवस्था में रामेश्वरम की
पंचायत के प्राथमिक विद्यालय में उनका दीक्षा-संस्कार हुआ था। उनके शिक्षक इयादुराई सोलोमन ने
उनसे कहा था कि जीवन मे सफलता तथा अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था,
अपेक्षा इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना। पांचवी कक्षा में पढ़ते समय उनके अध्यापक
उन्हें पक्षी के उड़ने के तरीके की जानकारी दे रहे थे, लेकिन जब छात्रों को समझ नही आया तो
अध्यापक उनको समुद्र तट ले गए जहां उड़ते हुए पक्षियों को दिखाकर समझाया, इन्ही पक्षियों को
देखकर कलाम ने तय कर लिया कि भविष्य में विमान विज्ञान में ही जाना है। 1972 में वे भारतीय
अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से जुड़े। डॉ. अब्दुल कलाम को परियोजना महानिदेशक के रूप में भारत
का पहला स्वदेशी उपग्रह एस.एल.वी. तृतीय प्रक्षेपास्त्र बनाने का श्रेय हासिल हुआ। 1980 में इन्होंने
रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के निकट स्थापित किया था। इस प्रकार भारत भी अंतरराष्ट्रीय
अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन गया। इसरो लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम को परवान चढ़ाने का श्रेय भी इन्हें
प्रदान किया जाता है। कलाम ने स्वदेशी गाइडेड मिसाइल को डिजाइन किया। इन्होंने अग्नि एवं
पृथ्वी जैसे प्रक्षेपास्त्रों को स्वदेशी तकनीक से बनाया था। डाॅक्टर कलाम जुलाई 1992 से दिसंबर 1999
तक रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा सुरक्षा शोध और विकास विभाग के सचिव थे। उनकी
देखरेख में भारत ने 1998 में पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया।
2002 में वे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। वे व्यक्तिगत जिन्दगी में बेहद अनुशासनप्रिय रहे। उन्होंने
अपनी जीवनी विंग्स ऑफ फायर भारतीय युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान करने वाले अंदाज में लिखी है।
कार्यकाल समाप्त होने के बाद कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलोंग, अहमदाबाद, इंदौर व भारतीय
विज्ञान संस्थान, बैंगलोर के मानद फैलो व एक विजिटिंग प्रोफेसर बन गए। भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान
एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, तिरुवनंतपुरम के कुलाधिपति, अन्ना विश्वविद्यालय में एयरोस्पेस
इंजीनियरिंग के प्रोफेसर और भारत भर में कई अन्य शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों में सहायक
बन गए।
भारत के लिए उनके तीन स्वप्न …
पहला स्वप्न स्वतंत्रता का: हमारे इतिहास के 3,000 साल में समस्त विश्व से लोग यहां आए, हमारे
ऊपर आक्रमण किया, हमें लूटा और जो कुछ हमारा था, उस पर कब्जा कर लिया, लेकिन हमने किसी
अन्य राष्ट्र के साथ ऐसा कभी नहीं किया। हमने किसी को जीतकर गुलाम नहीं बनाया, न कब्जा
किया, न उनकी संस्कृति और इतिहास को नष्ट नहीं किया। क्योंकि हम दूसरों की स्वतंत्रता का
सम्मान करते हैं, इसीलिए मेरा पहला स्वप्न स्वतंत्रता का है। मेरा मानना है कि भारत ने स्वतंत्रता
का पहला स्वप्न वर्ष 1857 में देखा। हमें हर हाल में इस स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए, उसकी जड़ों
को मजबूत बनाना चाहिए। यदि हम स्वतंत्र नहीं रहेंगे तो कोई भी हमारा सम्मान नहीं करेगा।
दूसरा स्वप्न विकसित राष्ट्र का: मेरा दूसरा स्वप्न विकास का है। हम 50 साल तक विकासशील राष्ट्र
रहे हैं। वक्त आ गया है कि खुद को विकसित राष्ट्र के रूप में देखें। हमारे अधिकतर क्षेत्रों में विकास
दर 10 फीसदी है। हमारी निर्धनता का स्तर गिर रहा है। हमारी उपलब्धियों को आज विश्व में
मान्यता मिल रही है। इसके बावजूद हम आत्मविश्वास की कमी के कारण खुद को विकसित,
आत्मनिर्भर और आत्म-आश्वस्त राष्ट्र के रूप में नहीं देख रहे हैं।
तीसरा स्वप्न, भारत विश्व की बराबरी में खड़ा हो सके: मेरा मानना है कि जब तक भारत विश्व की
बराबरी में खड़ा नहीं होगा, कोई भी हमारा सम्मान नहीं करेगा। केवल शक्ति ही शक्ति का सम्मान
करती है। हमें सैन्य शक्ति के साथ-साथ आर्थिक शक्ति भी बनना होगा। मुझे तीन महान लोगों- डा.
विक्रम साराभाई, उनके उत्तराधिकारी प्रो. सतीश धवन और परमाणु मैटीरियल के जनक डा. ब्रह्म
प्रकाश के साथ काम करने का सौभाग्य मिला। मैं इसे जीवन का महान अवसर मानता हूं। n

