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मोदी करें साहसिक पहल ,किसानों से सीधी बात करें

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राजकुमार सिंह

इक्कीसवीं शताब्दी के इक्कीसवें वर्ष का पहला सप्ताह बीत गया। वर्ष 2020 जिन झंझावातों में बीता, उसके मद्देनजर नये वर्ष पर तमाम नयी उम्मीदें लगी हैं, लेकिन जानलेवा कोरोना की वैक्सीन के अलावा कोई सकारात्मक संकेत पहले सप्ताह में नहीं मिला। नये स्ट्रैन के साथ कोरोना भी और खौफनाक रूप में फुंफकार रहा है तो कोरोना काल में आनन-फानन में केंद्र सरकार द्वारा कृषि सुधार के नाम पर बनाये गये तीन नये कृषि कानूनों के विरुद्ध दिल्ली की दहलीज पर किसानों का आंदोलन कोरोना के डर और जानलेवा शीतलहर के बीच भी जारी है। जिस तरह के विवादों के बीच कोरोना वैक्सीन को मंजूरी मिली है, कह पाना मुश्किल है कि भयाक्रांत लोगों में विश्वास जगेगा या अविश्वास गहरायेगा। दरअसल बीते वर्ष की सबसे गहरी चोट यही है कि वह विश्वास को गहरे तक हिला गया है। वर्ष 2019 के अंत में चीन से निकले कोरोना ने 2020 में भारत सहित कमोबेश पूरे विश्व में ही जैसा तांडव मचाया, उससे लोगों के सपने ही ध्वस्त नहीं हुए, स्वयं, समाज और सरकार से विश्वास भी डोल गया है। यह तो सभी जानते-मानते रहे हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, पर उसके अंत की आहट ऐसी डरावनी भी हो सकती है, इसकी कल्पना कोरोना से पहले किसी ने नहीं की होगी। वायरस जनित यह पहली बीमारी नहीं है। इसके बावजूद समाज से सरकार तक जैसी बदहवासी नजर आयी, उसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है।

जब देश में कोरोना संक्रमण के कम केस थे, तब अचानक घोषित लॉकडाउन 50 दिनों तक बढ़ाया जाता रहा, पर जब रोज नये आने वाले केसों की संख्या लगातार बढ़ रही थी, तब अनलॅाक की प्रक्रिया रफ्तार पकड़ने लगी। जान है तो जहान है, के मुहावरे की जगह जान भी बचानी है और जहान भी, ने ले ली। जो बचा, वह किसी से छिपा नहीं है। दरअसल अभी तो दावे से यह भी नहीं कहा जा सकता कि जो बच गया है, वह वाकई बच गया है, क्योंकि ब्रिटेन समेत कुछ देशों में सामने आये 70 प्रतिशत अधिक संक्रमण फैलाने वाले नये कोरोना स्ट्रैन से संक्रमित 71 लोग भारत में पहचाने जा चुके हैं। ब्रिटेन की उड़ानें रोकने के लिए सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन 71 तक पहुंच चुकी संक्रमितों की संख्या बताती है कि हम एक बार फिर त्वरित प्रतिक्रिया में चूके। 2019 के अंत में चीन से निकला कोरोना 2020 के शुरुआती महीनों में ही कई देशों में कहर बरपाने लगा था। खुद भारत में पहला केस 30 जनवरी को सामने आ चुका था, पर हमारी सरकार मार्च के दूसरे पखवाड़े में जागी। ऐसा भी नहीं था कि इस अवधि का इस्तेमाल कोरोना संक्रमण रोकने अथवा लॉकडाउन के दौरान उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से निपटने की तैयारियों में किया गया हो। जान जोखिम में डाल हर हाल में घर लौटने के लिए सड़कों पर निकले लाखों प्रवासी श्रमिकों से साबित हो गया कि 50 दिनों तक चला लॉकडाउन दरअसल बिना किसी तैयारी, और यहां तक कि संभावित परिस्थितियों के आकलन के बिना ही, किया गया था। इसके बावजूद आबादी के अनुपात में भारत में कोरोना का कहर आशंका से कम महसूस हो रहा है तो इसके कई कारण हैं।

इसलिए कोरोना से जंग में कामयाबी या नाकामी पर राजनीति करने की नहीं, सबक सीखने की जरूरत है, क्योंकि वैक्सीनेशन के बाद कोरोना का कहर तो देर-सवेर कम ही होगा, लेकिन इसका असर कई रूपों में लंबे समय तक रहने वाला है। कोरोना कब तक और कितने रूप बदलता रहेगा, वैज्ञानिक-चिकित्सक भी दावे के साथ अभी नहीं बता सकते। कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों पर भी उसका असर किस रूप में कब तक रहेगा, चिकित्सा विज्ञान के पास इस सवाल का भी कोई ठोस जवाब अभी नहीं है। कोरोना के कारण जिनके रोजगार गये, कारोबार ठप हो गये—उनके दिन कब फिरेंगे, कोई नहीं जानता। जैसा कि हर संकट के समय होता है, सरकार ने अर्थव्यवस्था पर कोरोना के प्रभाव को कम करने के लिए तमाम तरह के पैकेज घोषित किये। संभव है, उद्योग जगत को उनसे कुछ संबल भी मिला होगा, लेकिन आम आदमी का न तो खोया विश्वास लौटा है और न ही जीवन के लिए जरूरी चीजें तक खरीदने के लिए उसकी जेब में पैसा आया है। सरकार की मेहरबानी से बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतें तथा बेलगाम महंगाई आम आदमी की बेबसी के जख्मों पर नमक मलने का ही काम कर रही हैं।

