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मोदी, महाकाल औऱ मसीहाई मार्केटिंग

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अपूर्व भारद्वाज 

आप मोदी जी की लाख बुराई कर ले लेकिन उनकी एक बात का मैं कायल हूँ वो हर बात को एक इवेंट बना देते है हर चीज की गजब मार्केटिंग करते है खुद की ब्रांड इमेज के लिए इतना सचेत राजनेता पूरे विश्व मे शायद ही होगा उनकी ब्राण्ड इक्विटी इतनी हाई है कि वो अपने ब्रांड को दिन में खुद मोदी मोदी बोलकर  दस बार हेमर करते है और उसमें उनके समर्थक और विरोधी बराबर से अपना योगदान देते है 

मोदी ऐसा मायाजाल रचते है की सारे कैमरे उन्ही पर फोकस रहते है उनसे बड़ा ब्रांड गुरु शायद ही आज विज्ञापन जगत में होगा लेकिन ब्राण्ड लॉयल्टी और इंट्रीगिटी दो अलग अलग चीज है अगर मोदी इसकी उपेक्षा करेंगे तो अपनी बरसो पुरानी मेहनत पर पानी फेर सकते है

मिसाल के तौर पर महाकाल मंदिर के इवेंट को ही ले लीजिए मोदी जी के कारण आज देशभर में धार्मिक पर्यटन ब्रान्ड बन गया  है उन्होंने इसे आंदोलन बना दिया है और ब्रान्ड अम्बेसडर के रूप में मोदी ने राममंदिर, विश्वनाथ मंदिर से लेकर महाकाल मंदिर  तक मिसाल भी पेश की है

मोदी कभी अयोध्या में राम दूतबन जाते  है कभी बनारस के शिवपुत्र हो जाते है कभी उज्जैन में स्वयं महाकाल के लाल हो जाते है लेकिन संस्कृत में एक कहावत है अति सर्वत्र वर्जयते अर्थात किसी बात की अति हमेशा बुरी होती है मोदी आज वहीँ गलती कर रहे है  शायद  उन्हें किसी ने मसीहाई ब्रांड हेमरिंग की गलत व्याख्या उन्हें पढ़ा दी है खुद को लार्जर देंन लाइफ बनाने के चक्कर मे वो स्मॉलर देन अदर होते जा रहे है 

मोदी को ब्रान्ड इंट्रीगिटी बनानी है तो लाल बहादुर शास्त्री से सीखना चाहिए जिन्होंने युद्ध के समय अन्न संकट में खुद एक समय खाकर देखा फिर परिवार को एक समय खाना खिलाया तब जाकर उन्होंने पूरे देश के लिए एक समय का अन्न त्यागने की अपील की थी यह बात बहुत दिन बाद सार्वजिनक हुई थी और उसके बाद शास्त्री जी जो ब्रान्ड इंट्रीगिटी बनी थी वो आज तक कायम है हर जगह  मीडिया,मार्केटिंग और सेल्फ ब्रांडिग से मोदी रिलायंस जैसा बड़ा ब्रांड तो बन सकते है लेकिन टाटा जैसा विश्ववास शायद ही हासिल कर पाए मैं ज्यादा लिखा हूँ आप उससे ज्यादा समझना 

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