(एक तथ्यपरक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन)
– तेजपाल सिंह ‘तेज’
संविधान दिवस और बदलते राजनीतिक संकेत:
26 नवंबर 1949 भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में वह तारीख है जब संविधान सभा ने भारत का संविधान अंगीकृत किया। यह दिन आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक आत्मा का प्रतीक है। किंतु 2025 के संविधान दिवस पर जब प्रमुख राष्ट्रीय अखबारों में भारत सरकार की ओर से संविधान दिवस के अवसर पर कोई प्रमुख तो क्या…सांकेतिक विज्ञापन या संदेश दिखाई नहीं दिया, तब यह घटना महज़ एक ‘प्रशासनिक चूक’ न रहकर, एक राजनीतिक संकेत (political signalling) की तरह उभरी। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—“क्या मौजूदा केंद्र सरकार संविधान के मूल्यों—विशेषतः बहुलता, धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता और समानता—को लेकर वैचारिक असहजता का अनुभव नहीं कर रही है?” संवैधानिक सिद्धांतकार ग्रैनविल ऑस्टिन, नेहरू, डॉ. भीमराव आंबेडकर और एन. गोपालस्वामी अय्यंगर के दृष्टिकोण में भारत का संविधान “सामाजिक क्रांति का उपकरण” है। वहीं राष्ट्रवादी संगठनों का बड़ा हिस्सा इसे भारत की ‘प्राचीन सांस्कृतिक प्रकृति’ से दूर और ‘पश्चिमी’ मानता आया है। यह वैचारिक संघर्ष आज राजनीतिक परिदृश्य में फिर तीखे ढंग से उभर रहा है।
संविधान और आरएसएस–बीजेपी: ऐतिहासिक संदर्भ में:
1. आरएसएस का प्रारंभिक दृष्टिकोण
शोध संदर्भ:
· M. S. Golwalkar – “We, or Our Nationhood Defined” (1939)
· Constitution Assembly Debates Archive
· Christophe Jaffrelot – “The Hindu Nationalist Movement in India”
गोलवलकर के शुरुआती विचारों में “एक नस्ल, एक संस्कृति, एक धर्म” के आधार पर राष्ट्र की अवधारणा प्राथमिक थी। यह दृष्टि संविधान की धर्मनिरपेक्षता तथा समान नागरिकता की अवधारणा से भिन्न थी। गोलवलकर ने संविधान संबंधी आलोचनाएँ करते हुए कहा था कि इसे “विदेशी संविधान निर्माताओं की नकल” के रूप में अपनाया गया है—यह तथ्य बहुतेरे शोध कार्यों में उद्धृत है।
2. संविधान सभा में हिंदू राष्ट्र की मांग का परिणाम:
संविधान सभा में हिंदू राष्ट्र, हिंदू कोड और गौ-रक्षा को मूल अधिकार बनाने जैसी मांगें उठीं, लेकिन इन्हें सभापति, आंबेडकर और अधिकांश सदस्यों ने अस्वीकार किया।
संदर्भ: CAD Volumes, 1946–49 इस अस्वीकृति ने यह स्पष्ट किया कि भारत का गणराज्य किसी एक धार्मिक पहचान की नींव पर स्थापित नहीं होगा।
मोदी शासनकाल और संविधान की आलोचना: प्रमुख घटनाएं व संकेत:
नीचे दिए गए बिंदु किसी राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि घटनाओं, शोध-पत्रों, पत्रकारिता रिपोर्टों और सरकारी नीतिगत प्रवृत्तियों के आधार पर प्रस्तुत हैं।
1. संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर सवाल: न्यायपालिका पर दबाव के आरोप:
कई सेवानिवृत्त न्यायाधीशों—जज मदन लोकुर, जस्टिस चेलमेश्वर—ने सार्वजनिक मंचों पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंता व्यक्त की।
संसद में प्रक्रियागत गिरावट: 2020–2024 के बीच कई विधेयक बिना विस्तृत बहस व बिना स्थायी समिति को भेजे पारित हुए। यह संसदीय परंपराओं के कमजोर होने का संकेत है।
2. CAA और NRC: धर्म-आधारित नागरिकता की बहस:
संदर्भ: यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 15 के व्यापक सिद्धांतों के विरुद्ध सवाल खड़े करता है।
3. धार्मिक प्रतीकों का सरकारीकरण: अयोध्या का राम मंदिर उद्घाटन:
प्रधानमंत्री, मंत्रियों और कई सरकारी एजेंसियों की सक्रिय भागीदारी को विपक्ष ने “राज्य-धर्म के मिश्रण” के रूप में देखा। सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या मामले में मंदिर निर्माण का रास्ता खोला, पर यह भी कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है—फिर भी सरकारी स्तर पर कार्यक्रमों की भव्यता बहस का विषय बनी।
4. शिक्षा-संस्कृति में “हिंदू राष्ट्र” की परछाई:
इंडियन इतिहास के अध्यायों में कई बदलाव (दिल्ली सल्तनत, मुगल काल के संदर्भ, समाज सुधार, गांधी-नेहरू की भूमिका) को ‘सांस्कृतिक पुनर्गठन’ कहा गया, पर आलोचकों ने इसे वैचारिक पुनर्लेखन बताया।
5. “असहमति” और नागरिक स्वतंत्रता पर दबाव:
पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और असहमत आवाज़ों पर राजद्रोह, UAPA और IT नियमों के प्रयोग पर कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने चिंता व्यक्त की।
क्या सरकार वास्तव में संविधान को कमजोर कर रही है?