ऐसा ही कुछ दिल्ली की दहलीज पर पिछले 43 दिनों से आंदोलनरत किसानों के साथ किया जा रहा है। कोरोना संकट के बीच जब देश जान और जहान बचाने की जद्दोजहद से गुजर रहा था, किसकी मांग पर कृषि सुधार के लिए आनन-फानन में अध्यादेश लाये गये और फिर वे कानून भी बनाये गये—सरकार ने इस रहस्य से अभी तक पर्दा नहीं उठाया है‌। अगर किन्हीं किसान संगठनों से इस प्रक्रिया में विचार-विमर्श किया गया था, तो उसका भी खुलासा सरकार ने नहीं किया है। नाम उन विशेषज्ञों के भी सावर्जनिक नहीं किये गये हैं, जिन्होंने ऐसे कानूनों का मसौदा तैयार किया, जिन्हें किसान अपनी मौत का फरमान मानते हैं। जिन किसानों की बेहतरी के लिए ये नये कानून बनाने का दावा किया जा रहा है, जब वे ही उन्हें रद्द करवाने की मांग पर अड़े हैं, तब सरकार किनके हित में अपनी जिद पर अड़ी है? आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि चुनाव में पराजित और हताश विपक्ष किसान आंदोलन का इस्तेमाल मोदी विरोधी माहौल बनाने में कर रहा है।

बेशक पिछले कुछ दशकों से भारतीय कृषि जिस अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है, उससे निकलने के लिए कुछ ठोस करने की जरूरत है, पर वैसा कोई भी कदम किसानों से विचार-विमर्श के बाद ही उठाया जाना चाहिए—यही लोकतांत्रिक एवं पारदर्शी शासन व्यवस्था का तकाजा है। कोरोना और भयंकर ठंड के बीच आंदोलनरत किसानों की देश की सर्वोच्च अदालत को चिंता है, ऐसा उसकी टिप्पणियों से साफ है, लेकिन कई किसानों की मौत के बावजूद सरकार की ओर से कोई संवेदनशीलता दिखायी नहीं देती। शायद सत्ता का चरित्र ही ऐसा होता है, लेकिन खुद को प्रधानमंत्री के बजाय प्रधान सेवक कहना-कहलवाना पसंद करने वाले नरेंद्र मोदी से यह कतई अपेक्षित नहीं। पिछले दोनों लोकसभा चुनावों में मतदाताओं ने दलगत, जाति-वर्ग की विभाजक रेखाओं से ऊपर उठ कर नरेंद्र मोदी के नाम पर ही वोट दिया है, क्योंकि दूसरे कार्यकाल में मनमोहन सिंह से मोहभंग के मद्देनजर देशव्यापी निराशा के बीच वह जन नेता की छवि बनाने में सफल रहे। कटु सत्य यही है कि लंबे खिंचते किसान आंदोलन से मोदी की उस छवि पर भी आंच आ रही है। बेशक कानून रद्द करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता, लेकिन मोदी तो जाने ही मुश्किल काम के लिए जाते हैं। उनके सलाहकारों को लगता होगा कि तीनों कृषि कानून रद्द करने से मोदी की नेतृत्व साख गिरेगी, जबकि सच यह है कि महीनों से आंदोलनरत किसान ही जब उनकी जय बोलते हुए घर लौटेंगे तो उनकी छवि नयी बुलंदियों पर होगी। मोदी की छवि वैसे भी लीक से अलग सोचने-करने वाले राजनेता की है। दोनों पक्षों की हठधर्मिता के बीच बात मध्य मार्ग से ही बनेगी। किसानों से बातचीत तक नये कृषि कानूनों पर अमल स्थगित करने पर केंद्र से राय मांग कर सुप्रीम कोर्ट ने एक मध्य मार्ग दिखा भी दिया है। केंद्र और किसानों के बीच (अमित शाह से मुलाकात समेत) आठ दौर की बातचीत में भी जारी गतिरोध तोड़ने का अब सबसे कारगर तरीका यही नजर आता है कि मोदी किसानों से सीधी बात की साहसिक पहल करें और उन्हें विश्वास दिलायें कि उनकी सहमति के बिना कृषि क्षेत्र में बदलावकारी कानून लागू नहीं होंगे। अक्सर लोगों को संकट को अवसर में बदलने की नसीहत देने वाले मोदी के लिए भी यह संकट को अवसर में बदलने का मौका है।

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