यह प्रश्न गंभीर है और इसका उत्तर भावनाओं नहीं, तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। जहाँ चिंता उचित है—
1. सरकारी विमर्श में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द लगभग लुप्त हो गया है;
2. नागरिकता, शिक्षा व इतिहास नीति में धार्मिक तत्वों का वर्चस्व बढ़ा;
3. धार्मिक आयोजनों में सरकार की प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ी;
4. संविधान दिवस जैसे अवसरों पर सरकारी मौन, राजनीतिक संकेत देता है;
5. संविधान के मूल स्तंभ—बंधुत्व, समानता, स्वतंत्रता—सार्वजनिक संवाद से गायब हो रहे हैं।
ये संकेत बताते हैं कि भारतीय राज्य धीरे-धीरे सांस्कृतिक-बहुसंख्यक राष्ट्रवाद की ओर झुक रहा है। यह आरोप अतिशयोक्ति नहीं होगा—
1. संविधान को समाप्त करने का कोई औपचारिक प्रयास नहीं हुआ, यह कहना इसलिए गलत है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में 400 सीटें प्राप्त होने पर संविधान को बदलने की बार-बार घोषणा की गई।
2. संसद और न्यायपालिका अभी भी कार्यशील हैं लेकिन आम धारणा कुछ और ही है।
3. चुनाव प्रतिस्पर्धात्मक और बहुदलीय हैं लेकिन चुनाव आयोग की कार्य-प्रणाली सत्ता पक्ष की ओर झुकी हुई स्पष्ट रूप दिखती है।
4. संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) सुरक्षित है, आज की तारीख में यह विचार भी जनता को भ्रमित करने के लिए एक मौखिक कथन है।
हिंदू राष्ट्र की ओर?—सारांश विश्लेषण:
शोधपरक निष्कर्ष यह सुझाते हैं कि–यह परिवर्तन प्रत्यक्ष नहीं, परोक्ष और क्रमिक (gradual) है। सरकार संवैधानिक संरचना को तोड़ नहीं रही, बल्कि राज्य की प्रकृति को सांस्कृतिक रूप से पुनर्परिभाषित करते जा रही है। इसे राजनीति-विज्ञान में कहते हैं: “Cultural Majoritarian Shift within a Constitutional Democracy”
अर्थात— संविधान बना रहता है, पर शासन की आत्मा में बहुसंख्यकवादी तत्व प्रवेश कर जाते हैं।
उपसंहार: संविधान की रक्षा—राज्य की नहीं, जनता की ज़िम्मेदारी:
भारत का संविधान केवल सत्ता का दस्तावेज नहीं, बल्कि समाज का अनुबंध है।
इसे बचाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, नागरिकों की भी है। देश के करोड़ों लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने सपनों का भारत देखा था— एक ऐसा भारत जो–
· धर्म से ऊपर इंसान को देखे;
· शक्तिशाली के आगे नहीं, न्याय के आगे झुके;
· असहमति को राष्ट्र-विरोधी नहीं बल्कि लोकतंत्र की पूंजी माने।
जैसे-जैसे राजनीतिक विमर्श बदलता है, यह जरूरी है कि नागरिक संविधान को केवल किताब में नहीं, अपने व्यवहार और चेतना में भी जीवित रखें। क्योंकि संविधान की रक्षा तब होती है जब नागरिक चेतन होते हैं—और उसका क्षरण तब होता है जब नागरिक मौन होते हैं।00

